लखनऊ की विशेष एससी/एसटी कोर्ट ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें रेखा देवी नाम की एक महिला को झूठा गैंगरेप और एससी/एसटी एक्ट के तहत फर्जी मुकदमा दर्ज करने के लिए 7 साल 6 महीने की सजा और 2 लाख 1 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले में दो निर्दोष व्यक्तियों, राजेश और भूपेंद्र, को न केवल बरी किया गया, बल्कि उनके परिवारों को जुर्माने की आधी राशि मुआवजे के रूप में देने का आदेश भी दिया गया। यह फैसला न केवल न्याय की जीत है, बल्कि यह एक गंभीर सवाल भी उठाता है: क्या भारत में कुछ एकतरफा कानून, जो विशेष रूप से महिलाओं या कुछ समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं, संविधान के मूलभूत सिद्धांतों, विशेष रूप से अनुच्छेद 14 और 15, के लिए खतरा बन रहे हैं?
लखनऊ मामले का विवरण
29 जून 2021 को, उत्तर प्रदेश का जिला बाराबंकी के जैदपुर थाने में रेखा देवी ने राजेश और भूपेंद्र के खिलाफ गैंगरेप और जानमाल की धमकी का मुकदमा दर्ज कराया। मामले की जांच उत्तर प्रदेश लखनऊ के बीकेटी थाने में स्थानांतरित हुई, जहां पुलिस ने पाया कि घटनास्थल का निरीक्षण, गवाहों के बयान, और वैज्ञानिक साक्ष्यों से आरोपों की पुष्टि नहीं हुई। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि रेखा ने निजी दुश्मनी और राजेश की पत्नी को अपमानित करने के इरादे से झूठी शिकायत दर्ज की थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि रेखा ने मुआवजे की राशि हड़पने के लिए कानून का दुरुपयोग किया। विशेष जज विवेकानंद शरण त्रिपाठी ने 17 जून 2025 को रेखा को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई और निर्देश दिया कि फर्जी शिकायत के आधार पर दी गई कोई भी राहत राशि वापस ली जाए।
यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बन गया है जहां कानून का दुरुपयोग निर्दोष लोगों को सजा भुगतने के लिए मजबूर करता है। हालांकि, यह व्यापक समस्या की ओर भी इशारा करता है, जहां एकतरफा कानून संवैधानिक समानता और निष्पक्षता के सिद्धांतों को चुनौती दे रहे हैं।
एकतरफा कानून और संवैधानिक सिद्धांत
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 लिंग, धर्म, जाति, या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, लेकिन यह सकारात्मक कार्रवाई के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति भी देता है। इस आधार पर, भारत में कई कानून बनाए गए हैं, जैसे कि दहेज निषेध अधिनियम, घरेलू हिंसा अधिनियम, और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, जो महिलाओं और वंचित समुदायों की सुरक्षा के लिए हैं। हालांकि, इन कानूनों के लागू होने के तरीके और उनके दुरुपयोग ने कई बार अनुच्छेद 14 और 15 के मूल सिद्धांतों को कमजोर किया है।
1. कानून का दुरुपयोग और निर्दोषों का उत्पीड़न
लखनऊ मामले में रेखा देवी ने न केवल गैंगरेप का झूठा आरोप लगाया, बल्कि एससी/एसटी एक्ट का भी दुरुपयोग किया। ऐसे मामले असामान्य नहीं हैं। 2018 में भास्कर की एक रिपोर्ट के अनुसार, रोहतक में एक साल में छेड़छाड़ और दुष्कर्म के 26% मामले फर्जी पाए गए। यह दुरुपयोग न केवल निर्दोष व्यक्तियों को जेल की सजा और सामाजिक अपमान का सामना करने के लिए मजबूर करता है, बल्कि यह संवैधानिक समानता के सिद्धांत को भी कमजोर करता है। जब कानून एक पक्ष के लिए पक्षपाती हो जाता है, तो यह अनुच्छेद 14 के तहत समान संरक्षण की गारंटी का उल्लंघन करता है।
