1 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नितीश कटारा हत्याकांड के दोषी विकास यादव को चार सप्ताह की अंतरिम जमानत दी है — चिकित्सा कारणों के आधार पर। ये वही विकास यादव हैं जिनकी भूमिका इस हत्याकांड में किसी से छुपी नहीं है। अदालतें, वकील, जज, और इस देश का हर नागरिक जानता है कि इस निर्मम हत्या के पीछे कौन था। फिर भी, सालों से न्याय की प्रतीक्षा हो रही है — कभी अपील, कभी सुनवाई, कभी मेडिकल आधार और कभी गवाहों की कमी।
हत्या की सच्चाई सबको पता, फिर क्यों प्रतीक्षा?
नितीश कटारा हत्याकांड कोई साधारण मामला नहीं था। यह मामला “इज्ज़त” के नाम पर हुई एक सोची-समझी साजिश की मिसाल बन गया। विकास यादव, जो एक रसूखदार राजनीतिक परिवार से आता है, ने अपने साथी विशाल यादव के साथ मिलकर वर्ष 2002 में नितीश की बेरहमी से हत्या कर दी थी। नितीश का दोष? सिर्फ इतना कि वह विकास की बहन भावना यादव से प्रेम करता था।
इस देश में जब हत्या सबके सामने हुई, जब गवाह भी रहे, डीएनए टेस्ट तक हो गए, तब भी न्याय पाने में दशकों लग गए। अब जब उम्रकैद की सज़ा मिल चुकी है, तो जमानत पर बार-बार रिहाई क्यों?
अंतरिम ज़मानत और कानून की विडंबना
कोर्ट ने कहा कि विकास यादव को मेडिकल ग्राउंड पर चार सप्ताह की राहत दी जा रही है। सवाल उठता है कि क्या भारत के हर विचाराधीन या दोषी कैदी को ऐसी राहत मिलती है? क्या गरीब, दलित, आदिवासी या कोई आम आदमी भी ऐसा विशेषाधिकार पा सकता है?
ऐसे मामलों में जनता की सबसे बड़ी पीड़ा ये होती है कि जिसे दोषी माना गया है, वह फिर भी जेल से बाहर आता-जाता रहता है। यह आम नागरिक की न्याय पर से आस्था को कमजोर करता है।
न्याय प्रक्रिया की देरी: एक राष्ट्रीय संकट
देश में 5 करोड़ से अधिक मुकदमे वर्षों से लंबित पड़े हैं। न्याय की प्रतीक्षा करते-करते पीड़ित मर जाते हैं, गवाह बदल जाते हैं, सबूत मिटा दिए जाते हैं और आरोपी ज़मानत पर जीवन का आनंद लेते रहते हैं।
जब देश का नागरिक ये देखता है कि –
- अपराधी जेल में रहते हुए भी ज़मानत के नाम पर बाहर आते हैं,
- गवाहों को धमकाया या ख़रीदा जाता है,
- और अदालती फैसलों में वर्षों लग जाते हैं,
तो उसका भरोसा न्यायिक व्यवस्था पर से डगमगाने लगता है।
जनता का सवाल: कब मिलेगा वास्तविक न्याय?
हर भारतीय नागरिक जानता है कि नितीश की हत्या किसने की। जब जज को, वकील को, मीडियाकर्मी को और जनता को यह मालूम हो कि अपराधी कौन है, तब गवाह और सबूतों की ‘औपचारिक प्रक्रिया’ में इतने वर्षों की देरी क्या एक प्रकार की अन्याय नहीं?
क्या यही कारण है कि लोग ‘तुरंत न्याय’ की मांग करते हैं? क्या हम उस बिंदु पर पहुंच चुके हैं जहाँ न्याय में देरी, अन्याय है— यह सिर्फ नारा नहीं, बल्कि सच्चाई बन चुका है?
निष्कर्ष: न्याय प्रणाली में सुधार अब आवश्यक है
नितीश कटारा केस इस बात का प्रतीक बन चुका है कि भारत की न्याय प्रणाली को तत्काल सुधार की आवश्यकता है। निम्नलिखित कदम अनिवार्य हो चुके हैं:
- तेजी से सुनवाई के लिए Fast Track Courts की संख्या बढ़ाई जाए।
- VIP या रसूखदार दोषियों को विशेष रियायत न दी जाए।
- मामलों की समयबद्ध सुनवाई सुनिश्चित हो।
- गवाहों की सुरक्षा और सबूतों के रख-रखाव की बेहतर प्रणाली विकसित हो।
जब तक न्याय व्यवस्था तेज़, पारदर्शी और निष्पक्ष नहीं होगी, तब तक नितीश कटारा जैसे मामलों में जनता का विश्वास कमजोर होता रहेगा।
भारत के हर नागरिक का यह मौलिक अधिकार है कि उसे समय पर न्याय मिले। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक हम विकास यादव की अंतरिम ज़मानत को “कानूनी प्रक्रिया” कहकर समझा सकते हैं, लेकिन उसे न्याय नहीं कह सकते।
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