सुप्रीम कोर्ट के जज साहब के ऍम जोसफ जो की 17 जून 2023 को रिटायर हो रहें हैं और खुद को एक महान न्यायविद भी मानते होंगे शायद इसलिए उन्होंने न तो केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने का मौका दिया और न तो याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण पुराने फैसलों का हवाला देने दिया।
आप सोच रहे होंगे की हम ये क्यों बता रहे है, क्या जरूरत है सप्रीम कोर्ट के जज को ऐसे संदर्भित करने की, जरूरत है क्युकी भारत में कानून का राज है, देश संविधान से चलता है, लेकिन वास्तव में ये सिर्फ कहने सुनने मे ही अच्छा लगता है की भारत में कानून का राज है लेकिन अगर यही सच है तो उसी कानून के अधीन चलते हुए न्यायाधीशों के फैसले अलग अलग क्यों होते हैं ? कभी सोचा है ? नहीं सोचा होगा क्युकी पिछली सरकारों ने आपको इतनी स्वतंत्र सोच विकसित करने की स्वतंत्रता ही नहीं दी थी !
क्या था मामला ?
सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति केएम जोसफ ने आक्रांताओं के नाम पर बने शहरों के नाम बदलने की मांग वाली अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका को 20 मिनिट में खारिज कर दिया और लंबा चौड़ा बयान दिया जो की कानून के दायरे मे नही आता है. न्यायाधीश को अपने फैसले के द्वारा बात रखनी चाहिए. इन दिनों एक नई पद्धति बन गई है कि न्यायाधीश अपने विचार मौखिक रुप से व्यक्त करते हैं लेकिन ऑर्डर में नहीं लिखवाते हैं.
कोर्ट की समान्य प्रक्रिया चलती तो इस तरह की जनहित याचिका पर 5-6 साल सुनवाई चलती लेकिन जिस तरह 20 मिनिट मे फैसला हुआ वह आश्चर्यजनक है। जोसफ साहब 17 जून को रिटायर हो रहें हैं इसलिए न तो उन्होंने केंद्र सरकार को अपना पक्ष रखने का मौका दिया और न तो अश्विनी उपाध्याय को सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देने दिया।
अश्विनी उपाध्याय बार बार कहते रहे कि यह केवल भारत की संप्रुभता का मुद्दा नहीं है बल्कि भारतीयों के राइट टू डिग्निटी, राइट टू आइडेंटिटी, राइट टू रिलीजन, राइट टू कल्चर और राइट टू इनफॉर्मेशन का भी मुद्दा है इसलिए वह लिखित बहस करना चाहते हैं लेकिन जज साहब ने उन्हें लिखित बहस की अनुमति नहीं दिया.
किन किन का उदाहरण दिया ?
उपाध्याय ने जोसफ साहब से कहा कि जिन स्थानों का जिक्र कुरान में है वे उसी नाम से आज भी अरब में हैं और इसी प्रकार जिन स्थानों का जिक्र बाइबल में है वे भी उसी नाम से पाए जाते हैं लेकिन आक्रांताओं द्वारा नाम बदलने के कारण जिन स्थानों का वर्णन वेद पुराण गीता रामायण में है वे भारत में नहीं मिलते हैं और इसलिए कुछ लोग हमारे वेद, पुराण, गीता, रामायण और महाभारत को काल्पनिक कहते हैं।
हमारे 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ है कीर्तेश्वरी । यहां पर माता का मुकुट गिरा था लेकिन मुर्शिद खां नामक आक्रांता ने कीर्तेश्वरी शक्तिपीठ को तोड़ने के बाद उस पवित्र पौराणिक धर्मस्थल का नाम बदलकर मुर्शिदाबाद कर दिया और इसी प्रकार विंध्याचल शक्तिपीठ को मिर्जा ने मिर्जापुर बना दिया।
