दिल्ली में कांवड़ मार्ग पर फैले कांच के टुकड़े — एक सोची-समझी साजिश?
दिल्ली के शाहदरा इलाके से एक चिंताजनक खबर सामने आई है। कांवड़ यात्रा के लिए बनाए गए मार्ग पर शरारती तत्वों ने जानबूझकर कांच के टुकड़े फैला दिए। यह घटना लगभग एक किलोमीटर तक फैली हुई थी। कांवड़ियों की आस्था और सुरक्षा से खुला मजाक करने वाली इस घटना के बाद, स्थानीय प्रशासन, PWD और नगर निगम के कर्मचारी मार्ग को साफ करने में जुटे हुए हैं।
स्थानीय विधायक श्री संजय गोयल स्वयं घटनास्थल पर पहुंचे और निरीक्षण किया, जबकि दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने घटना का संज्ञान लेकर सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के निर्देश दिए।
सवाल यह है: क्या यह केवल एक शरारत थी, या एक लक्षित मानसिकता का हिस्सा?
देशभर में धार्मिक यात्राओं — विशेषकर हिंदू धार्मिक यात्राओं — को लेकर लगातार आ रही ऐसी घटनाएं एक पैटर्न की ओर इशारा करती हैं। कभी वंदे भारत ट्रेन पर पथराव, तो कभी अमरनाथ यात्रा पर आतंकी हमले की आशंका। सवाल उठता है कि आखिर हर बार हिंदू यात्राओं को ही क्यों निशाना बनाया जाता है?
वंदे भारत पर पथराव: एक नहीं, दर्जनों बार हुआ हमला
देश के अलग-अलग हिस्सों में वंदे भारत ट्रेनों पर पथराव की घटनाएं हो चुकी हैं। यह ट्रेन न सिर्फ भारत की तकनीकी प्रगति की प्रतीक है, बल्कि इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में भी शामिल किया गया है। ऐसे में बार-बार इस पर हमले होना यह दर्शाता है कि निशाना कहीं गहराई में है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, झारखंड, तेलंगाना, केरल — लगभग हर राज्य में यह ट्रेंड देखा गया है। अब तक कोई स्पष्ट चेहरा सामने नहीं आया, कोई मजहबी एंगल भी नहीं बताया गया — लेकिन “अपराधी कौन?” यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।
अमरनाथ और वैष्णो देवी यात्राएं: हर साल सुरक्षा क्यों बढ़ानी पड़ती है?
हर साल अमरनाथ यात्रा से पहले हाई अलर्ट जारी किया जाता है। भारी सुरक्षा बल तैनात किए जाते हैं। क्यों?
क्योंकि यह यात्रा कई बार आतंकियों के निशाने पर आ चुकी है। 2017 में अमरनाथ यात्रियों की बस पर हमला हुआ था, जिसमें 8 श्रद्धालु मारे गए थे। वैष्णो देवी यात्रा को भी कई बार कट्टरपंथी संगठनों से खतरा बताया गया है।
अब सवाल उठता है कि क्या यही सुरक्षा हज यात्रा, ईद की नमाज़ या ईसाई पर्वों के दौरान लगती है? शायद नहीं। इसका कारण केवल यह है कि हिंदू त्योहारों और यात्राओं को अक्सर “उन्मादी भीड़”, “ढोंग”, “ध्वनि प्रदूषण” जैसे लेबल्स से जोड़ा जाता है, जबकि अन्य धर्मों के आयोजनों पर सवाल पूछना “असहिष्णुता” माना जाता है।
कांवड़ यात्रा: श्रद्धा या असहिष्णुता का बहाना?
कांवड़ यात्रा लाखों लोगों की आस्था से जुड़ी है। शिवभक्त सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर पवित्र गंगा जल लाते हैं और भगवान शिव को अर्पित करते हैं। इसके लिए राज्य सरकारें रास्तों की व्यवस्था करती हैं, जिससे अन्य नागरिकों को सुविधा मिल सके। लेकिन फिर भी इसे कुछ “बुद्धिजीवियों” द्वारा “अराजकता”, “पब्लिक डिस्टरबेंस” जैसे शब्दों से बदनाम किया जाता है।
अब जब कांवड़ मार्ग पर जानबूझकर कांच के टुकड़े बिछाए जाते हैं, तो इसे एक धार्मिक हमले की तरह क्यों नहीं देखा जाता?
ध्यान देने योग्य दोहरा मापदंड:
- जब कोई अमरनाथ यात्रा पर हमला करता है, तो उसे “अलगाववादी”, “आतंकी” नहीं कहा जाता।
- लेकिन अगर कोई मंदिर निर्माण की मांग करता है, तो उसे “कट्टर हिंदुत्ववादी” घोषित कर दिया जाता है।
- जब मुस्लिम समाज में कोई कुरीति होती है, तो वह “व्यक्तिगत स्तर की गलती” कहलाती है। लेकिन जब हिंदू समाज में अस्पृश्यता की बात उठाई जाती है — चाहे वो प्रमाणित हो या नहीं — तो संपूर्ण धर्म दोषी बना दिया जाता है।
क्या कभी किसी ने ये पूछा कि कौन थे वे लोग जिन्होंने छुआछूत की शुरुआत की?
कौन थे जिन्होंने इसका विरोध किया?
क्यों सारे दोष “मनुवादियों” पर मढ़ दिए जाते हैं, जबकि खुद मनुस्मृति को पूरी तरह से पढ़ने वाला शायद ही कोई हो?
तो आखिर कौन हैं ये लोग जो हिंदू यात्राओं को निशाना बनाते हैं?
हर बार CCTV फुटेज धुंधले होते हैं। हर बार आरोपियों का नाम नहीं बताया जाता। हर बार “मनोवैज्ञानिक परेशानी”, “अज्ञात असामाजिक तत्व”, “शरारती तत्व” जैसे बहाने दिए जाते हैं।
लेकिन अगर यही घटना किसी अन्य धर्म के त्योहार या स्थल पर होती, तो क्या अब तक:
- UAPA नहीं लग जाता?
- अंतरराष्ट्रीय मीडिया चीख-चीख कर “India is unsafe for minorities” का नारा नहीं लगाती?
समाप्ति विचार: धर्मनिरपेक्षता का असली मतलब क्या है?
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है — सभी धर्मों के प्रति समान दृष्टिकोण।
लेकिन आज की राजनीति और मीडिया केवल एक धर्म को दबाने में जुटी है। उसका मजाक उड़ाना “freedom of expression” है, लेकिन यदि कोई सनातन संस्कृति की बात करे तो वह “majoritarianism” कहलाता है।
अब समय आ गया है कि हिंदू समाज संगठित हो, सजग हो और प्रश्न करे।
क्यों बार-बार हमारी आस्था ही निशाने पर होती है?
क्यों हम ही “सहनशील” बनने को बाध्य हैं, जबकि हम पर ही वार होते हैं?

































