पर्यावरण नहीं, ज़मीन बचाने की लड़ाई
अरावली पर्वतमाला कोई साधारण पहाड़ी श्रृंखला नहीं है। यह उत्तर भारत की जल सुरक्षा, जलवायु संतुलन और जैव विविधता की रीढ़ है। लेकिन 2019 से 2024 के बीच जो कुछ हुआ, उसने यह साफ़ कर दिया कि अरावली की असली लड़ाई पर्यावरण की नहीं, ज़मीन और मुनाफ़े की है।
यह संघर्ष पेड़-पौधों बनाम विकास का नहीं था, बल्कि परिभाषा बनाम संरक्षण का था।
“परिभाषा” क्यों इतनी अहम है?
भारत में किसी क्षेत्र को बचाने का सबसे आसान तरीका है—उसे Forest / Protected / Ecologically Sensitive घोषित करना।
और उसे नष्ट करने का सबसे आसान तरीका है—
👉 उसकी कानूनी परिभाषा बदल देना।
2019–2024 के दौरान यही हुआ।
सरल शब्दों में:
- अगर अरावली “वन” है → निर्माण अवैध
- अगर अरावली “राजस्व भूमि” है → निर्माण वैध
तो लड़ाई यह नहीं थी कि पहाड़ हैं या नहीं,
लड़ाई यह थी कि काग़ज़ों में उन्हें क्या कहा जाए।
परिभाषा बदलने की कोशिशें: क्या किया गया?
इस अवधि में अलग-अलग स्तरों पर तीन मुख्य चालें चली गईं:
1️⃣ ऊँचाई (Height) का खेल
कुछ प्रस्तावों में कहा गया कि:
- केवल 100 मीटर से ऊँचे टीले ही “अरावली” माने जाएँ
- उससे नीचे की ज़मीन अरावली नहीं है
जबकि भूवैज्ञानिक जानते हैं कि:
- अरावली पुरानी और घिसी हुई पर्वतमाला है
- इसकी पारिस्थितिकी ऊँचाई से नहीं, भूगर्भीय निरंतरता से तय होती है
यह तर्क वैज्ञानिक नहीं, सुविधाजनक था।
2️⃣ Forest की जगह “Revenue Land”
कई जगह:
- जंगलों को रिकॉर्ड में “गैर-वन भूमि” दिखाया गया
- ग्राम समाज / shamlat land को development योग्य बताया गया
इससे:
- फार्महाउस
- रिसॉर्ट
- विवाह स्थल
- लग्ज़री कॉलोनियाँ
काग़ज़ी तौर पर वैध हो जातीं।
3️⃣ Mapping को जानबूझकर लटकाना
सबसे खतरनाक रणनीति थी:
- “पहले तय करो अरावली कहाँ है”
- जब तक तय न हो, तब तक निर्माण चलता रहे
यानी delay = destruction।
इसके पीछे किसका हाथ था?
यह सवाल सीधा है और जवाब भी गोल-मोल नहीं होना चाहिए।
🏗️ 1. रियल एस्टेट और फार्महाउस लॉबी
गुरुग्राम, फरीदाबाद, नूंह, अलवर जैसे इलाक़ों में:
- अरावली की ज़मीन सोने के भाव बिकती है
- एक परिभाषा बदलने से हज़ारों करोड़ का खेल खुलता है
यही सबसे बड़ा दबाव समूह था।
🏛️ 2. स्थानीय राजनीतिक संरक्षण
बिना राजनीतिक संरक्षण के:
- न तो रिकॉर्ड बदलते
- न नोटिफिकेशन निकलते
- न अवैध निर्माण टिकते
यह किसी एक पार्टी या सरकार का मामला नहीं,
यह सत्ता और पूँजी के गठजोड़ का क्लासिक उदाहरण है।
🧾 3. प्रशासनिक मिलीभगत
राजस्व, वन और नगर नियोजन विभागों के बीच:
- जिम्मेदारी को इधर-उधर घुमाया गया
- “हमारी सीमा नहीं” का खेल चला
नतीजा:
कोई ज़िम्मेदार नहीं, लेकिन नुकसान स्थायी।
न्यायपालिका क्यों बार-बार बीच में आई?
क्योंकि:
- राज्य स्तर पर इच्छाशक्ति नहीं थी
- नियमों को मोड़ने की कोशिशें खुलकर दिख रही थीं
सुप्रीम कोर्ट और NGT को बार-बार कहना पड़ा:
- खनन बंद करो
- निर्माण हटाओ
- अरावली की सुरक्षा करो
लेकिन अदालतें:
- नीति नहीं बना सकतीं
- सिर्फ़ रोक लगा सकती हैं
और रोक तब तक काम नहीं करती,
जब तक प्रशासन ईमानदार न हो।
असली नुकसान क्या हुआ?
इस पूरे खेल के परिणाम बेहद गंभीर हैं:
- भूजल रिचार्ज नष्ट
- दिल्ली-NCR में प्रदूषण बढ़ा
- वन्यजीवों का विस्थापन
- बाढ़ और सूखे का खतरा
और यह सब “कानूनी भाषा” के खेल से हुआ,
बुलडोज़र से नहीं।
यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है
2024 तक:
- परिभाषा पर अंतिम सहमति नहीं
- Mapping अधूरी
- निर्माण कई जगह जारी
यानी अरावली आज भी काग़ज़ों में लड़ रही है, ज़मीन पर हार रही है।
निष्कर्ष: असली सवाल क्या है?
सवाल यह नहीं है कि:
- विकास चाहिए या पर्यावरण
सवाल यह है कि:
क्या विकास के नाम पर कानून को तोड़ा जाएगा,
या कानून के भीतर विकास होगा?
अरावली की परिभाषा बदलने की कोशिशें बताती हैं कि
समस्या पहाड़ों की नहीं, नियत की है।
🔚 अंतिम पंक्ति (न्यूज़-योग्य)
अरावली को बचाने की लड़ाई पेड़ों की नहीं,
बल्कि उस काग़ज़ की है जिस पर उसका नाम लिखा जाता है।
