भगवान विष्णु के छठवें अवतार हैं भगवान परशुराम और उनके पिताजी का नाम है महर्षि जमदग्नि और माता जी का नाम है रेणुका। माता रेणुका के जन्मस्थान पर महर्षि जमदग्नि का आश्रम था और उस स्थान को जमदग्निपुरम कहते थे लेकिन जौना खां ने जमदग्नि पुरम को जौनपुर बना दिया। राजा जनक द्वारा निर्मित शहर का नाम था विदेह और इसलिए हम लोग माता सीता को वैदेही भी कहते हैं लेकिन मुजफ्फर खान ने विदेह को मुजफ्फरपुर बना दिया।
महाभारत काल का वर्णन हुआ
युद्ध टालने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों से पांच गांव मांगा था 1. इंद्रप्रस्थ, 2. सोनप्रस्थ, 3. पानप्रस्थ, 4. व्याघ्रप्रस्थ, 5. तिलप्रस्थ। इंद्रप्रस्थ को दिल्ली कहते हैं, सोनप्रस्थ को सोनीपत कहते हैं, पानप्रस्थ को पानीपत कहते हैं, व्याघ्रप्रस्थ को बागपत कहते हैं और तिल प्रस्थ को फरीद खान ने फरीदाबाद बना दिया। महारानी द्रौपदी के पिता पांचाल के राजा थे इसलिए द्रौपदी को पांचाली कहते हैं लेकिन फरुख खान ने पंचाल को फर्रुखाबाद बना दिया। अज्ञातवास के समय पांडवों ने राजा विराट के यहां शरण लिया था और बाद में विराट नरेश ने अपनी पुत्री का विवाह अभिमन्यु से किया था लेकिन होशियार खान ने विराट को होशियारपुर बना दिया। इसी प्रकार गज प्रस्थ को गाजी खान ने गाजियाबाद बना दिया।
किन किन के नाम किस किस ने बदले !
अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि बेगू खान ने अजातशत्रु नगर को बेगूसराय बना दिया, शरीफउद्दीन ने नालंदा बिहार को बिहार शरीफ बना दिया, दरभंग खान ने द्वारबंगा को दरभंगा बना दिया, हाजी शमसुद्दीन ने हरिपुर को हाजीपुर बना दिया, जमाल खान ने सिंहजानी को जमालपुर बना दिया, अहमदशाह ने कर्णावती को अहमदाबाद बना दिया, बुरहान ने भ्रुगूपुर को बुरहानपुर बना दिया, होशंगशाह ने नर्मदापुरम को होशंगाबाद बना दिया और अहमद शाह ने अंबिकापुर को अहमदनगर बना दिया।
मानसिक रूप से अस्थिर तुगलक ने देवगिरी को तुगलकाबाद बना दिया, उस्मान अली ने धाराशिव को उस्मानाबाद बना दिया, फरीद खान ने मोकल हार को फरीदकोट बना दिया, मुराद खान ने रामगंगा नगर को मुरादाबाद बना दिया, मुजफ्फर खान ने लक्ष्मीनगर को मुज्जफरनगर बना दिया, शाहजहाँ ने गोमती नगर को शाहजहाँपुर बना दिया और बख्तियार खिलजी ने नालंदा को बख्तियार पुर बना दिया
इसी प्रकार करीमुद्दीन ने करीमनगर बना दिया, महबूब खान ने महबूब नगर बना दिया, अली मीर जाफर ने अलीपुर बना दिया, निजाम ने भाग्यनगर को हैदराबाद बना दिया, इंदूर को निजामाबाद बना दिया, भिठौरा को फतेहपुर बना दिया, हरिगढ़ को अलीगढ़ बना दिया, अंबिका नगर को अमरोहा बना दिया, आर्यमगढ़ को आजम गढ़ बना दिया, जसनौल को बाराबंकी बना दिया और गाधिपुर को गाजीपुर बना दिया।
क्या और भी स्थल है भारत में ?
अश्विनी उपाध्याय ने कोर्ट से कहा कि उपरोक्त स्थानों के अतिरिक्त भी कई अन्य ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थान हैं जिनका नाम विदेशी आक्रांताओं ने जानबूझकर बदला था ताकि कुछ वर्ष के बाद वेद, पुराण, गीता, रामायण और महाभारत को एक काल्पनिक ग्रंथ बताया जा सके। यह केवल भारत की संप्रभुता का विषय नहीं है बल्कि भारतीयों के सम्मान और पहचान के साथ साथ धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का भी विषय है इसलिए मैं आपसे विनम्र निवेदन करता हूं कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का मूल नाम पता करने के लिए तत्काल एक नामकरण आयोग बनाएं।
जनहित याचिका की क्या है प्रकिया ?
