आज के समय में “अस्पृश्यता”, “अछूत”, “उपेक्षित”, “दलित” जैसे शब्द सुनते ही लोगों के मन में यह धारणा बनी दी जाती है कि यह सब सवर्णों की संकीर्ण सोच और जातिगत भेदभाव का परिणाम था। लेकिन यदि हम ऐतिहासिक संदर्भ, सामाजिक संरचना और उस समय के राजनीतिक-सांस्कृतिक माहौल को गहराई से देखें, तो स्पष्ट होता है कि बहुत सी “दूरियां” दरअसल आत्मरक्षा और धर्म-संरक्षण के लिए बनाई गई थीं। क्युकी प्राचीन काल से लेकर आज तक धर्म व्यक्ति का असली अस्तित्व रहा है, शिक्षा, कानून और संविधान तो देश तक ही सिमित है, आज मै भारत में हूँ तो भारत में पढ़ाई जाने वाली शिक्षा पढ रहा हूँ, यहाँ के कानून और संविधान में विस्वास है, और धर्म मेरा सनातन है, कल को मै अगर अमेरिका चला गया तो शिक्षा मेरे को या मेरे बच्चो को वो पढ़नी पड़ेगी जो वह देश अपने नागरिको को पढ़ाना चाहता है, कानून और संविधान भी मुझे अमेरिका का ही मानना पड़ेगा, लेकिन तब भी मेरा धर्म सनातन धर्म ही रहेगा।
1. परिस्थितियों का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
भारत पर जब विदेशी आक्रमण शुरू हुए तो राजपूत और ब्राह्मणो ने डटकर मुकाबला किया, उनके साथ अन्य वर्गों के लोग भी थे , आक्रमण का क्रम पहले अरब, फिर तुर्क, अफगान, मुगल और अंत में अंग्रेज आये लेकिन उनके मन में ये डर था की हम सामने से लड़कर नहीं जीत सकते तब जो उनकी नीति रही “फूट डालो और राज करो”। उन्होंने समाज के भीतर मौजूद मतभेदों को और गहरा करके, अलग-अलग वर्गों के बीच अविश्वास और दूरी को स्थायी रूप देने की कोशिश की।
लेकिन इन दूरियों की जड़ें और वजह सिर्फ जाति नहीं थीं।
- कई बार यह दूरी आचरण, जीवनशैली और धार्मिक आस्था के अंतर के कारण थी।
- कई बार यह संस्कृति और स्वच्छता नियमों के पालन या उल्लंघन पर आधारित थी।
- और कई बार यह बार-बार के विश्वासघात और असहयोग के कारण थी।
2. “दूरी” का कारण – सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण
वास्तव में कुछ लोगो को सनातन धर्म से अकारन घृणा रही है, क्यों रही पता नहीं लेकिन उनको धर्म का मजाक बनाने में, हमारे मंदिरो से, हमारी भव्य सभ्यता से घृणा ही रही है, और वो लोग समय समय पर अपनी ये शत्रुता दिखाते रहे इसलिए हमारे पूर्वजों पहले उनको समझाने का प्रयास किया वो नहीं माने फिर सामाजिक वहिष्कार की धमकी देकर दबाब बनाना चाहा ये लोग तब भी नहीं माने, फिर धीरे धीरे दूरिया बना कर इनको सदा के लिए उपेक्षित कर दिया की ये जो करते है करने दो इनसे कोई मतलब ही नहीं रखेंगे, लेकिन समाज में सभी को एकदूसरे की जरूरत पढ़ी तो अपना मेहनताना देकर काम किया और फिर अपने अपने रिश्ते अपने अपने रास्ते
उसका नतीजा ये हुआ की इनकी आंतरिक धृणा अब धर्म से हटकर राष्ट्र तक पहुंच गयी, इन वर्गों के मन में धर्म को नष्ट करने की सोच पनपने लगी, और धर्म का मूल स्रोत था धर्मग्रंथ और मंदिर, तो इन वर्गों के लोग रहते तो उसी समाज में थे और सभी जानकारिया भी थी तो ये लोग विदेशी शासकों के साथ मिलकर धर्म और संस्कृति के साथ विश्वासघात करने लगे थे। और जब भी आक्रमण होता:
- मंदिरों की सूचनाएं, आंतरिक मार्ग, गांव की योजनाएं – शत्रु को यही लोग देते।
- अपने छोटे लाभ के लिए, विदेशी शासकों का साथ देना, अपने ही समाज के विरुद्ध खड़ा होना।
- धर्म और परंपरा का उपहास करना, विदेशी रीति-रिवाज अपनाना।
ऐसे में, उनसे दूरी बनाना एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम था, ताकि शेष समाज और धर्म की रक्षा हो सके।
3. यह दूरी जातिगत घृणा नहीं थी
यदि यह दूरी जन्म आधारित जातिगत घृणा होती, तो:
- स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे लोग शुद्धि आंदोलन, वेद-पाठ और जनेऊ धारण का आह्वान क्यों करते?
- आर्य समाज क्यों निम्न कही जाने वाली जातियों के लोगों को वेद पढ़ने और यज्ञ करने का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष करता?
- मंदिरों के प्रांगण में कई स्थानों पर शिलालेख क्यों मिलते, जिनमें अलग-अलग जातियों के दान और योगदान का उल्लेख होता?
