1947 के बाद भारत में समानता, न्याय और आधुनिकता के नाम पर जो विधायी परिवर्तन हुए, वे वास्तव में कितने निष्पक्ष थे? हिंदू कोड बिल (1955-56) को महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधार के नाम पर लागू किया गया, लेकिन क्या यह सुधार केवल हिंदू समाज के लिए ही आवश्यक था? या फिर यह उन नीति–निर्माताओं की पूर्वग्रहपूर्ण सोच का परिणाम था, जो सनातन धर्म की जड़ें काटना चाहते थे क्योंकि उसकी उन्नति और स्थायित्व उन्हें सहन नहीं हो रहा था?
1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। उद्देश्य था – एक समान, न्यायप्रिय और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की स्थापना। लेकिन जैसे-जैसे नीतियाँ बनती गईं, यह प्रश्न गहराता गया कि क्या ये सब नीतियाँ वास्तव में सभी धर्मों के लिए समान थीं? या फिर कुछ खास मजहबों के साथ ‘संवेदनशीलता’ और कुछ के साथ ‘सुधारवाद’ का भेदभाव था?
हिंदू कोड बिल का संदर्भ और उद्देश्य
1955-56 में संसद ने हिंदू कोड बिल को पारित किया, जिसमें चार प्रमुख कानून शामिल थे –
- हिंदू विवाह अधिनियम
- हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम
- हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम
- हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम
इनका उद्देश्य बताया गया – महिलाओं को समान अधिकार देना, विवाह एवं उत्तराधिकार के मामलों में न्याय सुनिश्चित करना, और जातिगत/पितृसत्तात्मक रिवाजों को समाप्त करना। लेकिन गौर करने की बात ये है कि यह सुधार सिर्फ हिंदू समाज पर लागू किए गए।
पूर्वग्रह और पक्षपात: नीति निर्माताओं की मानसिकता पर सवाल
जिस समय हिंदू कोड बिल को लागू किया गया, उसी समय मुस्लिम समाज में व्याप्त तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला जैसी पितृसत्तात्मक प्रथाओं पर एक शब्द नहीं कहा गया। क्यों? क्या इसलिए कि नीति निर्माता जानते थे कि मुस्लिम धार्मिक नेताओं का विरोध उन्हें राजनीतिक रूप से भारी पड़ेगा? क्या यह तुष्टिकरण नहीं था?
इसके विपरीत, सनातन धर्म के विरुद्ध आक्रामक रुख अपनाया गया। संयुक्त परिवार, सात जन्मों का विवाह बंधन, और नारी को देवी मानने वाली संस्कृति—इन सबको रूढ़िवादी कहकर विकृति के रूप में प्रस्तुत किया गया। ऐसे में प्रश्न उठता है: क्या यह सुधार था या सुनियोजित सांस्कृतिक आक्रमण?
प्रगतिशीलता के नाम पर सनातन पर प्रहार
हिंदू कोड बिल को ऐसे समय में लाया गया जब भारत विभाजन के घाव अभी भरे नहीं थे। मुस्लिम समाज को छूने से राजनीतिक दंगे भड़क सकते थे, लेकिन सनातन धर्म को छूने में कोई खतरा नहीं था। इसलिए उसे “रिफॉर्म” के नाम पर नीतिगत अत्याचार का शिकार बनाया गया।
बिल समर्थक डॉ. आंबेडकर और अन्य नेताओं ने सनातन धर्म को ब्राह्मणवादी, स्त्री–विरोधी, और जातिवादी कहकर उसके मूल तत्वों को बदनाम किया। पर सवाल यह है कि क्या सिर्फ हिंदू समाज में ही सुधार की आवश्यकता थी? मुस्लिम पर्सनल लॉ को क्यों अछूत बना दिया गया?
वास्तविक प्रभाव: सामाजिक विघटन, परिवारों की टूटन
बिल ने जहां एक ओर महिलाओं को कुछ अधिकार दिए, वहीं दूसरी ओर संयुक्त परिवार की रीढ़ को तोड़ दिया। तलाक को कानूनी मान्यता देकर सात जन्मों के विवाह बंधन को एक कानूनी अनुबंध बना दिया गया। संपत्ति विवादों ने भाई-बहनों और रिश्तों को तोड़ने का काम किया।
सनातन धर्म के मूल्य—धैर्य, समर्पण और सामाजिक संतुलन—को आधुनिकता की आड़ में हास्यास्पद बना दिया गया।
मुस्लिम समाज को छूट: एक खुला पक्षपात
जब हिंदू कोड बिल पारित किया गया, तब मुस्लिम समाज में चल रही अमानवीय प्रथाओं पर एक शब्द नहीं बोला गया। यह कहना कि उस समय सांप्रदायिक तनाव का डर था, एक बहाना था। सच्चाई यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ को जानबूझकर छुआ नहीं गया, क्योंकि उसकी प्रतिक्रिया राजनीतिक रूप से महंगी हो सकती थी।
क्या यह सनातन धर्म को दबाने की साजिश थी?
