भारत का सांस्कृतिक और धार्मिक तानाबाना विश्व में सबसे प्राचीन और जटिल है। इस भूमि पर हर विचारधारा आई, परंतु जो टिक सका वह या तो उसी में रच-बस गया या फिर उसी की तरह हो गया। ईसाई मिशनरियों ने 16वीं शताब्दी से लेकर ब्रिटिश काल तक भारत को “धर्मांतरण के मैदान” के रूप में देखा, पर उन्हें कई मोर्चों पर भारी असफलता मिली।
इसी काल में डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसी विभूतियाँ भी उभरीं, जिन्होंने जाति व्यवस्था की आलोचना करते हुए हिंदू धर्म की अनेक मान्यताओं को कठघरे में खड़ा किया। परंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि अंबेडकर ने अपनी सारी प्रमुख पुस्तकें अंग्रेज़ी में लिखीं — उस समय जब उनकी स्वयं की जाति के 95% से अधिक लोग पढ़े-लिखे नहीं थे।
यह लेख इसी द्वंद्व को समझने का प्रयास है — धर्मांतरण के प्रयास, भारत की आत्मा की प्रतिरोध क्षमता, और एक बुद्धिजीवी का सत्ता के समीकरणों को साधने का प्रयास।
ईसाई मिशनरियों की भारत में शुरुआत: एक रणनीति
ईसाई मिशनरियों का भारत में व्यवस्थित आगमन 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों के साथ हुआ, विशेष रूप से गोवा में। लेकिन सबसे संगठित, संसाधनयुक्त और राजनीतिक रूप से संरक्षित मिशनरी प्रयास ब्रिटिश राज के दौरान हुए।
लक्ष्य था:
- भारतीयों को ईसाई बनाना
- अंग्रेज़ों की “सभ्यता मिशन” को धार्मिक आवरण देना
- धर्मांतरण के माध्यम से राजनैतिक वर्चस्व को स्थायी बनाना
पर ये मिशनरियाँ जिन विशाल और आध्यात्मिक दीवारों से टकराईं, वे थीं:
1. हिंदू धर्म की गहरी जड़ें और विविधता
एकेश्वरवाद को ही अंतिम सत्य मानने वाली ईसाई विचारधारा को यह समझ पाना कठिन था कि एक ही घर में माँ दुर्गा की पूजा हो रही है और पिता विष्णु की।
2. शास्त्रों की तर्कशक्ति
ईसा मसीह के जन्म और उद्धार की कहानियाँ जब गीता, उपनिषद, वेदांत के आगे प्रस्तुत की गईं तो मिशनरियों को विवेकानंद, दयानंद, और गान्धी जैसे विद्वानों से गहरी चुनौती मिली।
3. धार्मिक स्वतंत्रता की भावना
भारतीय समाज में कोई भी एक व्यक्ति किसी विचार से असहमत हो सकता था, लेकिन वह जबरन धर्म न बदलता — यह आज़ादी हिंदू धर्म की आत्मा में थी।
4. राष्ट्रवादी आंदोलनों का प्रतिरोध
स्वतंत्रता संग्राम के नेता ईसाई धर्मांतरण को ब्रिटिश विस्तारवाद का हिस्सा मानते थे। गांधी स्पष्ट रूप से कहते थे –
“धर्मांतरण, सेवा का परिणाम नहीं बल्कि आक्रामक प्रचार है।”
Ambedkar का अंग्रेज़ी प्रेम: सामर्थ्य या रणनीति?
अब सवाल उठता है कि जब मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन के लिए अंग्रेज़ी और शक्ति का प्रयोग कर रही थीं, तब डॉ. अंबेडकर ने भी ‘Annihilation of Caste’ (1936), ‘The Buddha and His Dhamma’, ‘Riddles in Hinduism’ जैसी सभी प्रमुख कृतियाँ अंग्रेज़ी में क्यों लिखीं?
1. किसको था संबोधन?