सच्चाई यह है कि जब सुधार और एकीकरण के प्रयास हुए, तो बहुत कम लोग वास्तव में आगे आए। अधिकांश ने या तो उदासीनता दिखाई या पुराने धर्म विरोधी विचारो के चलते खुद को अलग रखा।
4. मेरा खुद का सोशल मीडिया वाला अनुभव – आधुनिक समानता
मेरा अपना व्यक्तिगत अनुभव इस मानसिकता को आज भी समझने में मदद करता है।
- मै पहले सोशल मीडिया पर बहुत एक्टिव रहता था, और सनातन धर्म या ईश्वर से जुड़े पोस्ट पढता था
- अगर कोई पोस्ट धर्म विरोधी या भगवान विरोधी होती तो मै यथासम्भव उत्तर देता, तो सोशल मीडिया मुझे और ज्यादा सजेस्ट करने लगा
- मेरा धर्मविरोधी पोस्टों का जवाब देना शुरू हुआ तो दिन का पांच से सात घंटा लगने लगा, जिससे आपके समय और ऊर्जा का बड़ा हिस्सा इन्हीं वाद-विवादों में जाने लगा।
- AI एल्गोरिद्म ने आपकी रुचि पहचानकर आपको रोज़-रोज़ वैसी ही पोस्ट दिखानी शुरू कर दी।
- धीरे-धीरे आपने समझा कि इनका जवाब देना न सिर्फ समय की बर्बादी है, बल्कि इससे कोई लाभ भी नहीं हो रहा — क्योंकि ये लोग न तो सुनने को तैयार हैं, न बदलने को।
- फिर मेने पहले पोस्ट को फिर इन लोगो को “इग्नोर” करना शुरू किया, क्युकी ये लोग मुझे टैग करके पोस्ट डालने लगे थे
तब मुझे इनकी और इनके पूर्वजो के विचारधारा में समानता नजर आयी, की आज लोकतंत्र में कौन आपको छोटा बनने को बोल रहा है, आप चाहे तो बड़े बन जाओ, लेकिन नहीं धर्म और ईश्वर की बुराई करनी है और दलित शोषित का टैग लगा कर भी घूमना है, तो मेरे पास इनको इग्नोर करने के अलाबा कोई विकल्प नहीं था और शयद यही रणनीति हमारे पूर्वजों ने भी अपनाई होगी, क्युकी बार-बार की बहस, विवाद और अपमान से बचने के लिए दूरी बना लेना ही एकमात्र समाझधारी का कदम था, धर्म की भी रक्षा करनी होगी और आत्मोन्नति भी करनी होगी, और समय तो उतना ही है, या तो सही कामो में लगा लो या फालतू की बहस में ।
5. अंग्रेजों और मुघलों का फायदा
जब यह दूरी बनी रही, तो अंग्रेजों और मुगलों ने इसका खूब फायदा उठाया:
- उन्होंने कहा, “देखो, सवर्ण इन्हें छूते तक नहीं, ये दबे-कुचले हैं।”
- धार्मिक कारणों से बनी सामाजिक दूरी को जातिगत घृणा का लेबल देकर प्रचारित किया।
- कानून, शिक्षा और प्रशासन में इन्हें “शोषित” घोषित करके, समाज को स्थायी रूप से बांट दिया।
यहां तक कि अंग्रेजी दस्तावेज़ों और मिशनरी रिपोर्टों में भी इस बात का प्रचार किया गया कि हिन्दू धर्म मूलतः भेदभावपूर्ण है, ताकि धर्म-परिवर्तन के लिए मानसिक ज़मीन तैयार की जा सके।
6. सुधार के प्रयास और प्रतिक्रिया
स्वामी दयानंद सरस्वती का जनेऊ आंदोलन और वेद-पाठ अभियान साफ़ उदाहरण हैं कि सवर्ण नेतृत्व ने समाज में एकता लाने की कोशिश की।
- उन्होंने कहा कि सभी वर्ण के लोग, यदि संस्कार और आचार से योग्य हैं, तो वे वेद पढ़ सकते हैं, यज्ञ कर सकते हैं, जनेऊ धारण कर सकते हैं।
- आर्य समाज ने कई निम्न कही जाने वाली जातियों का “शुद्धि संस्कार” करके उन्हें मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।
लेकिन दुखद यह कि जिन्हें बुलाया जा रहा था, वे बड़ी संख्या में नहीं आए — और कई ने तो इसे विदेशी ताकतों के इशारे पर अस्वीकार कर दिया, ताकि “अलग पहचान” का राजनीतिक लाभ लिया जा सके।
7. निष्कर्ष – दूरी मजबूरी थी, नफरत नहीं
- पूर्वजों ने यह दूरी इसलिए बनाई क्योंकि लगातार विश्वासघात, असहयोग और धर्म-विरोधी कार्यों से बचना ज़रूरी था।
- यह दूरी जन्म-आधारित जातिगत घृणा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मरक्षा की रणनीति थी।
- विदेशी शासकों ने इसे तोड़-मरोड़कर “अस्पृश्यता” और “जातिगत उत्पीड़न” के रूप में पेश किया, ताकि समाज में स्थायी दरार बनाई जा सके।
- सुधार और एकता के प्रयासों के बावजूद, राजनीतिक लाभ और मानसिक जिद ने इस खाई को भरने नहीं दिया।
आज हमें इतिहास को इस दृष्टि से देखना होगा कि दूरी का कारण क्या था, और यह समझना होगा कि “ब्रांडेड” शब्दों और प्रचारित कथाओं के पीछे असली कहानी क्या है।
































