क्या सवर्ण होना अब अपराध है? SC/ST कानून और जातीय न्याय का उल्टा चेहरा
भारत का संविधान हर नागरिक को समानता का अधिकार देता है। फिर भी एक वर्ग — जिसे हम ‘सवर्ण’ कहते हैं — आज ये सवाल पूछने को मजबूर हो रहा है: “क्या हमारा सवर्ण होना ही हमारा गुनाह है?”
जातीय भेदभाव मिटाने और दलितों को न्याय दिलाने के उद्देश्य से बनाए गए SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम ने अब एक ऐसे रूप में बदलना शुरू कर दिया है, जहां न्याय के नाम पर अन्याय होता दिख रहा है।
सवर्णों को दोषी मानने की मानसिकता
देश के हजारों सवर्ण युवा, जो खेतों में मजदूरी करते हैं, बेरोजगार हैं या सीमित संसाधनों में जीवन जीते हैं — उन्हें सिर्फ उनकी जाति के कारण “अत्याचारी” माना जाता है। उनके लिए कोई आरक्षण नहीं, कोई विशेष सुरक्षा नहीं। और अगर किसी SC/ST व्यक्ति ने उनके खिलाफ FIR कर दी, तो बिना जांच के गिरफ्तारी, कोई अग्रिम जमानत नहीं, और सामाजिक बहिष्कार जैसा माहौल — यह कैसी समानता है?
SC/ST कानून – सुरक्षा या शस्त्र?
SC/ST एक्ट 1989 सामाजिक सुरक्षा का माध्यम बनना था, लेकिन कई मामलों में यह प्रतिशोध और व्यक्तिगत दुश्मनी का औजार बन गया है। खासकर नौकरी, प्रेम-प्रसंग, ज़मीन-जायदाद जैसे मामलों में, कई पढ़े-लिखे और प्रभावशाली लोग इस एक्ट का प्रयोग अपनी ‘खुन्नस’ निकालने के लिए करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक ने 2018 में इस एक्ट के दुरुपयोग की चेतावनी दी थी और FIR से पहले जांच की सिफारिश की थी। लेकिन वोटबैंक की राजनीति ने इस सुझाव को कानून में शामिल नहीं होने दिया।
क्या हर दलित शोषित और हर सवर्ण शोषक है?
समय बदल चुका है। अब SC/ST वर्ग के कई लोग बड़े अफसर, नेता, जज और उद्योगपति हैं। वहीं लाखों सवर्ण आज भी आर्थिक रूप से पिछड़े, बेरोजगार और संघर्षरत हैं। लेकिन कानून की नज़र सिर्फ जाति देखता है, हकीकत नहीं।
क्या यह लोकतंत्र और संविधान की आत्मा के खिलाफ नहीं?
जातीय आरक्षण बनाम वास्तविक जरूरत
आरक्षण का उद्देश्य बराबरी था, स्थायी लाभ नहीं। अब ज़रूरत है कि आरक्षण और विशेष कानूनों की समय-सीमा और समीक्षा तय की जाए।
कानून का आधार जाति नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति और वास्तविक पिछड़ापन होना चाहिए। यह न केवल सवर्णों के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए न्यायसंगत होगा।
आज जब एक सवर्ण युवा यह कहता है कि “मैंने कुछ गलत नहीं किया फिर भी मुझे सज़ा मिल रही है”, तो यह भारत के न्यायिक और सामाजिक ताने-बाने पर प्रश्नचिन्ह है।
जातीय समीकरणों को सही करने के लिए कानून जरूरी हैं, लेकिन उन्हें दुरुपयोग से बचाना और संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र का कर्तव्य है।
सवाल सिर्फ इतना है:
क्या जाति के नाम पर बनाया गया कोई भी कानून, अगर वह एक निर्दोष को भी पीड़ित बना दे, तो वह “न्याय” कहलाएगा?

