- उनके लेखन का प्रारंभिक उद्देश्य उनके समुदाय को शिक्षित करना नहीं था, क्योंकि वे जानते थे कि अधिकांश “अस्पृश्य” वर्ग तब साक्षर नहीं थे।
- उनका वास्तविक टारगेट था:
- ब्रिटिश शासक वर्ग
- पश्चिमी बुद्धिजीवी
- भारतीय उच्चवर्गीय हिंदू समाज जो अंग्रेज़ी में संवाद करता था
2. रणनीति: अंग्रेजों के सामने एक नया राजनीतिक साझेदार प्रस्तुत करना
ब्रिटिश साम्राज्य उस समय सत्ता-संक्रमण के दौर में था। अंबेडकर यह दिखाना चाहते थे कि यदि अंग्रेज सत्ता हस्तांतरण करते हैं, तो उन्हें केवल गांधी, नेहरू और कांग्रेस पर नहीं, बल्कि अछूत वर्गों के एक अलग नेतृत्व पर भी विचार करना चाहिए।
उन्होंने ‘Depressed Classes’ (दलित) को एक राजनीतिक पहचान देने का प्रयास किया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत को यह संदेश जाए कि –
“यदि आप हमें सत्ता में भागीदारी देंगे, तो हम आपके प्रति निष्ठावान रहेंगे।”
3. धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धर्म के विरुद्ध युद्ध
अंबेडकर का धर्मनिरपेक्षता का दृष्टिकोण ईश्वर के अस्तित्व की जगह बुद्धि और तर्क पर आधारित था।
उनकी किताब “Riddles in Hinduism” में उन्होंने राम, कृष्ण, वेद, और ब्राह्मण ग्रंथों पर तीखे और कटु प्रहार किए — इतने कि यह पुस्तक महाराष्ट्र सरकार को लंबे समय तक प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं हुई।
विवेकानंद, गांधी, गोयल और रामस्वरूप की भिन्नता
अंबेडकर की आलोचनाओं को कई प्रमुख भारतीय विचारकों ने एकतरफा और भ्रामक माना।
- महात्मा गांधी ने अस्पृश्यता को हिंदू समाज की भूल बताया, पर उन्होंने कभी धर्म परिवर्तन का समर्थन नहीं किया।
- रामस्वरूप और सीताराम गोयल जैसे लेखकों ने अंबेडकर की तुलना मार्क्सवादी प्रचारकों से की, जो भारत के विरुद्ध बौद्धिक औपनिवेशिकता को हवा देते हैं।
धर्मांतरण बनाम आध्यात्मिक नवजागरण
जहाँ मिशनरियाँ और अंबेडकर जैसे बुद्धिजीवी धर्म की आलोचना के सहारे सत्ता और सामाजिक परिवर्तन की बात करते थे, वहीं हिंदू संत और परंपरा आध्यात्मिक उत्कर्ष द्वारा समाज परिवर्तन की बात करते थे।
| दृष्टिकोण | उद्देश्य | साधन |
|---|---|---|
| मिशनरियाँ | सत्ता + आत्मा का नियंत्रण | धर्मांतरण |
| अंबेडकर | जातिगत विद्रोह | बौद्ध धर्म, अंग्रेज़ी लेखन |
| गांधी, गोयल, विवेकानंद | सुधार भीतर से | आत्मशुद्धि, सेवा, संवाद |
Ambedkar का अंग्रेज़ी लेखन केवल बौद्धिकता नहीं था, यह राजनीतिक और औपनिवेशिक परिदृश्य में एक रणनीति थी — ब्रिटिश सत्ता को यह दिखाने की कि “हिंदू समाज टूट चुका है, और हम उसके विकल्प हो सकते हैं।”
वहीं, ईसाई मिशनरियों की सबसे बड़ी विफलता यह थी कि वे भारत की आत्मा को कभी समझ नहीं सके — एक ऐसी आत्मा जो विविधता में एकता, और आलोचना में सुधार को जगह देती है, परन्तु परकीय वर्चस्व को कभी स्वीकार नहीं करती।




















