भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बाद यह अपेक्षा की गई थी कि हर बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करेगा। लेकिन वास्तविकता यह है कि यह जिम्मेदारी सरकारी स्कूलों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती थी, क्योंकि दशकों से इनकी हालत बद से बदतर होती चली गई। नतीजा यह हुआ कि देश में प्राइवेट स्कूलों का जन्म हुआ — जो एक विकल्प नहीं, बल्कि ज़रूरत बन गए।
प्राइवेट स्कूल क्यों अस्तित्व में आए?
प्राइवेट स्कूलों की उत्पत्ति का मूल कारण सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी, अक्षम प्रशासन, और गुणवत्ता की भारी कमी थी।
- शिक्षकों की लापरवाही,
- अनुशासन का अभाव,
- बुनियादी सुविधाओं की कमी,
- कभी समय पर ना आने वाले अध्यापक,
- खाली पड़ी स्कूल की बिल्डिंगें,
- और सबसे शर्मनाक, स्वयं सरकारी स्कूलों के शिक्षक भी अपने बच्चों को उन्हीं स्कूलों में नहीं भेजते।
जब जनता को यह एहसास हुआ कि उनके बच्चों का भविष्य इन स्कूलों में अंधकारमय है, तो वे प्राइवेट स्कूलों की ओर मुड़े।
प्राइवेट स्कूलों की अपनी यात्रा और चुनौतियां
एक प्राइवेट स्कूल को खड़ा करने में सालों लगते हैं।
- बिल्डिंग, स्टाफ, इंफ्रास्ट्रक्चर, क्वालिटी एजुकेशन,
- मान्यता के लिए सरकारी चक्कर,
- हर साल फीस व मान्यता संबंधी नियमों में बदलाव,
- और इन सबसे ऊपर गुणवत्ता बनाए रखने की जिम्मेदारी।
इन स्कूलों को सरकार से कोई सीधी वित्तीय सहायता नहीं मिलती, और वे केवल अभिभावकों की दी गई फीस पर निर्भर रहते हैं। स्कूल की सफ़लता इस बात पर निर्भर करती है कि वह वर्षों तक कैसे विश्वास अर्जित करता है।
अब सवाल उठता है: RTE के नाम पर प्राइवेट स्कूलों पर तानाशाही क्यों?
RTE (Right to Education) अधिनियम के तहत यह अनिवार्य किया गया कि प्राइवेट स्कूल अपने यहां 25% सीटें आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित रखें।
यह विचार आदर्श रूप में सही हो सकता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके लिए तैयारी भी की गई थी?
✔ क्या सरकार इन छात्रों की पढ़ाई की फीस समय पर देती है?
✔ क्या कोई पारदर्शी तंत्र है जो स्कूलों को संरक्षण दे?
❌ और अगर कोई स्कूल इन मानकों पर खरा नहीं उतरता, तो उसका पूरा अस्तित्व ही मिटा दिया जाता है — मान्यता रद्द कर दो।
लखनऊ की ताजा स्थिति – हकीकत या हुकूमत?
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कई प्रतिष्ठित स्कूलों — जैसे CMS, MR Jaipuria, Vishwanath Bharti, और Bal Guide School — पर यह आरोप लगा है कि उन्होंने RTE के तहत गरीब बच्चों को एडमिशन नहीं दिए।
BSA लखनऊ ( उत्तर प्रदेश के जिले ) द्वारा इन स्कूलों की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की गई है। अकेले CMS की 17 शाखाएं इस आरोप के घेरे में हैं।
अब प्रश्न यह है कि मान्यता रद्द कर देने से क्या होगा?
- जो बच्चे पहले से इन स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनका क्या होगा?
- जिन गरीब बच्चों को एडमिशन नहीं मिला, उनके लिए क्या वैकल्पिक व्यवस्था है?
- और सबसे अहम — क्या सरकारी स्कूल इन बच्चों को वह स्तर की शिक्षा दे पाएंगे?
उत्तर साफ है — नहीं।
समस्या की जड़ कहां है?
सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए थी कि वह अपने सरकारी स्कूलों का कायाकल्प करती, ताकि प्राइवेट स्कूल की ज़रूरत ही न पड़ती।
लेकिन हुआ उल्टा —
- न तो सरकारी स्कूलों में सुधार हुआ,
- न ही शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया,
- और अब प्राइवेट स्कूलों पर तानाशाही थोप दी गई।
निष्कर्ष: क्या यह न्याय है या अन्याय की नई परिभाषा?
प्राइवेट स्कूलों को दोष देने से पहले हमें यह देखना होगा कि वे क्यों अस्तित्व में आए। अगर शिक्षा एक सेवा है, तो उसे चलाने वालों को संसाधन चाहिए। और अगर RTE को सफल बनाना है, तो:
- सरकार को सभी बच्चों की शिक्षा का खर्च समय पर उठाना चाहिए।
- प्राइवेट स्कूलों के साथ संवाद और सहयोग की नीति अपनानी चाहिए, न कि धमकी और दंड की।
- सरकारी स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाया जाए, ताकि कोई भी माता-पिता निजी विकल्प न तलाशे।
आज जरूरत है ईमानदार समीक्षा और शिक्षा को राजनीति से ऊपर उठाकर सर्वजनहिताय सोचने की।

































