IIT… ये तीन अक्षर करोड़ों भारतीय युवाओं के लिए सपनों की मंज़िल हैं। स्कूल के दिनों से ही हर कोई सुनता है – “अगर ज़िंदगी में कुछ बड़ा करना है तो IIT में जाना पड़ेगा।” फिर दिन-रात की मेहनत, कोचिंग क्लासेस, mock tests और endless competition के बाद कोई जब IIT में पहुंचता है तो लगता है कि अब ज़िंदगी आसान हो जाएगी।
लेकिन हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा सख़्त होती है। कुछ साल पहले जिन छात्रों ने रात-दिन मेहनत कर इस प्रतिष्ठित संस्थान में प्रवेश पाया, वही यहाँ आकर इतनी गहरी निराशा में क्यों डूब जाते हैं कि आत्महत्या तक का कदम उठा लेते हैं?
1. प्रवेश की सफलता के बाद असली युद्ध शुरू होता है
IIT में पहुँचने के बाद छात्र को लगता है कि अब मंज़िल पूरी हो गई, लेकिन असली सफ़र तो तभी शुरू होता है। यहाँ के पाठ्यक्रम बेहद कठिन, और ग्रेडिंग सिस्टम पूरी तरह रिलेटिव होता है।
- पहले जो स्कूल या कोचिंग का टॉपर था, IIT में आकर देखता है कि हर कोई टॉपर है।
- क्लास में थोड़ा भी पिछड़ गए तो ग्रेड्स गिर जाते हैं, और फिर अपने आप को साबित करने का दबाव पहाड़ बन जाता है।
- कुछ छात्रों की मानसिक तैयारी इतनी मजबूत नहीं होती कि वे इस प्रेशर को झेल सकें।
2. आरक्षण या छूट से आए छात्रों पर दोगुना दबाव
IIT में कई छात्र आरक्षण या अंकों में छूट पाकर प्रवेश पा लेते हैं। इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब आती है जब –
- उन्हें पता चलता है कि यहाँ का स्तर उनकी पिछली तैयारी से कई गुना कठिन है।
- वो पहले से रूटीन में मेहनत के आदी नहीं रहे होते, और यहाँ बिना मेहनत के टिकना संभव नहीं।
- ऊपर से Ego भी आड़े आता है – “हम IIT आकर कैसे मान लें कि हमसे नहीं हो पा रहा? दूसरों को क्या मुँह दिखाएँगे?”
ये दोहरा बोझ – कमज़ोर तैयारी + खुद को साबित करने का अहं – मन को भीतर से तोड़ देता है। और जब छात्र अपनी कमजोरी किसी से कह नहीं पाता, तो वो दबाव धीरे-धीरे जानलेवा हो जाता है।
3. अकेलापन और डर को दबाना
ज़्यादातर छात्र पहली बार घर से दूर जाते हैं। नई जगह, नए लोग, अलग भाषा और संस्कृति…
- कोई समझाने वाला नहीं, परिवार और पुराने दोस्त दूर।
- साथ ही डर लगता है कि कहीं अपनी कमजोरी बताई तो लोग जज न कर दें।
- ऐसे में छात्र अपना डर दबाते रहते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यही डर मानसिक तनाव में बदलता है।
4. असल ज़िंदगी की हकीकत से टकराना
इंजीनियरिंग के बाद ज़िंदगी हमेशा आसान नहीं होती।
- कोई AC वाले ऑफिस में आराम करता है तो कोई कड़ी धूप में फील्ड वर्क करता है।
- कोई अच्छे साथी और अच्छे बॉस पाता है तो कोई बुरे लोग और बुरे बॉस भी झेलता है।
इसलिए IIT में ही सीनियर्स कभी-कभी कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए जूनियर्स को तैयार करने की कोशिश करते हैं। उनका इरादा बुरा नहीं होता, बल्कि वो ये सिखाना चाहते हैं कि ज़िंदगी हमेशा आपकी मर्जी की नहीं होगी, उसे झेलने की ताकत रखनी होगी।
