आज के सामाजिक विमर्श में एक वर्ग विशेष द्वारा यह कहा जाता है कि “सवर्णों ने हमें पढ़ने नहीं दिया, आगे बढ़ने नहीं दिया और आज भी रोकते हैं।” यह विचार अक्सर सार्वजनिक मंचों, सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाज़ी में दोहराया जाता है। लेकिन इस कथन में जो तर्क का असंतुलन है, उसे समझना अत्यंत आवश्यक है। यदि कोई वर्ग सवर्णों को अपनी विफलता का दोषी ठहराता है, तो क्या उन्हें अपनी सफलता का श्रेय भी नहीं देना चाहिए?
1. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: क्या वंचनात्मक सोच केवल सवर्णों की रही?
एक असत्य को एक सच बना दिया है कि ऐतिहासिक रूप से समाज के कुछ वर्गों को शिक्षा, मंदिर प्रवेश और सामाजिक सम्मान से वंचित किया गया जो वास्तव में सच नहीं है और उतना तो बिलकुल नहीं जितना इसका प्रचार किया गया । परंतु अगर हम सामाजिक या ऐतिहासिक दबाब में आकर एक लेखक होने के नाते इसे सच मान भी ले तो यह भी उतना ही सत्य है कि इन्हीं सवर्ण समाज से कई सुधारक पैदा हुए जिन्होंने उन सभी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई जिन्होंने मानव को समान नहीं माना वो बात अलग है एक वर्ग विशेष खुद घुलना मिलना नहीं चाहता था फिर भी सवर्णो ने बहुत कोशिश की :
- राजा राममोहन राय – नारी शिक्षा और सती प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया।
- ईश्वरचंद्र विद्यासागर – विधवा पुनर्विवाह और बालिका शिक्षा के पक्षधर रहे।
- स्वामी विवेकानंद – समता और सेवा के संदेशवाहक बने।
- महात्मा गांधी – अस्पृश्यता के खिलाफ जन आंदोलन चलाया।
इसी प्रकार संविधान सभा के 90% सदस्य सवर्ण थे, जिन्होंने दलितों और वंचितों के लिए आरक्षण, सुरक्षा और विशेष अवसर सुनिश्चित किए।
2. आधुनिक भारत: अवसरों के द्वार खोलने वाला कौन?
आज वंचित वर्ग के लिए न केवल आरक्षण है, बल्कि:
- विशेष छात्रवृत्तियाँ
- निशुल्क कोचिंग
- प्रमोशन में आरक्षण
- राजनैतिक प्रतिनिधित्व
इन सभी व्यवस्थाओं को लागू करने वाली संवैधानिक व्यवस्था में सवर्णों की भागीदारी और नेतृत्व रहा है।
यदि कोई वर्ग कहता है कि “सवर्णों ने आगे नहीं बढ़ने दिया,” तो यह प्रश्न उठता है:
जब आप आज डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, मंत्री, और प्रोफेसर बन पा रहे हैं — तो क्या वह सवर्ण-प्रधान समाज की अनुमति और व्यवस्थागत समर्थन के बिना संभव था?
3. तर्क की परीक्षा: दोष जब, तो श्रेय क्यों नहीं?
कई बार सुनने को मिलता है:
“हमारी तरक्की हमारी मेहनत से है, सवर्णों का इसमें क्या योगदान?”
तो यह स्पष्ट करें कि:
- जब असफलता में सवर्ण व्यवस्था को दोषी ठहराते हो,
- तब सफलता में उस व्यवस्था को श्रेय क्यों नहीं?
यदि आपकी मेहनत ही सबकुछ है और कोई रोक नहीं सका, तो विफलता का ठीकरा क्यों?
और यदि पहले रोका गया था, तो आज मौका किसने दिया?
यह तर्किक असंतुलन ही सामाजिक द्वेष और कटुता का कारण बनता है।
4. मेहनत और मंच: दोनों का संतुलन जरूरी है
सफलता केवल व्यक्तिगत परिश्रम से नहीं होती, बल्कि:
- मंच (Platform)
- अवसर (Opportunity)
- संरचना (Structure)
का भी उतना ही योगदान होता है। समाज ने यदि अवसर नहीं दिए होते, तो केवल मेहनत से भी सफलता की संभावना सीमित हो जाती।
ठीक वैसे ही जैसे:
“कोई गायक तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसे मंच और श्रोता न मिलें, भले ही स्वर उसमें जन्मजात हों।”
निष्कर्ष: संतुलन और सत्य का स्वीकार
- सवर्ण समाज में अन्याय करने वाले भी थे, पर सुधारक भी थे।
- आज जो वंचित वर्ग उच्च पदों पर पहुंच रहा है, उसमें उनकी मेहनत के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था और अवसर की भूमिका भी है।
- दोषारोपण से अधिक आवश्यक है – सत्य का संतुलित स्वीकार।
यदि हम विफलता में दोष दे सकते हैं, तो सफलता में श्रेय देना भी हमारी नैतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
































