भारत का संविधान सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है। लेकिन आज़ादी के 75 वर्षों बाद भी अगर किसी समाज का हिस्सा यह पूछने को मजबूर हो जाए कि “क्या सवर्ण होना अपराध है?”, तो यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं, संविधानिक और नैतिक रूप से भी गहरा है।
जातीय समानता के नाम पर जो कानून बनाया गया था – जैसे कि SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (1989) – वह समय के साथ सामाजिक न्याय की ढाल से ज्यादा तलवार बन गया है, जो कई बार मासूमों की गर्दनें काटता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे “सवर्ण” हैं।
1. क्या सवर्णों के चार हाथ और दो सिर हैं?
जब संविधान में “आरक्षण” और “संरक्षण” की व्यवस्था की गई, तो उसका आधार सामाजिक पिछड़ापन और ऐतिहासिक शोषण था। लेकिन क्या हर सवर्ण अमीर, शक्तिशाली, उच्च पद वाला और शोषक होता है?
नहीं।
आज देश के लाखों सवर्ण आर्थिक रूप से पिछड़े हैं, खेतों में मजदूरी करते हैं, छोटे दुकानदार हैं, बेरोजगार हैं। लेकिन उन्हें न तो आरक्षण मिलता है, न संरक्षण, और अगर कोई SC/ST व्यक्ति उन पर झूठा आरोप लगा दे, तो उन्हें बिना प्राथमिक जांच के गिरफ्तार कर लिया जाता है।
क्या यही है वो “समानता” जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है?
2. SC/ST एक्ट – संरक्षण या प्रतिशोध का औजार?
SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 का मूल उद्देश्य था – दलितों और आदिवासियों को शोषण से बचाना। लेकिन इस अधिनियम में FIR दर्ज होते ही गिरफ्तारी, बिना अग्रिम जमानत के जैसी प्रावधान हैं, जो इसे अन्य सभी कानूनों से अलग और अत्यधिक कठोर बनाते हैं।
समस्या तब खड़ी होती है जब इस कानून का प्रयोग झूठे मामलों में “हथियार” की तरह किया जाता है:
- बदला लेने के लिए,
- संपत्ति विवाद में दबाव बनाने के लिए,
- प्रेम प्रसंगों में जाति के नाम पर फंसाने के लिए,
- या नौकरी/पद/प्रतिष्ठा से हटाने के लिए।
अनेक रिपोर्ट्स और कोर्ट के निर्णयों में ये सामने आया है कि इस कानून का दुरुपयोग एक गंभीर सच्चाई है।
3. क्या हर दलित शोषित है और हर सवर्ण अत्याचारी?
ये सवाल बहुत अहम है। क्योंकि आज के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि:
- कई SC/ST वर्ग के लोग सरकारी नौकरियों में हैं, बड़े अफसर, जज, विधायक, मंत्री हैं।
- वे शहरों में रहते हैं, विदेशी शिक्षा पा चुके हैं, आर्थिक और सामाजिक रूप से संपन्न हैं।
तो फिर क्या उन्हें आज भी “शोषित” माना जाए?
और दूसरी तरफ…
- कई सवर्ण आज भी गाँवों में गरीबी में जी रहे हैं, बेरोजगार हैं, और आरक्षण के कारण अवसरों से वंचित रह जाते हैं।
- उन्हें किसी भी कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता, सिर्फ इसलिए क्योंकि वे “General Category” में पैदा हुए हैं।
क्या किसी की जाति ही उसकी नियति है?
4. न्याय के नाम पर अन्याय – सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
2018 में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के दुरुपयोग पर चेतावनी देते हुए कहा कि:
“कोई भी कानून इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि उसका उपयोग प्रतिशोध की भावना से किया जाए।”
कोर्ट ने FIR से पहले प्राथमिक जांच और गिरफ्तारी पर रोक जैसे सुझाव दिए।
लेकिन इसके विरोध में राजनीतिक दलों ने SC/ST एक्ट में संशोधन करके अदालत के आदेश को पलट दिया, जिससे फिर से कानून अत्यधिक कठोर बन गया।
यह दिखाता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति न्याय की तुलना में वोट बैंक के प्रति अधिक प्रतिबद्ध है।
5. सामाजिक न्याय या राजनीतिक एजेंडा?
SC/ST एक्ट के समर्थक इसे ऐतिहासिक अन्याय का उत्तर कहते हैं, लेकिन क्या हम वर्तमान में रहकर भी अतीत के अपराधों का बदला वर्तमान पीढ़ी से लेंगे?
अगर कोई आज पैदा होने वाले ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य या कायस्थ बच्चे को “जन्म से ही शोषक” मान लिया जाए, तो यह स्वयं जातिवादी सोच नहीं है तो और क्या है?
और क्या यही है सामाजिक न्याय?
नहीं, यह सकारात्मक भेदभाव के नाम पर संस्थागत अन्याय है।
6. समाधान क्या है?
- कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए सख्त निगरानी और झूठे मामलों में दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
- न्याय का आधार केवल जाति नहीं बल्कि वास्तविक सामाजिक, आर्थिक स्थिति होनी चाहिए।
- आरक्षण और विशेष कानूनों की समय-सीमा तय होनी चाहिए। 75 वर्षों के बाद अब समीक्षा जरूरी है।
- जाति के बजाय “Need Based Justice” की ओर बढ़ना होगा।
भारत एक लोकतांत्रिक और न्यायप्रिय देश है। लेकिन जब किसी जाति को सिर्फ उसकी पहचान के कारण दोषी और किसी को अत्याचार का शिकार मान लिया जाता है, तो यह समानता और कानून की आत्मा के खिलाफ है।
आज जरूरत है कि हम इस सवाल से आँख मिलाएं:
“क्या सवर्ण होना गुनाह है?”
यदि उत्तर “नहीं” है, तो फिर ऐसे कानून और सामाजिक सोच को संशोधित करना, चुनौती देना और संतुलन स्थापित करना ही सच्चा लोकतांत्रिक कर्तव्य है।
भारत को जातियों में नहीं, नागरिकों में बाँटकर देखें — तभी संविधान का असली सम्मान होगा।

































