किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक समाज की आत्मा उसके क़ानूनों में बसती है। क़ानून केवल शासन का औज़ार नहीं होते, बल्कि वे मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता, गरिमा और प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) की रक्षा के लिए बनाए जाते हैं। जब कोई क़ानून इन मूल सिद्धांतों के विपरीत जाकर नागरिकों को भय, असमानता और दमन की स्थिति में डाल दे, तो इतिहास उसे “काला क़ानून” कहकर चिन्हित करता है। भारत के इतिहास में रोलेट एक्ट और वर्तमान समय में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रोसिटी एक्ट) को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
प्राकृतिक न्याय और नैसर्गिक स्वतंत्रता की अवधारणा
प्राकृतिक न्याय का मूल सिद्धांत है—
- बिना सुने दंड नहीं (Audi Alteram Partem)
- निष्पक्षता और समानता
- दोष सिद्ध होने तक निर्दोष मानना
नैसर्गिक स्वतंत्रता का अर्थ है कि हर मनुष्य जन्म से स्वतंत्र है और राज्य केवल उचित प्रक्रिया (Due Process of Law) के माध्यम से ही उसकी स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है।
जब कोई क़ानून इन सिद्धांतों को दरकिनार कर देता है, तो वह न्याय का रक्षक नहीं, बल्कि अन्याय का औज़ार बन जाता है।
रोलेट एक्ट : औपनिवेशिक दमन का प्रतीक
रोलेट एक्ट ब्रिटिश शासन द्वारा भारत पर थोपा गया वह क़ानून था जिसने—
- बिना मुक़दमा चलाए गिरफ़्तारी की अनुमति दी
- जमानत और अपील जैसे अधिकारों को सीमित किया
- नागरिक स्वतंत्रता को “राज्य की सुरक्षा” के नाम पर कुचल दिया
यह क़ानून अंग्रेज़ों के लिए “कानून-व्यवस्था” का माध्यम था, लेकिन भारतीयों के लिए अन्याय, भय और अपमान का प्रतीक। यही कारण है कि पूरे देश ने इसे काला क़ानून कहा और इसके विरुद्ध जनांदोलन खड़े हुए।
एट्रोसिटी एक्ट : उद्देश्य और यथार्थ का टकराव
एट्रोसिटी एक्ट का घोषित उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को अत्याचार से बचाना है। उद्देश्य नैतिक रूप से उचित हो सकता है, परंतु किसी भी क़ानून का मूल्यांकन उसके प्रावधानों और प्रभाव से किया जाता है, न कि केवल उद्देश्य से।
इस क़ानून में—
- तत्काल गिरफ़्तारी
- अग्रिम जमानत पर कठोर प्रतिबंध
- आरोप को लगभग सत्य मान लेने की प्रवृत्ति
जैसे प्रावधान मौजूद हैं, जो निर्दोषता के सिद्धांत को कमज़ोर करते हैं।
रोलेट एक्ट और एट्रोसिटी एक्ट में वैचारिक समानता
यद्यपि एक औपनिवेशिक शासन का क़ानून था और दूसरा स्वतंत्र भारत का, फिर भी दोनों में कुछ गहरी समानताएँ हैं—
1. राज्य को असाधारण शक्ति
दोनों क़ानून सामान्य आपराधिक कानून से हटकर राज्य को अतिरिक्त अधिकार देते हैं, यानि तुरंत अपराधी मान कर उसके विरुद्ध कार्यवाही चालू ।
2. नागरिक स्वतंत्रता पर प्रहार
