जब ब्राह्मणो ठाकुरो को टारगेट करके फिल्मे बन रही थी तब कभी कोर्ट ने उनपर यह कहकर रोक नहीं लगायी की ऐसी फिल्मे देश के सामाजिक सौहार्द को ख़राब करेगी, क्युकी स्वतंत्रता के बाद उसके पहले की उन घटनाओ को दिखाना जिससे समाज में रहने वाले लोगो के बीच में भेदभाव और घृणा हो, लेकिन आज केरला दो आने पर सुप्रीम कोर्ट फटाफट कूद पड़ा, क्या ये वास्तव में कोर्ट का स्वतः संज्ञान काम है या फिर ऐसे लोगो का वर्चस्व है जो नेगेटिव नरेटिव सेट करने की काबिलियत रखते है और जनता, सरकार और न्याय व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण है।
आज भी फिल्मे बनाने वाले उस छुआ छूत की फिल्मे बना कर पैसे कमा रहे है और समाज में द्वेष का बीज बो रहे है जो वास्तव में दो वर्गों के बीच आपसी घृणा बढ़ाने का करती है, भले ही वास्तव में वर्तमान में ऐसा छुआ छूत न हो, फिर भी ऐसे नरेटिव सेट कर दिए की समाज का एकवर्ग छुआछूत और भेदभाव करता है, जबकि इनके क्या मानक है ये पता ही नहीं है।
क्यों नहीं कोर्ट कहता है की ऐसी फिल्मे मत बनाओ जो संविधान की प्रस्तावना में वर्णित “व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए” एक रोड़े का काम करती हो, वल्कि आज ऐसी फिल्मो को अवार्ड मिलता है ये कहकर की ये समाज की सच्चाई दिखाती है, और केरला टू की कहानी जो काफी हद तक वर्तमान की हकीकत है उसको रोक लगा कर कहा जा रहा है की ये सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाली है, और ये हमारी निष्पक्ष न्याय व्यवस्था है जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को देती है।
जब ब्राह्मणवाद की कबर खुदेगी और ब्राह्मणवाद मुर्दावाद की नारे लगते है और उनका विरोध होता है तो कुटिल मानसिकता के लोग बहुत ही चतुराई से अपनी कुटिलता का परिचय देकर कहते है की हम उस ब्राह्मणवाद का विरोध करते है जो स्त्रीओ और शुद्रो को अधिकार नहीं देती, लेकिन यहाँ हमारी बात कोई नहीं सुनेगा की केरला टू स्टोरी ऐसे लोगो के खिलाफ है जो ऐसे काम करते है न की मुस्लिमो के, लेकिन इस बात को कोर्ट सुनना भी नहीं चाहता क्युकी ये कोर्ट की मज़बूरी है एक ऐसे दबाब के कारन जो इन नेगेटिव नरेटिव सेट करने वालो ने बनाया हुआ है।
वास्तव में क्या ये लोकतंत्र और संविधान सम्मत देश की निशानी है जहाँ एक वर्ग की नकारत्मक छवि को गढ़ना सामाजिक चेतना और जागरूकता का प्रतीक बन गया हो भले ही वो न ऐसी थे न आज है, वही दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग है जिसके खिलाफ कुछ भी बोलना सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ना और संविधान को खतरे में डालना, देश की अखंडता और एकता को खत्म करने वाला काम हो जाता है, ये कैसी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है जो एक वर्ग को तो है जबकि दूसरे वर्ग को बिलकुल नहीं

















