तथाकथित सामान्य वर्ग में जन्मा एक बच्चा, जो अपने गाँव की मिट्टी में खेलते हुए बड़ा होता है।
स्वतंत्र भारत में देश संविधान से चलता है और उसे यही सिखाया जाता है कि
संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है,
कानून के सामने सब बराबर हैं,
और राज्य जाति, मूलवंश या धर्म के आधार पर किसी से भी भेदभाव नहीं करेगा।
अपने गाँव में वह देखता है —
हर किसी के पास अपना घर है,
किसी का मकान किसी ने भी यहाँ किराये पर नहीं दिया या लिया है,
सबके पास खेती है,
जैसी उसकी है, वैसी ही दूसरों की भी।
यानी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में उसे कोई बड़ा फर्क नजर नहीं आता।
लेकिन जैसे ही स्कूल में छात्रवृत्ति और सुविधाओं की बात आती है,
तो चुन-चुन कर कुछ बच्चों को विशेष लाभ दिए जाते हैं।
वह मास्टर जी से पूछता है —
“सर, इन्हें ही क्यों?”
उत्तर मिलता है —
“ये विशेष वर्ग के लोग हैं, सरकार इन्हें देती है।”
फिर बच्चा पूछता है —
“लेकिन क्यों?”
बताया जाता है —
“इन्हें 5000 साल से शोषण सहना पड़ा है।”
बच्चा चौंक जाता है।
कहता है —
“सर, ये तो मेरी ही उम्र के हैं,
फिर 5000 साल का शोषण इन्होंने कैसे झेला?”
इसके बाद उसे
मनुस्मृति,
मनुवाद,
जमींदारी और सामंतवाद की कहानियाँ सुनाई जाती हैं।
वह सुनता तो है,
पर समझ नहीं पाता —
क्योंकि वह तो आज के स्कूल में बैठा एक बच्चा है,
जो वर्तमान में जी रहा है, इतिहास के बोझ में नहीं।
धीरे-धीरे वह और चीजें भी देखता है —
- अच्छे नंबर लाने के बाद भी उसे अवसर कम मिलते हैं
- फीस ज्यादा देनी पड़ती है
- और प्रतियोगिता में बराबरी के बावजूद चयन में पीछे रह जाता है
तब उसे एहसास होने लगता है कि
संविधान में लिखे गए मौलिक अधिकार कागजों में तो है लेकिन वास्तव में उसके लिए व्यवहार में नहीं है।
उसे लगता है कि
संविधान से कहीं ऊपर
एक “जाति प्रमाण पत्र” की शक्ति खड़ी है —
जो जिसके पास है,
उसके पास बोलने, आरोप लगाने और अपमान करने का एक तरह का सशक्त लाइसेंस है।
उसके पूर्वजों को गालियाँ दी जाएँ —
वह चुप रहे।
उसकी मान्यताओं और विचारों का मज़ाक उड़ाया जाए —
वह सहन करे।
उसके आराध्य और धर्मग्रंथों को अपशब्द कहे जाएँ —
वह मौन रहे।
लेकिन यदि वह उसी भाषा में जवाब दे दे, तो उस पर SC-ST एक्ट लग जाता है।
तब उसके मन में प्रश्न उठता है —
क्या मौलिक अधिकार वास्तव में सबके लिए हैं?
या केवल कुछ वर्गों के लिए?
अगर कानून सबके लिए समान है,
तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी समान क्यों नहीं?
अगर समानता मूल सिद्धांत है,
तो व्यवहार में असमानता क्यों?
आज यही प्रश्न
सामान्य वर्ग के लाखों युवाओं के मन में है।
यह लेख किसी वर्ग के विरोध में नहीं है, यह केवल यह पूछने का साहस है कि —
क्या सामाजिक न्याय का अर्थ केवल कुछ वर्गों की रक्षा है, या हर नागरिक की?
अब समय आ गया है कि
सरकारें और
संविधान की संरक्षक सर्वोच्च न्यायालय
इस पर गंभीरता से विचार करें कि —
मौलिक अधिकार सिर्फ किताबों में न रहें, बल्कि हर नागरिक को समान रूप से महसूस हों।
क्योंकि
न्याय तब तक पूर्ण नहीं होता
जब तक वह सभी के लिए समान न हो।


































