भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है, जहाँ सबको बराबरी का हक़ है। लेकिन क्या सच में सब बराबर हैं? आज का कड़वा सच यह है कि हिंदू समाज की आस्था को हल्के में लेना “प्रगतिशीलता” कहलाता है, जबकि अन्य समुदायों या जातियों को अपमानित करने पर कठोर कानून तुरंत कार्रवाई करता है।
हालिया उदाहरण लें—बरेली के एक सरकारी शिक्षक रजनीश गंगवार ने कांवड़ यात्रा पर तंज कसती कविता पढ़ दी। उन्होंने कहा,
“कांवड़ लेकर मत जाओ, किताबें पढ़ो, ज्ञान का दीप जलाओ…”
वीडियो वायरल हुआ, लोगों ने विरोध किया, FIR हुई। लेकिन फिर गंगवार ने वीडियो जारी कर दिया—
“मैं न धर्म विरोधी हूँ, न सरकार विरोधी। अगर किसी की भावना आहत हुई है तो क्षमा चाहता हूँ।”
बस, मामला शांत!
अब सोचिए—अगर कोई सवर्ण किसी दलित को जातिसूचक गाली देकर बाद में माफी मांग ले तो क्या होता? SC/ST एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी, जमानत मुश्किल, केस सालों चलेगा। लेकिन हिंदू आस्था पर चोट मारने वाला सिर्फ माफी मांगकर छूट गया। क्यों?
कानून का फर्क – हिंदू धर्म बनाम जातिगत मामला
- हिंदू आस्था पर हमला
- लागू होता है IPC की धारा 295A:
जानबूझकर किसी धर्म या धार्मिक भावना को आहत करना अपराध है।
- लेकिन यह अपराध जमानती है, और इसमें इरादे को साबित करना जरूरी होता है।
- आरोपी कह देता है “मेरा इरादा गलत नहीं था”, माफी मांग लेता है और मामला हल्का हो जाता है।
- लागू होता है IPC की धारा 295A:
- जातिसूचक अपमान
- लागू होता है SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम।
- इसमें इरादे की कोई जरूरत नहीं, जातिसूचक गाली देते ही अपराध माना जाता है।
- यह अपराध गैर-जमानती है, पुलिस को तुरंत गिरफ्तारी करनी होती है।
यानि एक ओर हिंदू धर्म को गाली दो, माफी से बच सकते हो; दूसरी ओर दलित को गाली दो, जेल पक्की!
ये दोहरे मापदंड क्यों?
- राजनीतिक वोटबैंक का खेल
- दलित और अल्पसंख्यक वर्ग चुनावों में निर्णायक माने जाते हैं, इसलिए उनके लिए सख्त कानून बनाए गए।
- हिंदू समाज बहुसंख्यक और बंटा हुआ है, इसलिए उनके लिए कोई खास सुरक्षा कवच नहीं।
- बौद्धिक नैरेटिव का असर
- सेक्युलर सोच ने हिंदू परंपराओं को पिछड़ापन बताना फैशन बना दिया।
- अगर कोई कहे “मस्जिद में जाना बेकार है” तो तुरंत साम्प्रदायिकता का आरोप लगेगा।
- लेकिन अगर कोई कहे “कांवड़ मत लो, मंदिर मत जाओ” तो इसे प्रगतिशीलता और शिक्षा का संदेश बताया जाएगा।
- कानूनी असमानता
- SC/ST एक्ट संविधान में विशेष संरक्षण के तहत आया।
- हिंदू धर्म की आस्था को सिर्फ IPC 295A में मामूली अपराध माना गया।
- इसीलिए अदालतें भी इसे “इतना गंभीर अपराध नहीं” मानतीं।
हिंदू आस्था क्यों कमज़ोर मानी जाती है?