2. लिंग आधारित पक्षपात
भारत में बलात्कार और यौन उत्पीड़न से संबंधित कानून, जैसे कि भारतीय दंड संहिता की धारा 376, पुरुषों को ही अपराधी मानते हैं। यह धारणा कि पुरुष हमेशा अपराधी और महिलाएं हमेशा पीड़ित होती हैं, लिंग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती है, जो अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है। लखनऊ मामले में, यदि पुलिस और कोर्ट ने गहन जांच नहीं की होती, तो दो निर्दोष पुरुष आजीवन कारावास का सामना कर सकते थे। यह पक्षपात न केवल पुरुषों के अधिकारों का हनन करता है, बल्कि वास्तविक पीड़ितों के लिए न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता को भी कम करता है।
3. न्याय प्रणाली पर बोझ
झूठे मुकदमे न्यायिक प्रणाली पर अनावश्यक बोझ डालते हैं। लखनऊ मामले में, पुलिस और कोर्ट को कई महीनों तक संसाधनों का उपयोग करना पड़ा, जो वास्तविक अपराधों की जांच और सुनवाई के लिए इस्तेमाल हो सकते थे। यह स्थिति संवैधानिक न्याय के त्वरित वितरण के सिद्धांत को कमजोर करती है।
4. सामाजिक और आर्थिक प्रभाव
झूठे आरोपों का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी गहरा होता है। निर्दोष व्यक्तियों को सामाजिक बहिष्कार, नौकरी की हानि, और परिवार की बदनामी का सामना करना पड़ता है। लखनऊ मामले में, राजेश और भूपेंद्र को तीन महीने जेल में बिताने पड़े, जिसने उनके परिवारों को आर्थिक और भावनात्मक रूप से प्रभावित किया। यह स्थिति संविधान के तहत गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का भी उल्लंघन करती है।
समाधान के उपाय
लखनऊ कोर्ट का फैसला एक सकारात्मक कदम है, लेकिन एकतरफा कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए और अधिक कदम उठाने की आवश्यकता है।
- कानून में संतुलन: बलात्कार और यौन उत्पीड़न के कानूनों को लिंग-तटस्थ बनाया जाना चाहिए, ताकि पुरुष और अन्य लिंग पहचान वाले लोग भी अपनी शिकायत दर्ज कर सकें। यह अनुच्छेद 15 के तहत भेदभाव को कम करेगा।
- झूठी शिकायतों पर सख्त सजा: लखनऊ मामले की तरह, झूठी शिकायतों के लिए कठोर दंड का प्रावधान होना चाहिए। यह कानून के दुरुपयोग को हतोत्साहित करेगा।
- पुलिस और न्यायिक सुधार: पुलिस को वैज्ञानिक जांच तकनीकों और संवेदनशीलता के साथ सभी मामलों की जांच करनी चाहिए। कोर्ट में फास्ट-ट्रैक सुनवाई से झूठे मामलों का त्वरित निपटारा हो सकता है।
- जागरूकता और शिक्षा: समाज में लैंगिक समानता और कानूनी जिम्मेदारी के बारे में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। यह झूठा मुकदमों को कम करने में मदद करेगा।
निष्कर्ष
लखनऊ कोर्ट का फैसला यह दर्शाता है कि कानून का दुरुपयोग करने वालों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।। हालांकि, यह एक बड़े संकट की ओर भी इशारा करता है, जहां एकतरफा कानून संवैधानिक समानता, निष्पक्षता, और न्याय के सिद्धांतों को खतरे में डाल रहे हैं।। अनुच्छेद 14 और 15 की भावना को बनाए रखने के लिए, कानूनों में संतुलन, कठोर दंड, और सुधारों की आवश्यकता है।। तभी हम एक ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं जो सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करे, चाहे वह किसी भी लिंग या समुदाय का हो।।

































