भारत का लोकतंत्र और न्यायपालिका अक्सर अपनी संवेदनशीलता और करुणा पर गर्व करती है। लेकिन क्या यही संवेदनशीलता और करुणा उस समय भी दिखाई देती है, जब पीड़ित हिंदू समुदाय हो? विशेषकर वे कश्मीरी हिंदू, जिन्हें अपने ही घर-आंगन से बेदखल किया गया, जिनकी स्त्रियों का अपमान हुआ, जिनके मंदिर तोड़े गए और जिनके घर जला दिए गए?
आज स्थिति यह है कि न्याय और सहानुभूति का पूरा तंत्र पशु अधिकारों और कुत्तों के लिए खड़ा हो जाता है, पर जब बात कश्मीरी हिंदुओं की आती है, तो हर दरवाज़ा बंद मिलता है।
कश्मीरी हिंदुओं का न्याय से टकराव
30 से अधिक वर्षों से कश्मीरी हिंदू विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं। लाखों लोग अपने ही देश में शरणार्थी बनकर जी रहे हैं। पर न्यायपालिका और सरकारें हर स्तर पर उन्हें ठुकराती रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ठंडे फैसले इसका प्रमाण हैं:
- 24 जुलाई 2017 – Roots in Kashmir की याचिका यह कहकर ख़ारिज कर दी गई कि 27 साल बाद सबूत मिलना कठिन है।
- 25 अक्तूबर 2017 – पुनर्विचार याचिका भी अस्वीकार कर दी गई।
- 2 सितम्बर 2022 – We the Citizens की याचिका पर कहा गया कि यह कार्यपालिका का विषय है।
- 19 सितम्बर 2022 – अशुतोष टप्पलू हत्या मामले की SIT जाँच की मांग भी ठुकरा दी गई।
- 8 दिसम्बर 2022 – Roots in Kashmir की क्यूरेटिव याचिका भी ख़ारिज कर दी गई। यह अंतिम कानूनी दरवाज़ा था।
इस तरह न्यायपालिका ने हर स्तर पर यह संदेश दिया कि कश्मीरी हिंदुओं की त्रासदी न्यायिक विमर्श के योग्य नहीं है।
दूसरी तरफ – कुत्तों के लिए अदालतों की फुर्ती
यही भारत का विडंबना है। जब मामला कुत्तों और पशु-प्रेमियों का आता है, तो अदालतें तुरंत सक्रिय हो जाती हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय में गली कुत्तों के अधिकारों पर सुनवाई होती है।
- PETA जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं महंगे वकील – कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी – को खड़ा कर देती हैं।
- बॉलीवुड और समाज के बड़े चेहरे – जॉन अब्राहम, वरुण धवन, जान्हवी कपूर, रवीना टंडन, वीर दास, चिन्मयी श्रीपदा, वरुण ग्रोवर, अदिवी शेष, सिद्धार्थ आनंद, शर्मिला टैगोर, श्रिया पिलगांवकर, मोहित चौहान, मोना वासु – सड़कों पर उतर आते हैं।
कुत्तों को लेकर इतनी सहानुभूति और आवाज़, पर कश्मीरी हिंदुओं के लिए सन्नाटा।
न्यायपालिका की असमान संवेदनशीलता
यहाँ सवाल सिर्फ अदालतों की ठंडक का नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की प्राथमिकताओं का है।
- कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को अदालतें “भूल जाओ” वाली मानसिकता से देखती हैं।
- SIT, ट्रिब्यूनल या मुआवज़ा – कुछ भी सुनिश्चित नहीं किया गया।
- “न्याय” का अर्थ केवल राजनीतिक रूप से सही मुद्दों तक सीमित कर दिया गया है।
इसका सीधा संदेश यह है कि भारत में हिंदू पीड़ा असुविधा का विषय है। न्यायपालिका इसे छूना भी नहीं चाहती।
“अस्पृश्य” बनाए गए हिंदू
भारत के तथाकथित सेकुलर और उदारवादी ढांचे ने कश्मीरी हिंदुओं को ऐसा व्यवहार दिया है, मानो वे लोकतंत्र के भीतर “अस्पृश्य” हों।
- हम अपने घरों को लौट नहीं सकते।
- हमारी ज़मीनें हड़प ली गईं।
- हमारे मंदिर अपवित्र किए गए।
- और ऊपर से यही कहा जाता है – “भूल जाओ, आगे बढ़ो।”
कोई ट्रिब्यूनल नहीं, कोई मुक़दमा नहीं, कोई न्याय नहीं – सिर्फ़ खामोशी।
समाज की चुप्पी – सबसे बड़ा अपराध
सरकारों और अदालतों के रवैये के अलावा एक और दर्दनाक पहलू है – समाज और बुद्धिजीवियों की चुप्पी।
- कश्मीरी हिंदुओं के लिए न कोई बड़ा आंदोलन हुआ, न सड़कों पर भीड़ उतरी।
- विश्वविद्यालयों और “इंटेलेक्चुअल” मंचों पर इस पर चर्चा तक नहीं होती।
- मीडिया इसे छूना नहीं चाहता, क्योंकि यह उनकी “नैरेटिव पॉलिटिक्स” में फिट नहीं बैठता।
आज स्थिति यह है कि कश्मीरी हिंदुओं का दर्द एक राजनीतिक बोझ समझा जाता है।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता
जब लोकतंत्र अपने ही नागरिकों के नरसंहार, पलायन और अपमान को न्याय के योग्य नहीं मानता, तो यह उसकी सबसे बड़ी असफलता है।
- अदालतें पशुओं के लिए दया से भर जाती हैं, पर इंसानों के लिए निष्ठुर हो जाती हैं।
- सरकारें वोट-बैंक बचाने में लगी रहती हैं।
- बुद्धिजीवी वर्ग अपने नकली “मानवाधिकार” के चश्मे से केवल चुनिंदा पीड़ाओं को देखता है।
इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है कि अपने ही देश में हिंदू शरणार्थी बने हुए हैं, और न्याय का हर दरवाज़ा बंद है।
निष्कर्ष – यह लोकतंत्र असल में “कुत्तों के लिए स्वर्ग तंत्र” है
भारत में आज एक अजीब विडंबना है।
- कुत्तों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय लॉबी, महंगे वकील, ग्लैमर इंडस्ट्री और अदालतें सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार हैं।
- पर कश्मीरी हिंदुओं के लिए कोई खड़ा नहीं होता।
इस स्थिति को समझने का सबसे सटीक वर्णन यही है – “*त्तों के राज में हिंदू परित्यक्त हैं।”
हमारी त्रासदी को देखने से इनकार करना, उसे दबाना और उस पर खामोश रहना केवल एक समुदाय से धोखा नहीं है, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र और न्याय की आत्मा से धोखा है।

































