“अगर फिल्म ‘Udaipur Files’ को धार्मिक भावनाओं के नाम पर रोका जा सकता है, तो ‘PK’, ‘Tandav’, ‘OMG’, और ‘Haider’ जैसी फ़िल्मों को भी क्यों नहीं रोका गया?”
यह सवाल अब सिर्फ़ हिन्दू समाज का नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की न्यायप्रियता पर एक गहरा प्रश्नचिन्ह है।
विषय का प्रारंभ:
हाल ही में फिल्म ‘Udaipur Files’, जो दर्जी कन्हैयालाल की निर्मम हत्या पर आधारित है, को लेकर सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के स्तर पर बहस छिड़ी। दिल्ली हाई कोर्ट ने इसकी रिलीज़ पर अंतरिम रोक लगा दी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह फिल्म “धार्मिक भावनाओं को भड़का सकती है”।
पर सवाल यह उठता है:
क्या जब फिल्मों में हिन्दू प्रतीकों, देवी-देवताओं, ब्राह्मणों, या संपूर्ण सनातन संस्कृति का मजाक उड़ाया जाता है, तब कोई “धार्मिक भावना” आहत नहीं होती?
हिन्दू प्रतीकों को निशाना बनाने वाली चर्चित फिल्में:
- PK (2014) – आमिर खान ने हिन्दू मूर्तिपूजा को पाखंड बताया, मंदिरों को लूट का अड्डा दिखाया गया।
- OMG (2012) – पूरी फिल्म मंदिरों, पुजारियों और श्रद्धा पर आधारित विश्वास को “बिज़नेस” बताया।
- Haider (2014) – कश्मीरी पंडितों की त्रासदी को नजरअंदाज़ करते हुए आतंकियों को सहानुभूति दी गई।
- Article 15 (2019) – पूरी ब्राह्मण जाति को अत्याचारी, हिंसक और सामंती मानसिकता वाला दिखाया गया।
- Tandav (2021) – भगवान शिव और नारद की भूमिका में अपमानजनक दृश्य, जिसे भारी विरोध के बाद बदला गया।
इन फिल्मों पर हिन्दू समाज ने न्यायालय का सहारा लिया, विरोध दर्ज किया, पर न किसी फिल्म की रिलीज रोकी गई, न कोई सेंसर हुआ, और न कोई माफी मांगी गई जब तक राष्ट्रव्यापी आक्रोश नहीं हुआ।
क्रिएटिविटी बनाम प्रोपेगेंडा:
- हिंदू संस्कृति पर कटाक्ष करने को अक्सर “Freedom of Expression” कहकर जायज ठहराया जाता है।
- लेकिन अगर वही सिनेमा हिंदू पीड़ाओं को उजागर करे — जैसे Udaipur Files करती है — तो उसे *“सांप्रदायिक”, “भड़काऊ” या “शांति भंग करने वाला” घोषित कर दिया जाता है।
यह खुले रूप में दोहरा मापदंड है।
न्यायपालिका की भूमिका:
सुप्रीम कोर्ट ने Udaipur Files की रिलीज़ रोकने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने रिलीज की अनुमति भी नहीं दी, बस “Let the film be released” जैसी टिप्पणी की।
वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट ने तुरंत फिल्म पर रोक लगाते हुए कहा कि “यह फिल्म धार्मिक भावनाएं भड़का सकती है” — जबकि यह एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसमें पीड़ित हिन्दू समुदाय का आम नागरिक है।
तो क्या हिंदू भावनाएं कभी भावना नहीं मानी जाएंगी?
इतिहास भी यही कहता है:
- रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों का आधुनिक व्याख्या के नाम पर हास्यास्पद या विकृत रूप प्रस्तुत करना एक आम चलन बन चुका है।
- नाटकों, ओटीटी, वेब सीरीज, कॉमेडी शो में “पंडित”, “ठाकुर”, “बनिया” को जातिवादी, लालची या हिंसक रूप में दिखाना बॉलीवुड की लिपि में गहराई से घुसा है।
- लेकिन कभी किसी कोर्ट ने इसे रोकने की पहल नहीं की।
हिन्दू समाज की सहनशीलता:
हिंदू समाज शायद दुनिया का एकमात्र धार्मिक समुदाय है जिसने:
- अपने देवताओं का अपमान सहा,
- मंदिरों का मज़ाक देखा,
- ब्राह्मणों की छवि को खलनायक बनते देखा,
फिर भी उसने कभी धर्म के नाम पर हिंसा नहीं की, न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हथियार उठाया।
पर अब यही सहनशीलता कमज़ोरी समझी जाने लगी है।
आगे का रास्ता क्या?
- समान न्यायिक मानदंड: यदि एक समुदाय की भावनाओं की रक्षा में कोर्ट सक्रिय हो सकता है, तो हिंदुओं की भावनाएं भी समान रूप से महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
- सेंसर बोर्ड की जवाबदेही: CBFC को केवल ‘कट्स’ देने के बजाय यह भी देखना चाहिए कि क्या फिल्म किसी समुदाय के दर्द को दबा रही है या सच्चाई दिखा रही है।
- हिंदू समाज की सांस्कृतिक चेतना: अब जरूरी है कि हिन्दू समाज भी संस्कृति के प्रति सजग और संगठित हो, समान अधिकार और सम्मान की माँग करे — न्यायालय, मीडिया और सिनेमा सभी मंचों पर।
निष्कर्ष:
“Selective Censorship” केवल हिन्दू समाज की अभिव्यक्ति को कुचलने का एक नया तरीका बनता जा रहा है।
जहाँ एक ओर अपराधियों की मानवाधिकार की बात होती है, वहीं पीड़ित हिंदू की आवाज़ ‘धर्मनिरपेक्षता के नाम पर’ दबा दी जाती है।
अगर Udaipur Files जैसी सच्चाई पर आधारित फिल्म को रोका जाएगा,
तो कल भगवान राम पर फिल्म बनाना भी ‘धार्मिक उकसाव’ कहा जा सकता है।
अब वक्त है — हिन्दू समाज बोले। मजबूती से, गरिमा से, पर बिना झुके।
क्योंकि अगर आपकी पीड़ा को अभिव्यक्ति का अधिकार नहीं,
तो यह लोकतंत्र नहीं, “चयनात्मक लोकतंत्र” है।
































