जब कोई व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर पहुँचता है — जैसे कि कोई मंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या राज्यपाल — तो उसके सामने केवल शोभा या वैभव नहीं होता, बल्कि वह कुछ ऐसी शपथों से बंधता है जो उसके हर शब्द, हर निर्णय और हर मौन को नियंत्रित करती हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण शपथ है — गोपनीयता की शपथ।
इस शपथ के पीछे केवल व्यक्तिगत अनुशासन नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की सुरक्षा, अखंडता और संप्रभुता दांव पर होती है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि इस गोपनीयता की सीमा कहाँ तक है? इसमें क्या आता है और यदि इसका उल्लंघन होता है तो क्या परिणाम होते हैं?
गोपनीयता की शपथ क्या होती है?
भारतीय संविधान की तीसरी अनुसूची में विभिन्न पदों पर नियुक्ति लेने वाले व्यक्तियों के लिए शपथों का उल्लेख है। राष्ट्रपति से लेकर मंत्री तक, जब वे पदभार संभालते हैं तो दो प्रकार की शपथ लेते हैं:
- पद की शपथ – जिसमें वे संविधान के प्रति निष्ठा और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदारी का संकल्प करते हैं।
- गोपनीयता की शपथ – जिसमें वे यह वचन देते हैं कि उनके कार्यकाल में जो भी संवेदनशील या गोपनीय जानकारी उनके संज्ञान में आएगी, वे उसे अनधिकृत रूप से साझा नहीं करेंगे।
शपथ की भाषा कुछ इस प्रकार होती है:
“मैं, [नाम], प्रतिज्ञा करता/करती हूँ कि मेरे विचार-विमर्श में आने-वाले, या मेरे पद पर रहते हुए मेरे ज्ञान में आने-वाले किसी भी विषय को, पद के निर्वहन हेतु आवश्यक या वैध रूप से अधिकृत व्यक्ति को छोड़कर, सीधे या परोक्ष रूप से किसी से भी व्यक्त या प्रकट नहीं करूँगा/करूँगी।”
गोपनीयता में क्या-क्या आता है?
अब मुख्य सवाल — ‘वह कौन-सी जानकारी है जो गोपनीय मानी जाती है?’ इसका उत्तर बहुत व्यापक है। कुछ प्रमुख उदाहरण नीचे दिए गए हैं:
1. कैबिनेट और मंत्रिपरिषद की चर्चाएँ:
सरकार द्वारा लिए जाने वाले अहम निर्णयों से पहले जो विमर्श होता है, वह पूर्णत: गोपनीय रहता है। यदि यह पहले ही लीक हो जाए तो नीतिगत निर्णयों पर असर पड़ सकता है।
2. रक्षा संबंधित सूचनाएँ:
सेना की तैनाती, युद्ध योजना, रक्षा सौदे, खुफिया रिपोर्ट — ये सारी जानकारी देश की सुरक्षा से सीधा संबंध रखती है। किसी भी प्रकार का लीक गंभीर खतरा बन सकता है।
3. विदेश नीति:
भारत की कूटनीतिक रणनीतियाँ, समझौते, संयुक्त बयान से पहले के मसौदे, राजनयिक गुप्त दस्तावेज — यह सब अत्यंत संवेदनशील होते हैं।
4. आर्थिक निर्णय:
जैसे कर दरों में परिवर्तन, विनिवेश योजना, मौद्रिक नीति के बदलाव आदि यदि समय से पहले सामने आ जाएँ, तो शेयर बाजार या उद्योग जगत में घातक असंतुलन आ सकता है।
5. जनसंख्या/आधार डेटा जैसे संवेदनशील नागरिक आँकड़े:
किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत पहचान योग्य सूचना (Personally Identifiable Information) का संरक्षण गोपनीयता के अंतर्गत आता है।
यह सिर्फ नैतिक जिम्मेदारी नहीं, कानूनी बाध्यता है
भारत में Official Secrets Act, 1923 एक ऐसा कानून है जो सरकार द्वारा गोपनीय घोषित किसी भी जानकारी को लीक करने पर कड़ी सजा देता है — जिसमें जेल तक की सजा हो सकती है।
इसके अलावा:
- RTI Act, 2005 की धारा 8 कुछ सूचनाओं को ‘सूचना के अधिकार’ से भी मुक्त करती है, विशेषतः जो राष्ट्रीय सुरक्षा या कैबिनेट से संबंधित हों।
- Central Civil Services Conduct Rules के अंतर्गत सरकारी कर्मचारी भी ऐसी कोई जानकारी साझा नहीं कर सकते।
क्या होता है यदि कोई गोपनीयता तोड़ दे?
हाल के वर्षों में हमने कई ऐसे मामले देखे जहाँ जानबूझकर या अनजाने में राज्य की गोपनीय सूचनाएँ मीडिया, सोशल मीडिया या विदेशी एजेंसियों तक पहुँच गईं।
इसके परिणाम:
- राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है
- विदेशी संबंध बिगड़ सकते हैं
- अंदरूनी कानून व्यवस्था गड़बड़ा सकती है
- बाज़ार में भारी असंतुलन आ सकता है
- संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होती है, और आजीवन उसकी विश्वसनीयता खत्म हो जाती है
गोपनीयता की शपथ सिर्फ एक औपचारिकता नहीं है। यह लोकतंत्र की रीढ़, राष्ट्र की सुरक्षा, और प्रशासन की कार्य-प्रणाली को स्थिर और सुरक्षित रखने की प्राथमिक शर्त है। सत्ता की सीट पर बैठने वालों को यह समझना ज़रूरी है कि जो बातें वे बोलते नहीं, उनका भी असर इतिहास तय करता है।
कभी-कभी “जो मौन है, वही सबसे ज़्यादा देशभक्ति है।”
































