कठोर या सम्पूर्ण मंगली होने की स्थिति में यह विवाह करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है, जबकि आंशिक मंगली होने पर इतना आवश्यक नहीं है, तो पहले हम दोनों को समझते है की कुम्भ विवाह क्या है और मांगलिक दोष क्या है।
ऐसे समझें कि कुंभ विवाह क्या है ?
ज्योतिष के अनुसार जब किसी के जन्मकुंडली में 1,4,7,8,12वें स्थान पर मंगल अत्यंत शक्तिशाली होकर बैठा हो, तो ऐसे में जातक अत्यंत मजबूत मंगली कहलाता है। जिसका प्रभाव उसके विवाह पर भी पड़ता है। ऐसे में विवाह में मंगल के प्रभाव को सुनिश्चित करने के लिए ऐसे जातक का कुंभ विवाह कराया जाता है।
वास्तव में इन स्थितियों में बैठे मंगल का प्रभाव 7वें घर पर पड़ता है, वहीं जन्मकुंडली में यह स्थान यानि 7वां घर पत्नी या जीवनसंगनी का होता है। वर वधु के विवाह से पहले जन्मकुंडली के 7वें घर को गहराई से जांचा जाता है, वहीं जब मंगल दोष का प्रभाव 7वें घर पर हो, तो ऐसे में इस दोष को मांगलिक दोष कहा जाता है।
जानकारों के अनुसार मांगलिक दोष लगभग 35 प्रतिशत लोगों की जन्म कुंडली में देखने को मिलता है, जो मंगल दोष की गहराई से जांच करने पर ही पता चलता है।
ऐसे में वर वधु जो मांगलिक दोष या अन्य दोष से प्रभावित है और इसके कारण विवाह टूटने का योग बन रहा है, तो जन्मकुंडली देखने के बाद उन्हें कुम्भ विवाह की सलाह दी जाती है।
तो फिर क्यों किया जाता है कुंभ विवाह-
जब किसी कन्या के जन्म कुंडली में विधवा योग बनता है, तो ऐसे में कुम्भ विवाह संस्कार करके कन्या के इस दोष को दूर किया जाता है।
माना जाता है कि यदि ऐसी किसी कन्या का कुम्भ विवाह का निवारण करे बिना किसी से विवाह कर दिया जाता है तो ऐसी कन्या विधवा हो जाती है इसी से बचने के लिए ज्योतिष के अनुसार कुम्भ विवाह करना बेहद जरुरी हो जाता है।
कुम्भ विवाह पूरे विधि विधान से किया जाता है। जब कन्या के जन्मकुंडली में दो विवाह योग बनते हैं, तो कन्या का कुम्भ विवाह किया जाता है।
यहां ये जान लें कि जिस तरह से किसी व्यक्ति के साथ विवाह पूर्ण किया जाता है, वैसे ही कुम्भ विवाह में भी किसी निर्जीव के साथ कन्या का विवाह किया जाता है। वहीं उत्तर भारत में कुम्भ विवाह भगवान विष्णु की प्रतिमा के साथ किया जाता है।
वहीं यदि किसी कन्या के जन्मकुंडली में वैधव्य योग मिलता है तो कुम्भ-विवाह, विष्णु-विवाह या अश्वाथा-विवाह कुंडली में मांगलिक दोष होने पर किया किया जाता है।
माना जाता है कि जब विवाह इन पद्धतियों में से किसी एक से कर दिया जाए, तो उसके पश्चात मांगलिक दोष से प्रभावित वर वधु का विवाह गैर-मांगलिक दोषयुक्त कुंडली वाले के साथ किया जा सकता है।
ऐसे किया जाता है कुंभ विवाह
मांगलिक दोष को हटाने के लिए कन्या का विवाह पहले मिटटी के बर्तन में स्थापित भगवान विष्णु के साथ किया जाता है। कुम्भ विवाह समारोह बहुत ही सरल तरीके से होता है जिसमें कन्या का विवाह दहेज़ सामग्री सहित किया जाता है, वहीं एक बार जब कुम्भ विवाह सम्पन्न हो जाता है तो फिर भगवान विष्णु की मूर्ति को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है। इस तरह से कुम्भ विवाह सम्पूर्ण किया जाता है।
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