ऐतिहासिक रिकॉर्ड भले ही इस बात का सीधा प्रमाण न दें कि हिंदू कोड बिल एक “साजिश” था, लेकिन जब हम इसके निष्पक्षता के अभाव, समय की राजनीतिक परिस्थितियों, और मुस्लिम प्रथाओं की अनदेखी को जोड़ते हैं, तो स्पष्ट होता है कि:
पूर्वग्रह से ग्रसित नीति निर्माता?
नीति-निर्माताओं ने सुधार के नाम पर जिस प्रकार केवल हिंदू पर्सनल लॉ को बदला, उससे यह धारणा बलवती हुई कि वे पूर्वग्रहपूर्ण मानसिकता से ग्रसित थे। उन्हें सनातन धर्म का स्थायित्व और सामाजिक संरचना असहनीय लगने लगी थी। जहाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ में व्याप्त तीन तलाक, बहुविवाह, हलाला जैसी अमानवीय प्रथाओं को धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हाथ तक नहीं लगाया गया, वहीं सनातन धर्म के सहज और समन्वयवादी मूल्यों को ‘पिछड़ापन’ और ‘उत्पीड़न’ के रूप में पेश किया गया।
संयुक्त परिवार और स्त्री सम्मान पर आघात
सनातन धर्म में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना गया है। महिला को परिवार की धुरी और देवी का स्वरूप माना गया है। संयुक्त परिवार एक सुदृढ़ सामाजिक इकाई के रूप में कार्य करता रहा है। लेकिन कोड बिल के जरिए तलाक को वैधानिक मान्यता, संपत्ति विवाद, और विवाह अनुबंध की मानसिकता ने इस सामाजिक व्यवस्था को भीतर से हिला दिया।
मुस्लिम समाज को विशेष छूट – क्यों?
जब हिंदू समाज पर कानून थोपे जा रहे थे, तब मुस्लिम समाज की प्रथाएँ जस की तस बनी रहीं।
- तीन तलाक को 2019 तक वैध माना गया।
- बहुविवाह की अनुमति अब भी बनी हुई है।
- हलाला जैसी प्रथाएँ आज भी जारी हैं।
इनमें सुधार न करने का कारण बताया गया सांप्रदायिक तनाव का डर। लेकिन क्या यह तर्कसंगत था? क्या मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी ‘धर्मनिरपेक्षता‘ थी?
हिंदू कोड बिल एक ओर सामाजिक सुधार की कोशिश था, लेकिन दूसरी ओर यह एकतरफा सांस्कृतिक हस्तक्षेप भी था। इससे यह धारणा बनी कि नीति निर्माताओं की दृष्टि में केवल हिंदू धर्म ही ‘सुधार योग्य’ है। यह मानसिकता उस समय के अंग्रेजी-शिक्षित, पाश्चात्य-प्रभावित नेतृत्व की भी प्रतीक थी, जो अपनी ही संस्कृति को रूढ़िवादी मान बैठा था।
सनातन धर्म की मजबूती इस बात में है कि वह हर आघात के बाद फिर से खड़ा होता है। लेकिन यह जरूरी है कि नीति निर्माण निष्पक्ष और सभी धर्मों के प्रति समान व्यवहार वाला हो।
आज जब समान नागरिक संहिता की बात हो रही है, तब यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि – क्या अतीत की गलती दोहराई जाएगी या एक नया, संतुलित और न्यायसंगत भारत बनेगा?
ये सुधार नहीं थे, यह लक्षित हस्तक्षेप था — उस सनातन धर्म के विरुद्ध जो भारत की आत्मा है।
सनातन धर्म आज भी जीवित है, क्योंकि उसकी जड़ें गहरी हैं। लेकिन यह अनुभव अब भी सिखाता है कि एकतरफा सुधार नीति, तुष्टिकरण और सांस्कृतिक अपमान, किसी भी समाज को असंतुलित कर सकते हैं।
आज आवश्यकता है कि हम समान नागरिक संहिता जैसे न्यायपूर्ण विकल्प की ओर बढ़ें—जिसमें न किसी मज़हब को छूने का डर हो, न किसी की आस्था को निशाना बनाने की मंशा।
































