हमारे राष्ट्र निर्माताओं ने सोचा होगा की भारतीय लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि वह संवाद, मर्यादा और संस्थागत गरिमा का नाम है। संसद, जिसे कभी लोकतंत्र का मंदिर कहा जाता है, वहाँ शब्द केवल बोलने के लिए नहीं होते — वे इतिहास बनाते हैं। लेकिन आज की राजनीति जिस दिशा में जा रही है, वह इस मूल भावना को गंभीर चोट पहुँचा रही है।
हाल ही में संसद परिसर में घटित एक घटना ने इसी सवाल को फिर से केंद्र में ला दिया है।
“ये आ रहे हैं मेरे गद्दार मित्र” — एक असहज क्षण
संसद में जब Rahul Gandhi अपने सांसदों के बीच मौजूद थे, उसी दौरान केंद्रीय मंत्री Ravneet Singh Bittu वहाँ पहुँचे।
कथित रूप से राहुल गांधी ने उन्हें देखकर कहा —
“ये आ रहे हैं मेरे गद्दार मित्र।”
यह वाक्य केवल एक व्यक्तिगत तंज नहीं था। यह एक ऐसा कथन था जो संसदीय संस्कृति, राजनीतिक शिष्टाचार और लोकतांत्रिक मर्यादा — तीनों पर सवाल खड़े करता है।
राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं। दल बदलना, विचार बदलना, गठबंधन बदलना — यह सब लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। लेकिन किसी निर्वाचित सांसद या मंत्री को सार्वजनिक रूप से “गद्दार” कहना, वह भी संसद जैसे मंच के संदर्भ में, क्या स्वीकार्य है?
पलटवार: आरोपों की राजनीति
इस टिप्पणी के बाद केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू का पलटवार और भी तीखा रहा। उन्होंने कहा:
- “गांधी परिवार सिखों का कातिल है”
- “जब मैं कांग्रेस में था, तब अच्छा था; BJP में आया तो खराब हो गया”
- “राहुल गांधी मेरे साथ मारपीट करने के लिए आगे बढ़े”
यह बयानबाज़ी भी कम गंभीर नहीं है।
यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या राजनीतिक मतभेद अब इतिहास, समुदाय और व्यक्तिगत आरोपों की आड़ में बदले जा रहे हैं?
एक गलत बयान का जवाब दूसरा और अधिक भड़काऊ बयान बन जाए — तो फिर फर्क क्या रह जाता है?
सवाल शब्दों का नहीं, सोच का है
यह लेख न तो राहुल गांधी का बचाव है, न ही रवनीत बिट्टू का समर्थन। सवाल इससे कहीं बड़ा है।
“गद्दार” — यह शब्द भारतीय इतिहास में बहुत भारी है।
यह शब्द अंग्रेज़ों के दौर में स्वतंत्रता सेनानियों पर इस्तेमाल हुआ।
यह शब्द देशद्रोह, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार से जुड़ा रहा है।
तो फिर सवाल उठता है:
- क्या एक सांसद, जो संविधान के तहत शपथ लेकर संसद पहुँचा है, उसे इस तरह संबोधित किया जा सकता है?
- क्या दल बदलना गद्दारी है, या लोकतांत्रिक स्वतंत्रता?
- और अगर आज “गद्दार मित्र” कहा जा सकता है, तो कल क्या कहा जाएगा?
संसद की गरिमा कहाँ गई?
भारतीय संसद कोई चाय की दुकान नहीं है, जहाँ शब्दों की कोई कीमत न हो।
वह एक ऐसा संस्थान है जहाँ विचारों की टकराहट होनी चाहिए, अपमान की नहीं।
जब संसद के भीतर या उससे जुड़े संदर्भों में:
- व्यक्तिगत हमले होते हैं,
- समुदायों को घसीटा जाता है,
- और इतिहास को हथियार बनाया जाता है,
तो नुकसान किसी एक नेता का नहीं होता —
नुकसान लोकतंत्र की आत्मा का होता है।
राजनीति बनाम नाटक
आज की राजनीति में एक खतरनाक प्रवृत्ति दिख रही है —
राजनीति कम, नाटक ज़्यादा।
बयान ऐसे दिए जाते हैं जो:
- सुर्खियाँ बनें,
- सोशल मीडिया पर वायरल हों,
- समर्थकों को उत्तेजित करें,
भले ही उससे संस्थानों की साख गिरे।
यह वही राजनीति है जहाँ:
- बहस मुद्दों पर नहीं, व्यक्तियों पर होती है;
- समाधान पर नहीं, आरोपों पर ऊर्जा लगती है।
क्या हर असहमति गद्दारी है?
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है — असहमति।
अगर असहमति ही गद्दारी हो जाए, तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क क्या रहेगा?
आज अगर:
- कांग्रेस छोड़ने वाला “गद्दार” है,
- BJP छोड़ने वाला “अवसरवादी” है,
- और सवाल पूछने वाला “एंटी-नेशनल”,
तो फिर ईमानदार राजनीति की जगह कहाँ है?
जनता को क्या सोचना चाहिए?
यह घटना हमें किसी एक नेता के पक्ष या विपक्ष में खड़ा होने को मजबूर नहीं करती, बल्कि यह सोचने को मजबूर करती है कि:
क्या हम ऐसी राजनीति चाहते हैं जहाँ शब्द ज़हर बन जाएँ?
क्या हम संसद को भी सोशल मीडिया की तरह बनते देखना चाहते हैं?
और क्या हम चुप रहकर इस गिरते स्तर के भागीदार बन रहे हैं?
लोकतंत्र केवल नेताओं से नहीं चलता।
वह नागरिकों की अपेक्षाओं से चलता है।
अगर जनता केवल तमाशा देखेगी,
तो नेता तमाशा ही दिखाएँगे।
निष्कर्ष: अभी भी समय है
आज की राजनीति में सबसे बड़ी कमी विचारधारा की नहीं, संयम की है।
नेताओं को यह याद रखना होगा कि वे केवल पार्टी का नहीं, देश की संसद का प्रतिनिधित्व करते हैं।
और हमें, नागरिकों को, यह तय करना होगा कि:
- हमें बयानबाज़ी चाहिए या समाधान,
- अपमान चाहिए या गरिमा,
- और शोर चाहिए या सार्थक बहस।
क्योंकि अगर संसद की भाषा गली-मोहल्ले जैसी हो जाएगी,
तो लोकतंत्र का भविष्य केवल चुनावी नारे बनकर रह जाएगा।
अब सवाल यह नहीं है कि किसने क्या कहा,
सवाल यह है कि — क्या हम इसे सामान्य मान लें?

































