कन्नौज समाचार उत्तर प्रदेश के कन्नौज मे छिबरामऊ। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण व रामलला प्रतिमा स्थापना को लेकर साल 1990 की पहली कारसेवा की घोषणा पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने कारसेवकों पर कड़ा पहरा लगाते हुए अयोध्या में पक्षियों को भी पर न मारने देने का एलान किया था। सरकार की चुनौती स्वीकार कर इलाके से भी कारसेवकों का जत्था अयोध्या रवाना हुआ था। सरकार की आंखों में धूल झोंक कारसेवक अयोध्या पहुंचे और कारसेवा का संकल्प पूरा किया। मोहल्ला बजरिया निवासी कारसेवक राकेश मिश्रा ने अयोध्या पहुंचने में हुई दुश्वारियों को बताते हुए कहा कि बजरंग दल के जिला संयोजक अरुण गुप्ता के नेतृत्व में कारसेवा के लिए 21 अक्टूबर 1990 को रवाना हुए थे।
ट्रेन से लखनऊ पहुंचने पर कारसेवकों को पकड़कर जेल भेजे जाने की जानकारी हुई। तब बस से बस्ती बहराइच होते हुए अयोध्या पहुंचे। छुपते-छुपाते 22 अक्टूबर को महंत गोपालदास महाराज की मणिराम छावनी पहुंचे। कारसेवकों के पहुंचने की सूचना सरकार ने यहां कर्फ्यू लगा दिया गया। सरकार की सख्ती के कारण 30 अक्टूबर कारसेवा के लिए निर्धारित किया गया। विश्व हिंदू परिषद के अशोक सिंघल के नेतृत्व में कारसेवा के लिए कारसेवक सड़कों पर निकल पड़े। हनुमान गढ़ी पर सुरक्षा कर्मियों ने फायरिंग व आंसू गैस के गोले छोड़ने शुरू कर दिए, जिससे भगदड़ मच गई। धुंआ छटने के बाद सड़कों पर चारों तरफ बिखरे कारसेवकों के जूते और चप्पलें सरकार की रामभक्तों के प्रति नफरत को बयां कर रहे थे।
किसी तरह छुपते छुपाते काकभुसुंड और सीता रसोई पहुंचे और कुछ कारसेवक गुंबद तक पहुंच गए। इसी बीच हुई फायरिंग में कई कारसेवक घायल हुए थे। भगदड़ में कारसेवक साथियों से बिछड़ने के बाद पैदल ही किसी तरह सरयू नदी के किनारे पहुंचे और वहां से एक नवंबर को छिबरामऊ के लिए लौट आए। आज जब अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा की घड़ी नजदीक आ चुकी है, सनातन धर्मियों के लिए इससे ज्यादा शुभ घड़ी दूसरी नहीं हो सकती है। प्रत्येक व्यक्ति को घी के दिए जलाकर उनका स्वागत करना चाहिए।

































