पूरी दुनिया में केवल भारतीय संस्कृति ही ऐसी है जिस में महिलाओं को हमेशा से देवी का दर्जा दिया गया है, दुनिया के किसी भी देश और किसी भी सभ्यता में ऐसा नहीं है। महिलाओं को हमेशा त्याग, प्रेम, दया और परोपकार जैसे गुणों को उनकी पहचान के रूप में माना जाता था। लेकिन समय के साथ समाज और मानवीय मूल्यों में बदलाव आया है। आज कुछ ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं जो महिलाओं के प्रति सम्मान के दृष्टिकोण पर सवाल उठाती हैं। क्या हर महिला को सिर्फ इसलिए सम्मान देना उचित है क्योंकि वह महिला है? यह एक जटिल प्रश्न है जिसका जवाब सामाजिक, नैतिक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
महिलाओं का ऐतिहासिक स्वरूप
पहले के समय में महिलाएं परिवार और समाज की रीढ़ मानी जाती थीं। सीता, सावित्री और गांधारी जैसे पौराणिक चरित्रों से लेकर रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं तक, महिलाओं ने त्याग, बलिदान और नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत किया। उनके जीवन में प्रेम, करुणा और परोपकार जैसे गुण प्रमुख थे। समाज में उनकी छवि ऐसी थी कि लोग स्वाभाविक रूप से उनका सम्मान करते थे।
आधुनिक समय में बदलाव
आज का युग स्वतंत्रता, शिक्षा और सशक्तिकरण का है। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जो समाज को झकझोर देती हैं। कुछ महिलाएं गलत रास्तों पर चल पड़ती हैं, जैसे:
- प्रेम प्रसंगों में अपराध: प्रेमी के साथ गुप्त संबंधों के चलते सास-ससुर या बच्चों की हत्या जैसी घटनाएं।
- सेक्स और स्वार्थ के लिए हिंसा: व्यक्तिगत स्वार्थ या यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए हत्या या छल-कपट।
- नैतिक पतन: परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारी को नजरअंदाज कर गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होना।
ऐसी घटनाएं न केवल कानूनी अपराध हैं, बल्कि समाज में महिलाओं की सामान्य छवि को भी प्रभावित करती हैं।
क्या सभी महिलाओं को सम्मान देना उचित है?
यह सच है कि हर महिला के माथे पर यह नहीं लिखा होता कि वह क्रूर या अपराधी है। लेकिन कुछ महिलाओं के कृत्यों के कारण पूरे समुदाय को एक ही दृष्टिकोण से देखना भी गलत है। सम्मान एक ऐसी चीज है जो व्यक्ति के चरित्र, कर्म और व्यवहार पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल लिंग पर।
सच ये है की भारतीय सभ्यता में महिलाओं को स्वतंत्रता तो आदिकाल से थी लेकिन वर्तमान शिक्षा और पाश्चात्य पद्द्ति ने उनको स्वछंदता प्रदान कर दी है, अब वो पुरुषो की बराबरी की बात तो करती है लेकिन जिम्मेदारी पुरुषो की संस्कार वान परुष की बराबरी के बजाये स्वछंद, और आवारा पुरुषो की बराबरी करने की चाहत है जो दारू, सिगरेट, जुआ और रात में लफंदरबाजी करते है।
महिला सशक्तिकरण का उदाहरण उनके आज लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई, सरोजिनी नायडू, अन्नपूर्णा देवी या अन्ना जार्ज मलहोता या किरणबेदी जैसे महिलाये नहीं है वल्कि ऐसी महिलाये है जिनका अस्तित्व आज है कल नहीं होगा, ये महिलाओ को सोचना है की उनका सशक्तिकरण वास्तविक सशक्तिकरण है या छद्म
- सकारात्मक दृष्टिकोण: जो महिलाएं आज भी परिवार, समाज और देश के लिए समर्पित हैं, उनकी प्रशंसा और सम्मान करना स्वाभाविक है।
- नकारात्मक दृष्टिकोण: जो महिलाएं अपराध, छल या हिंसा में लिप्त हैं, उनके प्रति सम्मान की भावना रखना कठिन है।
समाज की जिम्मेदारी
सम्मान का प्रश्न केवल महिलाओं तक सीमित नहीं है। समाज को भी आत्ममंथन करना होगा कि ऐसी घटनाओं के पीछे क्या कारण हैं। शिक्षा, संस्कार, आर्थिक दबाव, या सामाजिक अपेक्षाएं कहीं न कहीं इन अपराधों को बढ़ावा दे रही हैं। हमें चाहिए:
- महिलाओं का सशक्तिकरण: सही शिक्षा और नैतिक मूल्यों का प्रसार।
- सामाजिक जागरूकता: अपराधों के प्रति कठोर रुख और कानूनी कार्रवाई।
- संतुलित दृष्टिकोण: सभी को एक ही चश्मे से न देखकर व्यक्ति के कर्मों के आधार पर सम्मान देना।
निष्कर्ष
महिलाएं समाज का अभिन्न हिस्सा हैं और उनकी सकारात्मक भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन कुछेक की गलत हरकतों के कारण सभी को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है। सम्मान उनके कर्मों और चरित्र का दर्पण होना चाहिए। समाज को चाहिए कि वह महिलाओं को सशक्त बनाए, उनके सकारात्मक योगदान को प्रोत्साहित करे और अपराधी प्रवृत्ति वालों के खिलाफ कठोर कदम उठाए। तभी हम एक संतुलित और सम्मानजनक समाज की रचना कर सकते हैं।

































