भारत में हिंदू मंदिरों के लिए कोई एक केंद्रीय बोर्ड नहीं है जैसा कि वक्फ बोर्ड मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों के लिए होता है। वक्फ बोर्ड का गठन वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत हुआ है, जो पूरे देश में मुस्लिम धार्मिक संपत्तियों (जैसे मस्जिदें, कब्रिस्तान, और दान की गई जमीन) के प्रबंधन के लिए एक केंद्रीकृत व्यवस्था प्रदान करता है। दूसरी ओर, हिंदू मंदिरों का प्रबंधन अलग-अलग तरीकों से होता है और यह ज्यादातर राज्य सरकारों या निजी ट्रस्टों के अधीन है।
हिंदू मंदिरों का प्रबंधन और बोर्ड
- राज्य-स्तरीय व्यवस्था: कई राज्यों में हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए विशिष्ट कानून और संस्थाएं हैं। उदाहरण के लिए:
- तमिलनाडु में हिंदू रिलिजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (HR&CE) विभाग मंदिरों की संपत्ति और प्रशासन को नियंत्रित करता है।
- कर्नाटक में कर्नाटक हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ न्यास अधिनियम के तहत मंदिरों का प्रबंधन होता है।
- आंध्र प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में भी समान व्यवस्थाएं हैं। ये राज्य-स्तरीय बोर्ड मंदिरों की आय, संपत्ति और रखरखाव का प्रबंधन करते हैं, लेकिन ये एक केंद्रीय “हिंदू मंदिर बोर्ड” की तरह काम नहीं करते।
- निजी ट्रस्ट: कई बड़े मंदिर, जैसे तिरुपति बालाजी (तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम) या वैष्णो देवी मंदिर, स्वतंत्र ट्रस्टों द्वारा संचालित होते हैं। इन ट्रस्टों के पास अपने नियम और कानूनी ढांचा होता है।
मंदिरों की जमीन के लीगल कागज
हिंदू मंदिरों की जमीन के लिए लीगल कागजात मौजूद होते हैं, लेकिन यह मंदिर के स्वामित्व और प्रबंधन पर निर्भर करता है:
- राज्य सरकार के अधीन मंदिर: इनके पास जमीन के दस्तावेज राज्य के रिकॉर्ड में दर्ज होते हैं, जैसे खसरा-खतौनी या रजिस्ट्री।
- निजी ट्रस्ट के मंदिर: इनके पास जमीन के स्वामित्व के दस्तावेज ट्रस्ट के नाम पर होते हैं, जो साम respectivे प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन कानूनों के तहत पंजीकृत होते हैं।
- प्राचीन मंदिर: कुछ बहुत पुराने मंदिरों के पास लिखित दस्तावेज नहीं होते, लेकिन ऐतिहासिक उपयोग और सामुदायिक मान्यता के आधार पर उनकी संपत्ति को मान्यता दी जाती है।
वक्फ बोर्ड की संपत्तियों के लिए भी लीगल कागजात होते हैं। वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत, कोई संपत्ति वक्फ की हो सकती है अगर:
- उसे किसी मुस्लिम ने दान किया हो,
- उसका लंबे समय से धार्मिक उपयोग हो रहा हो, या
- सर्वे में उसे वक्फ संपत्ति माना गया हो। हालांकि, वक्फ बोर्ड को यह विशेष अधिकार है कि अगर वह किसी जमीन को अपनी संपत्ति मानता है, तो उसका सबूत देने की जिम्मेदारी मालिक पर होती है, जो विवाद का कारण बनता है। मंदिरों के मामले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है; विवाद होने पर सामान्य नागरिक अदालतों में मामला जाता है।
टैक्स और बिजली सुविधा
- हिंदू मंदिर: मंदिरों को आमतौर पर टैक्स में छूट मिलती है, खासकर अगर वे धार्मिक और चैरिटेबल ट्रस्ट के तहत पंजीकृत हैं (इनकम टैक्स एक्ट की धारा 80G के तहत)। बिजली के लिए, कुछ राज्यों में मंदिरों को सब्सिडी मिलती है, लेकिन ज्यादातर मामलों में वे सामान्य दरों पर बिजली बिल चुकाते हैं। बड़े मंदिर अपनी आय से इसे वहन करते हैं।
- वक्फ बोर्ड: वक्फ संपत्तियों को भी टैक्स में छूट मिलती है, क्योंकि वे धार्मिक और चैरिटेबल उद्देश्यों के लिए होती हैं। बिजली के मामले में, वक्फ बोर्ड की संपत्तियां (जैसे मस्जिदें) भी या तो सब्सिडी का लाभ लेती हैं या अपनी आय से बिल चुकाती हैं। वक्फ बोर्ड स्वयं टैक्स या बिजली प्रदान नहीं करता; यह उसकी संपत्तियों के उपयोग पर निर्भर करता है।
मुख्य अंतर
- हिंदू मंदिरों के लिए कोई एक केंद्रीय बोर्ड नहीं है, जबकि वक्फ बोर्ड एक केंद्रीकृत ढांचे के तहत काम करता है।
- मंदिरों और वक्फ दोनों की संपत्तियों के लीगल कागजात होते हैं, लेकिन वक्फ बोर्ड के पास दावा करने की विशेष शक्ति है, जो मंदिरों के मामले में नहीं है।
- टैक्स और बिजली के मामले में दोनों को छूट मिल सकती है, लेकिन यह सुविधा प्रदान करना बोर्ड या ट्रस्ट का काम नहीं है; यह सरकार या स्थानीय प्रशासन पर निर्भर करता है।

