लेकिन पिछले कुछ सालों में रैगिंग और गलत नीयत से हिंसा की खबरें इतनी फैल चुकी हैं कि नए छात्र किसी भी सख़्त टोन को गलत समझने लगते हैं।
सीनियर्स की “सख़्त लेकिन नेक नीयत वाली सीख” को भी वो डर और अपमान मान लेते हैं। और फिर अपने मन का डर बाहर निकालने की बजाय अंदर ही दबाते रहते हैं।
5. प्रतिस्पर्धा और भविष्य की अनिश्चितता
IIT में competition खत्म नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है।
- कोई सोचता है “अब तो गूगल, माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों में ही प्लेसमेंट मिलेगा” लेकिन वहाँ भी नंबर और स्किल्स की रेस खत्म नहीं होती।
- अगर प्लेसमेंट में मनचाही कंपनी न मिले तो भविष्य की चिंता और हताशा और बढ़ जाती है।
कई छात्र इतने बड़े सपने लेकर आते हैं कि अगर थोड़ा भी reality check मिलता है तो उनका आत्मविश्वास चकनाचूर हो जाता है।
6. बहादुरी से डर को बाहर न निकाल पाना
असल समस्या यह नहीं कि IIT कठिन है – समस्या यह है कि छात्र अपने डर और कमजोरी को सही समय पर स्वीकार नहीं करते।
- कोई दोस्त, सीनियर या काउंसलर से खुलकर बात कर ले तो शायद बात संभल जाए।
- लेकिन अंदर ही अंदर घुटते रहने से डर और प्रेशर इतना बढ़ जाता है कि कुछ कमजोर मानसिकता वाले छात्र बहादुरी से सामना करने के बजाय आत्महत्या जैसा कायराना कदम उठा लेते हैं।
IIT प्रशासन की कोशिशें, लेकिन…
कई IITs अब मानसिक स्वास्थ्य पर काम कर रहे हैं –
- 24×7 काउंसलिंग हेल्पलाइन
- होस्टलों में वेलनेस एसोसिएशन
- “कैंपस मॉम” और AI से भावनात्मक चेक-इन सिस्टम
लेकिन इन कदमों का असर तभी होगा जब छात्र अपने मन की बात कहने का साहस जुटाएँगे।
समाधान क्या है?
- शुरू से सच बताएँ: IIT जाना मतलब आरामदायक ज़िंदगी नहीं, बल्कि और ज़्यादा मेहनत और ज़्यादा प्रेशर है – ये पहले ही साफ बताया जाए।
- डर को सामान्य बनाओ: डरना गलत नहीं, लेकिन उसे छिपाना गलत है।
- सीनियर्स का सही रोल: सख़्त ट्रेनिंग को रैगिंग की तरह न पेश करें, बल्कि जूनियर्स को समझाएँ कि इसका मकसद भविष्य के लिए मजबूत बनाना है।
- पारिवारिक सपोर्ट: परिवार को भी समझना चाहिए कि बच्चा IIT पहुँच गया तो भी उस पर प्रेशर और बढ़ सकता है, उसे ज़रूरत है समझने की, दबाव डालने की नहीं।
- आत्महत्या को बहादुरी मत मानो: ये सबसे कायरतापूर्ण कदम है। बहादुर वही है जो अपनी समस्या को सामने लाकर हल ढूँढे।
निष्कर्ष
IIT में प्रवेश पाना आसान नहीं, लेकिन वहाँ टिके रहना और मानसिक रूप से मजबूत बने रहना उससे भी कठिन है।
यहाँ सिर्फ दिमाग़ी तेज़ी नहीं, बल्कि मानसिक सहनशक्ति चाहिए।
ज़िंदगी हमेशा आपको अच्छे लोग और आसान रास्ते नहीं देगी। कड़ी धूप, बुरे लोग, बुरे बॉस सब मिलेंगे – लेकिन अगर आप डर को छुपाने की बजाय बाहर निकालकर उसका सामना करेंगे, तो कोई भी मुश्किल इतनी बड़ी नहीं लगेगी कि जान देनी पड़े।
IIT में आने वाला हर छात्र योद्धा है – बस ज़रूरत है कि वो अपने डर से लड़ने में भी वही जज़्बा दिखाए जो उसने प्रवेश पाने में दिखाया।

































