द्रोणाचार्य ने एकलव्य को अपना छात्र स्वीकार नहीं किया, इसका कारण महाभारत में वर्णित सामाजिक और नैतिक संदर्भों से जुड़ा है। यह घटना द्रोणाचार्य के कर्तव्य, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था और उनके द्वारा ली गई प्रतिज्ञा से प्रभावित थी। बहुत से नरेटिव ने ये साबित करने की कोशिश की है की द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शूद्र होने के कारण शिक्षा नहीं थी लेकिन ये वास्तव में पूरा का पूरा झूठ है, इसमें कोई सत्यता नहीं।
क्या एकलव्य शूद्र था ?
नहीं, एकलव्य शूद्र नहीं था वल्कि वो निषाद जनजाति के राजा हिरण्यधनुष, आप इसे ऐसे समझ समझ सकते है की वो भी एक राजा का ही पुत्र था और उसके पिता किसी के यहाँ सेवक का काम नहीं करते थे तो उनको शूद्र कहना गलत है।
एकलव्य फिर क्या था ?
एकलव्य भी एक राजा का ही पुत्र था और निषाद थे, वैसे तो निषाद का मुख्य काम होता है नाव के द्वारा नदी पार करवाना और उसके द्वारा जीवन यापन करना लेकिन कालांतर में सभी एक जुट होकर अन्यकार्यो को भी करने लगे और शक्तिसम्पन्न होने राजा बन गए, वैसे और गहराई में जाए तो आप पाएंगे की एकलव्य देवश्रवा से सम्बंधित है जो की वसुदेव के भाई थे और वासुदेव जी भगवान श्री कृष्ण के पिता थे वो एकलव्य के शूद्र होने का सवाल ही नहीं उठता है, वल्कि एकलव्य भी वृष्णि वंशी क्षत्रिय ही थे, वनो में रहने के कारण आजकल के वर्ग विशेष के लोगो ने उनको अपना मान लिया लेकिन वास्तव में वो अर्जुन के ही रिश्तेदार थे
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द्रोणाचार्य की राज्य के प्रति निष्ठा और कर्तव्य
ये बात सत्य की महाभारत काल में समाज वर्ण व्यवस्था पर आधारित था—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। द्रोणाचार्य एक ब्राह्मण थे और उन्होंने हस्तिनापुर के राजकुमारों (क्षत्रियों) को शिक्षित करने का दायित्व पितामह भीष्म के अनुरोध पर लिया था। और इस कारण वो हस्तिनापुर के राजकुमारों को ही विद्या सिखाने प्रतिबद्ध थे, आजकल की तरह मून लाइटिंग नहीं करते थे की सरकारी मास्टर भी बने रहे और प्राइवेट टूशन भी पढ़ाते रहे, तो ये कहना की एकलव्य को एक शूद्र या निषाद या वनवासी होने के कारन सिखाया ये गलत है, वो हस्तिनापुर राज्य नियुक्त थे तक हस्तिनापुर के लिए लगे रहे, यहाँ तक की जानते हुए की धर्म अर्जुन के साथ है फिर भी हस्तिनापुर का साथ नहीं छोड़ा तो ऐसे राज्य के प्रति निष्ठावान को कैसे वामपंथीओ ने शूद्र और दलित विरोधी बना कर पेश कर दिया जो वास्तव में वो बिलकुल भी नहीं थे
एकलव्य हस्तिनापुर के शत्रु का पुत्र था
जब एकलव्य द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने आये थे तब का वर्णन इस श्लोक में है ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः ।
एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।।
न स तं प्रतिजग्राह नैशादिरीति चिन्त्यन।
शिष्यं धनुषि धर्म ज्ञस्तेषा वानवावेक्ष्य ।। (आदिपर्व 131 | 31 & 32)
यहाँ पर एकलव्य को भी महाराज और उसके पिता को भी निषादराज कहकर सम्बोधित किया है, साथ ही द्रोणाचार्य को धर्मज्ञ आचार्य और कौरवो की और दृस्टि रखकर ऐसा कहा लिखा है, इसके दो मतलब एकदम स्पस्ट है ।
पहला की द्रोणाचार्य धर्म का पालन कर रहे थे और दूसरा एकलव्य शूद्र या निम्न जाति का नहीं था।
द्रोणाचार्य कौन से धर्म का पालन कर रहे थे ?
द्रोणाचार्य के सबसे बड़े शत्रु पांचाल नरेश द्रुपद थे उन्होंने यज्ञ करके एक पुत्र पाया जो द्रोणचार्य की मृत्यु का कारन बने या वध कर सके, और जब दृष्ट्द्युम्न शिक्षा के लिए आया तो उसको भीष्म की अनुमति से द्रोणाचार्य ने ये जानते हुए भी की इसका जन्म उनकी हत्या के लिए हुआ है फिर भी उसको शिक्षा दी, तो एकलव्य को क्यों नहीं दी ?
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इसका कारण स्पस्ट है की धृष्तद्युम्न द्रोणाचार्य के शत्रु का पुत्र था जबकि एकलव्य हस्तिनापुर का पुत्र था, तो एक धर्मज्ञ गुरु कैसे उसी राज्य के शत्रु व्यक्ति को धनुर्विद्या सिखा सकता है जो कल को उसका पालन करने वाले राज्य के विरुद्ध ही युद्ध करने लगे, और आगे इसने जरासंध और शिशुपाल के साथ मिलकर पांडवो से ही वैर किया था
निष्कर्ष
द्रोणाचार्य ने एकलव्य को शिष्य इसलिए नहीं स्वीकार किया क्युकी वो शूद्र था, दलित था या जनजाति का था बिलकुल गलत है, द्रोणाचार्य ने उसे शत्रु राज्य का नागरिक जानकार धनुर्विद्या नहीं सिखाई क्युकी आप अगर श्लोक को समझेंगे तो वहा पर धर्मज्ञ और कौरवो की और देखकर कहा ऐसा लिखा है, यानि की शत्रु देश के नागरिक को वो विद्या न सिखाना जो कल को उसी राज्य के विरुद्ध युद्ध करने लगे जहा गुरु जी है तो निति न्याय और धर्म विरुद्ध हो जायेगा। लेकिन उन मूर्खो का कुछ नहीं हो सकता को विद्या का कारन उसका शूद्र या दलित मानते है

