सामन्यतया जब मुख्य न्यायाधीश कोई जनहित याचिका नहीं सुन पाते हैं तो उसे अगले सीनियर न्यायाधीश को भेजते हैं लेकिन अश्विनी उपाध्याय की Renaming Commission की मांग वाली जनहित याचिका को मुख्य न्यायाधीश ने दूसरे सीनियर न्यायमूर्ति जस्टिस कौल को भेजने की बजाय तीसरे सीनियर जोसफ साहब को भेजी. वर्तमान प्रक्रिया में कौन किस केस को सुनेगा इसका फैसला सिर्फ और सिर्फ मुख्य न्यायाधीश करते हैं. कोई फैसला वो क्यों लेते हैं, किस आधार पर लेते हैं इस पर कोई कारण देने की जरूरत नहीं है. इस प्रणाली को Master of the Roster कहा जाता है. एक बार चार न्यायाधीशों ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इस प्रणाली पर रोष जताया था तक दीपक मिश्रा मुख्य न्यायाधीश थे.
क्या सुप्रीम कोर्ट के जज भगवान है ?
आप प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति के किसी भी निर्णय पर आपत्ति कर सकते हैं लेकिन मुख्य न्यायधीश के कई ऐसे अधिकार हैं जिस पर आगे कोई सुनवाई नहीं है. लगभग भगवान का स्वरूप हैं जब तक की वह कुर्सी पर बैठे हैं और इसीलिए माय लॉर्ड कहा जाता है
मूल मुद्दा यह है कि उसी कानून से जब अलग न्यायाधीश अलग अलग फैसले देते हैं तो राज कानून का हुआ कि जो न्यायाधीश मामले को सुन रहे हैं उनका?
इसी के चलते भारत की अदालतों मे कौन मामले की सुनवाई कर रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है बजाय इसके की मामला क्या है. इसके भी ऊपर कौन वकील है उसका महत्व और भी अलग है.
न्याय प्रक्रिया को कुटिल वकील क्यों प्रभावित कर देते हैं. क्या पेचीदगी है हमारे कानून में की विद्वान न्यायाधीश को एक वकील एक तरफ मोड़ देता है और दूसरा वकील दूसरी तरफ. क्यों वकील के तर्कों से न्यायाधीश प्रभावित हो जाते हैं. क्या वकील न्यायाधीशों से कानून को ज्यादा समझते हैं. कितने ही फैसले देख लीजिये जहां न्यायाधीश का रुख, झुकाव कानून पर भारी पड़ता है.
क्या हुआ जिसपे संदेह हो रहा है ?
अश्विनी उपाध्याय की धर्मांतरण विरोधी केंद्रीय कानून की मांग वाली जनहित याचिका को नंबर-4 सीनियर न्यायमूर्ति शाह सुन रहे थे. किसी ने कोई प्रार्थना नहीं की की बेंच बदलनी है लेकिन मुख्य न्यायाधीश ने अचानक फैसला किया कि उपाध्याय की यह याचिका वह स्वयं सुनेंगे मानो न्यायमूर्ति शाह ठीक से अपना काम नहीं कर रहे थे. यह बताना आवश्यक है कि जस्टिस शाह जब कोर्ट नंबर 7 में बैठते थे तब उन्होंने केंद्र सरकार से ज़बाब मांगा था और प्रमोट होते होते उन्होंने कोर्ट 4 में पहुंचने तक यह याचिका सुना था। 9 जनवरी को सुनवाई के बाद जस्टिस शाह ने 7 फरवरी को अंतिम सुनवाई के लिए डेट फिक्स कर दिया था लेकिन एकाएक चीफ जस्टिस चंद्र चूड़ ने इस याचिका को अपने कोर्ट में लगा दिया
यह हाल तो सुप्रीम कोर्ट का है. हाई कोर्ट और जिला अदालतों मे जाएं तो हाल और भी बुरा हे. वकील वो अच्छा नहीं जो कानून जानता हो, वकील वह अच्छा है जो जज साहब को जानता हो. इसलिए सोचना पड़ता है की भारत में कानून का राज है या न्यायाधीश का.
शायद अब समय आ गया है की हमको न्यायायलो की पारदर्शिता पर भी प्र्शन पूछने चाहिए, ये हर नागरिक का अधिकार है।


































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