- हिंदू समाज धैर्यशील और सहिष्णु है। वह तुरंत हिंसक प्रतिक्रिया नहीं देता।
- आंतरिक जातिगत और प्रांतीय बंटवारे ने एकजुट ताकत बनने नहीं दी।
- मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग ने दशकों से हिंदू रीति-रिवाज को मजाक बना कर पेश किया।
- जब मंदिरों, यात्राओं, मूर्तियों का अपमान हुआ, तो समाज ने उसे “नज़रअंदाज़ कर दो” कहकर छोड़ दिया।
यही वजह है कि आज कोई भी कांवड़ यात्रा, भगवान राम, शिवलिंग, सनातन धर्म पर टिप्पणी करने से नहीं डरता।
रजनीश गंगवार केस – हिंदू समाज के लिए सबक
गंगवार ने भले कहा कि उनका उद्देश्य शिक्षा को बढ़ावा देना था, लेकिन कांवड़ यात्रा को अशिक्षा से जोड़ना क्या उचित था?
- क्या मुस्लिम बच्चों को रोज़ा रखने से मना करोगे?
- क्या ईसाई बच्चों से कहोगे कि चर्च मत जाओ?
नहीं! क्योंकि तब माइनॉरिटी भावनाओं का डर है। लेकिन हिंदू परंपरा पर टिप्पणी “Safe Zone” मानी जाती है।
FIR हुई, लेकिन माफी ने सब ठंडा कर दिया। सोचिए, अगर हिंदू समाज इतना ही कमजोर न होता, तो क्या ऐसा मुमकिन था?
क्या हल है?
- कानून बराबर होना चाहिए
- हिंदू धर्म, देवी-देवताओं और यात्राओं का अपमान भी गैर-जमानती अपराध बने।
- जैसे SC/ST एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी होती है, वैसे ही धर्म अपमान पर भी हो।
- हिंदू समाज को एकजुट होना होगा
- सिर्फ सोशल मीडिया पर गुस्सा नहीं, कानूनी लड़ाई लड़नी होगी।
- मंदिरों, परंपराओं पर अपमानजनक टिप्पणी करने वालों के खिलाफ मुकदमे बढ़ाने होंगे।
- सांस्कृतिक गौरव को पुनर्जीवित करना
- बच्चों को बताना होगा कि कांवड़ यात्रा सिर्फ परंपरा नहीं, तपस्या और समाज-सेवा की मिसाल है।
- जब समाज खुद अपनी परंपराओं का महत्व नहीं समझाएगा तो बाहरी लोग उसे “बेकार की रस्में” कहकर तोड़ेंगे।
- राजनीतिक दबाव बनाना होगा
- जिस तरह दलित, मुस्लिम और अन्य समुदाय अपनी सुरक्षा के लिए राजनीति पर दबाव बनाते हैं, वैसा ही हिंदू समाज को भी करना होगा।
- जब तक हिंदू वोटबैंक को महत्व नहीं मिलेगा, तब तक उनके लिए कोई सख्त कानून नहीं बनेगा।
निष्कर्ष – कब तक सहेंगे ये अपमान?
आज का लोकतंत्र बराबरी का नहीं, वोटबैंक का खेल बन गया है।
- एक तरफ हिंदू समाज की आस्था को चोट पहुँचाने पर माफी से मामला खत्म हो जाता है।
- दूसरी तरफ जातिगत या अल्पसंख्यक अपमान पर जेल और सख्त कार्रवाई होती है।
रजनीश गंगवार ने हिंदू समाज को नीचा दिखाया, FIR हुई, लेकिन माफी ने बचा लिया।
अगर यही कानून किसी अन्य समुदाय के लिए होता तो क्या नतीजा ऐसा ही होता?
अब वक्त है कि हिंदू समाज ये समझे—
✅ आस्था सिर्फ निजी मामला नहीं, सांस्कृतिक पहचान है।
✅ उसे अपमानित करने वालों को कानूनी और सामाजिक दोनों स्तर पर जवाब देना जरूरी है।
✅ जब तक हिंदू खुद अपनी ताकत नहीं दिखाएगा, तब तक उसे हल्के में लिया जाएगा।
समाधान का सीधा रास्ता
- धर्म अपमान कानून को SC/ST एक्ट जितना मजबूत बनाओ।
- हिंदू समाज एकजुट होकर अपमान करने वालों पर मुकदमे करे।
- राजनीतिक दलों पर दबाव डाले कि हिंदू परंपराओं की रक्षा हो।

































