वर्तमान भारतीय समाज में सवर्ण, SC, ST और OBC वर्गों के बीच जो बढ़ती दूरी दिखाई देती है, वह किसी एक घटना या नीति का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों से विकसित हो रही वैचारिक कटुता, असहिष्णु सोच और राजनीतिक-सामाजिक प्रयोगों का संयुक्त प्रभाव है। बार-बार “सामाजिक समरसता” की बात तो की जाती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर हालात लगातार विपरीत दिशा में जाते दिख रहे हैं।
सबसे पहला और मूल कारण है एक-दूसरे की आस्थाओं और विचारधाराओं के प्रति असहिष्णुता। हर समुदाय, हर वर्ग और हर व्यक्ति का अपना जीवन-दर्शन, प्रेरणास्रोत और पूज्य विचार होते हैं। जैसे मुसलमानों के लिए क़ुरान, ईसाइयों के लिए बाइबिल और सिखों के लिए गुरु ग्रंथ साहिब पवित्र हैं, वैसे ही विभिन्न सामाजिक वर्गों के लिए उनके महापुरुष और विचारक श्रद्धा के केंद्र होते हैं। यदि कोई व्यक्ति या समूह किसी दूसरे की आस्था का अपमान करता है, तो उससे सामाजिक सौहार्द की अपेक्षा नहीं की जा सकती। समस्या तब बढ़ जाती है जब वैचारिक असहमति को जानबूझकर घृणा और तिरस्कार में बदला जाता है।
SC-ST-OBC वर्गों में आंबेडकर, पेरियार, ज्योतिबा फुले, कांशीराम और राममनोहर लोहिया जैसे महापुरुषों के प्रति गहरी श्रद्धा है। यह उनका अधिकार भी है। लेकिन जब इन नामों के सहारे संपूर्ण सवर्ण समाज को अपराधी ठहराने की प्रवृत्ति अपनाई जाती है, तब दूरी और गहरी हो जाती है। किसी ऐतिहासिक अन्याय की जिम्मेदारी वर्तमान पीढ़ी पर थोपना न तो नैतिक है और न ही व्यावहारिक। आज के युवा सवर्ण छात्र-छात्राएँ उन सामाजिक अपराधों के जिम्मेदार नहीं हैं, जो सैकड़ों वर्ष पहले हुए थे।
दूसरा बड़ा कारण है SC-ST एक्ट का भय और उसके दुरुपयोग की आशंका। कानून का उद्देश्य दलित और वंचित वर्गों को सुरक्षा देना है, जो अपने आप में उचित है। लेकिन जब कानून का उपयोग सुरक्षा के बजाय डर पैदा करने के साधन के रूप में होने लगे, तब समाज में विश्वास समाप्त हो जाता है। सामान्य मित्रता, कार्यस्थल की सहज बातचीत या भावनात्मक क्षणों में कही गई बात भी यदि कानूनी संकट में बदल सकती है, तो स्वाभाविक है कि सवर्ण वर्ग मानसिक रूप से असुरक्षित महसूस करेगा। यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है, क्योंकि कानून का उद्देश्य न्याय होना चाहिए, भय नहीं।
तीसरा और अत्यंत संवेदनशील विषय है जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था। आज आरक्षण केवल सीटों तक सीमित नहीं है, बल्कि आयु सीमा, प्रयासों की संख्या (attempts) और फीस जैसी सुविधाओं तक फैल चुका है। परिणामस्वरूप एक सवर्ण छात्र को कम आयु में, कम प्रयासों में, पूरी फीस देकर और अधिक अंक लाकर चयन पाना होता है, जबकि अन्य वर्गों को तुलनात्मक रूप से अधिक अवसर प्राप्त होते हैं। यह असमान प्रतिस्पर्धा सवर्ण युवाओं में गहरी कुंठा और हीनभावना पैदा करती है।
इसका प्रभाव केवल चयन प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सामाजिक व्यवहार को भी प्रभावित करता है। लोग स्वाभाविक रूप से उन्हीं के साथ उठना-बैठना पसंद करते हैं, जिनके साथ समान अवसर, समान संघर्ष और समान शर्तें हों। जब अवसरों में असमानता होती है, तो सामाजिक दूरी अपने आप बन जाती है। यह दूरी किसी घृणा से नहीं, बल्कि मानसिक असंतुलन और अन्याय की अनुभूति से जन्म लेती है।
इस पीड़ा को समझने के बजाय कई बार सवर्ण युवाओं को यह कहकर चुप करा दिया जाता है कि “तुम्हें अपने पूर्वजों के कर्मों का फल भुगतना होगा।” यह तर्क न वैज्ञानिक है, न संवैधानिक और न ही मानवीय। आधुनिक भारत व्यक्ति को उसके कर्मों से आंकने की बात करता है, न कि उसकी जाति या उसके पूर्वजों से। यदि वर्तमान में हो रहे किसी भी प्रकार के शोषण या मानसिक उत्पीड़न पर चर्चा ही न की जाए, तो सामाजिक संतुलन कैसे बनेगा?
अब इस पूरी स्थिति में UGC (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के हालिया दिशा-निर्देशों और नीतिगत परिवर्तनों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि शिक्षा संस्थानों में वैचारिक एकतरफापन, सवर्ण-विरोधी सोच या चयनात्मक संवेदनशीलता को बढ़ावा दिया गया, तो इसका सीधा प्रभाव सवर्ण छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा। शिक्षा का उद्देश्य विचारों का संतुलन और बौद्धिक स्वतंत्रता है, न कि किसी एक वर्ग को अपराधबोध में जीने के लिए मजबूर करना।
यदि विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम, सेमिनार, शोध विषय और अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ किसी विशेष विचारधारा से प्रभावित होंगी, तो निष्पक्ष अकादमिक वातावरण समाप्त हो जाएगा। इससे न केवल सवर्ण छात्र, बल्कि संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था कमजोर होगी। शिक्षा को सामाजिक न्याय का उपकरण बनाना गलत नहीं है, लेकिन उसे वैचारिक दंड का माध्यम बनाना लोकतंत्र के लिए घातक है।
अंततः यह समझना होगा कि समाज टकराव से नहीं, संवाद से आगे बढ़ता है। न तो सवर्ण वर्ग पूर्ण रूप से दोषी है और न ही आज का SC-ST-OBC वर्ग पूर्ण रूप से निर्दोष । समस्या वर्गों में नहीं, बल्कि संतोष वर्मा और फूल सिंह बरैया जैसे और उन जैसी मानसिकताओं वाले लोगो में है जो विभाजन को राजनीतिक और वैचारिक हथियार बनाती हैं। जब तक हर वर्ग दूसरे की पीड़ा को समझने का प्रयास नहीं करेगा और हर नीति को संतुलन के साथ लागू नहीं किया जाएगा, तब तक सामाजिक दूरी कम होना कठिन है।
भारत की ताकत उसकी विविधता और संवाद में है। आवश्यकता इस बात की है कि इतिहास के बोझ को वर्तमान की पीढ़ी पर थोपने के बजाय, समान अवसर, समान सम्मान और समान सुरक्षा पर आधारित समाज की नींव रखी जाए। तभी वास्तविक सामाजिक समरसता संभव होगी।
