रोलेट एक्ट ने भारतीयों को संदेह के आधार पर बंद किया, एट्रोसिटी एक्ट में भी कई बार आरोप मात्र से सामाजिक, मानसिक और आर्थिक दंड झेलना पड़ता है, यानि राज्य को सिर्फ संदेह ही हुआ होगा और व्यक्ति गिरफ्त में, सोच कर देखिये दो लोग आपस में बात कर रहे हो और एक दूसरे को जाति सूचक शब्द से बुला दे तो सामान्य वर्ग को कोई अधिकार नहीं भले ही उसकी जाती को कितने ही असम्मानजनक तरीके से लिया गया हो वही दूसरे को पूरी स्वतंत्रता है की पहले वयक्ति का पूरा जीवन बर्बाद करने वाला काम कर दे यानि जेल भेजने का काम सिर्फ एक शिकायत पर ।
3. दुरुपयोग की संभावनाएँ
जहाँ रोलेट एक्ट का दुरुपयोग राष्ट्रवादी आंदोलनों को दबाने के लिए हुआ, वहीं एट्रोसिटी एक्ट के दुरुपयोग की घटनाएँ सामाजिक और न्यायिक विमर्श का विषय रही हैं, सोच कर देखिये दो लोग एक कक्षा में है, सामान्य वर्ग का व्यक्ति मेधावी है जिसके प्रति जलन और द्वेष है, तो उस बच्चे को सिर्फ यही शिकायत करनी है की ये लोग मुझसे मेरी जाति के कारन भेदभाव करते है, और विद्यार्थी का काम तमाम, यही प्रतियोगी परीक्षा या प्रमोशन में भी किया जाता है और जा रहा है ।
एट्रोसिटी एक्ट और भारतीय संविधान से टकराव
🔹 अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार
कानून के समक्ष समानता का सिद्धांत कहता है कि सभी नागरिक समान हैं।
जब एक ही अपराध के लिए अलग-अलग नागरिकों के लिए अलग प्रक्रिया हो, तो यह समानता के सिद्धांत पर प्रश्न खड़ा करता है।
🔹 अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
इस अनुच्छेद के अनुसार किसी की स्वतंत्रता केवल न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत प्रक्रिया से ही छीनी जा सकती है।
आरोप के आधार पर त्वरित गिरफ़्तारी और जमानत निषेध इस भावना के विपरीत प्रतीत होते हैं।
🔹 अनुच्छेद 22 – गिरफ़्तारी से सुरक्षा
गिरफ़्तारी के समय अधिकारों की सुरक्षा का प्रावधान भी कई बार व्यवहार में कमज़ोर पड़ता है।
क्या उद्देश्य के नाम पर अन्याय स्वीकार्य है?
यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि किसी वर्ग की रक्षा के लिए बनाया गया क़ानून दूसरे वर्ग के मौलिक अधिकारों को कुचलने लगे, तो वह न्याय नहीं, बल्कि विपरीत अन्याय बन जाता है।
इतिहास सिखाता है कि—
“अन्याय चाहे किसी भी उद्देश्य से किया जाए, वह अंततः समाज को विभाजित ही करता है।”
मार्टिन लूथर किंग जूनियर का मानना था कि हमें ऐसे कानूनों का विरोध करना चाहिए जो नैतिक सिद्धांतों, खासकर प्राकृतिक कानून (Natural Law) और मानव गरिमा के विरुद्ध हों, क्योंकि उनके लिए “अन्यायपूर्ण कानून कोई कानून ही नहीं है” (an unjust law is no law at all)
निष्कर्ष : क़ानून न्याय का साधन हो, भय का नहीं
रोलेट एक्ट को इतिहास ने इसलिए नकारा क्योंकि वह मनुष्य की स्वतंत्रता का शत्रु था।
एट्रोसिटी एक्ट पर उठते प्रश्न भी इसी बिंदु पर केंद्रित हैं—कि कहीं यह क़ानून भी प्राकृतिक न्याय और संवैधानिक संतुलन से दूर तो नहीं चला गया।
समाज को ऐसे क़ानूनों की आवश्यकता है जो—
- पीड़ित की रक्षा करें
- निर्दोष को भयमुक्त रखें
- और संविधान की आत्मा से समझौता न करें
क्योंकि न्याय वही है जो सभी के लिए न्याय हो—
डर, भेद और असमानता पर आधारित व्यवस्था कभी भी सच्चा न्याय नहीं दे सकती।


































