भारतीय राजनीति का चरित्र हमेशा से बहस, विरोध और विमर्श पर आधारित रहा है। विपक्ष का काम सत्ता पर निगरानी रखना और जनता की समस्याओं को आवाज़ देना है। लेकिन आज़ादी के 75 वर्षों बाद भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल चुका है। आज विपक्ष का एक बड़ा हिस्सा केवल नकारात्मक प्रचार और जनभावनाओं को भ्रमित करने के एजेंडे पर काम करता नज़र आ रहा है।
यह कोई सामान्य रणनीति नहीं है, बल्कि इसे इतिहास में एक ख़तरनाक नाम दिया गया है – गोबेल्सीय रणनीति (Goebbelsian Strategy)। इसका सूत्र था:
“झूठ को बार-बार बोलो, अलग-अलग तरीकों से बोलो, तो वही जनता की नज़रों में सच जैसा लगने लगता है।”
गोबेल्सीय रणनीति क्या है?
जर्मनी के नाज़ी शासन में जोसेफ गोबेल्स नाम का प्रचार मंत्री था। उसने हिटलर के नेतृत्व को मजबूत करने के लिए मीडिया और संचार माध्यमों का ऐसा इस्तेमाल किया कि झूठ और अफवाहें सच जैसी लगने लगीं। उसने कहा था – “यदि आप झूठ को सौ बार दोहराएँगे, तो वह जनता के बीच सच माना जाने लगेगा।”
आज भारत का विपक्ष उसी नीति पर चलता दिख रहा है।
विपक्ष की वर्तमान रणनीति
- हर उपलब्धि में खोट निकालना
चाहे वह चंद्रयान-3 की सफलता हो, जी-20 शिखर सम्मेलन की मेज़बानी हो या ओलंपिक में खिलाड़ियों की जीत—विपक्ष का बड़ा हिस्सा हर जगह केवल नकारात्मकता पर ज़ोर देता है। - झूठे आँकड़ों का प्रचार
बेरोज़गारी, महँगाई और कृषि संकट जैसे मुद्दों पर वास्तविक तस्वीर से अलग आंकड़े गढ़कर प्रस्तुत किए जाते हैं, ताकि जनता में असंतोष फैले। - विदेशी मंचों पर भारत की छवि खराब करना
विपक्षी नेताओं द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आलोचना करना अब सामान्य हो गया है। यह जनता के हित में नहीं, बल्कि सरकार विरोध की जिद का परिणाम है। - धर्म और जाति आधारित नैरेटिव गढ़ना
हिंदुत्व को बार-बार नकारात्मक रूप से पेश किया जाता है, ताकि समाज में विभाजन पैदा हो।
उदाहरण: गोबेल्सीय रणनीति की झलक
- “लोकतंत्र खतरे में है” – विपक्ष बार-बार यह नैरेटिव गढ़ता है, जबकि भारत का लोकतंत्र पहले से कहीं अधिक सक्रिय है।
- “अडानी-अंबानी का राज” – यह प्रचार किया गया कि सरकार केवल दो उद्योगपतियों के लिए काम कर रही है। जबकि वास्तविकता में MSME और Start-up भारत जैसे कार्यक्रम करोड़ों छोटे उद्यमियों को अवसर दे रहे हैं।
- “मीडिया बिकाऊ है” – विपक्ष लगातार यह कहता है कि पूरा मीडिया पक्षपाती है, जबकि हकीकत यह है कि सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है।
- “संविधान खतरे में है” – देश संविधान से ही चल रहा है जिसको सर्वोच्च न्यायलय देख रहां है लेकिन भारत में एक बहुत भारी जनसंख्या अभी भी जीरो IQ वाली है और जब उसको सुनने को आता है की संविधान खतरे में है, आरक्षण खतरे में है, जमीन और जंगल खतरे में है तो बिना सोचे समझे सड़को पर उतने ही संख्या में आकर वास्तव में लोकतंत्र का गला घोट देती है
जनता पर असर
गोबेल्सीय रणनीति का सबसे बड़ा हथियार होता है जनमानस को भ्रमित करना।
- बार-बार झूठ सुनने से आम नागरिकों के मन में शंका पैदा होती है।
- सोशल मीडिया पर हैशटैग युद्ध और फर्जी ट्रेंड इसी योजना का हिस्सा हैं।
- युवा वर्ग, जो आधी जानकारी लेकर राय बना लेता है, सबसे अधिक प्रभावित होता है।
लोकतंत्र के लिए ख़तरा
सत्ता-विपक्ष का संघर्ष लोकतंत्र की आत्मा है। लेकिन जब विपक्ष केवल झूठ और मिथ्या-प्रचार के सहारे राजनीति करने लगे तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा आघात है।
- इससे जनता के मुद्दे दब जाते हैं।
- सरकार के साथ संवाद की बजाय टकराव ही शेष रह जाता है।
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की साख कमजोर होती है।
समाधान क्या है?
- जनता को सजग होना होगा – लोगों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर हर बात सच नहीं होती।
- तथ्यों की जाँच जरूरी है – झूठे नैरेटिव को तोड़ने के लिए तथ्य आधारित बहस होनी चाहिए।
- सकारात्मक विपक्ष – विपक्ष को चाहिए कि वह केवल विरोध न करे बल्कि विकल्प और ठोस समाधान भी पेश करे।
- मीडिया साक्षरता – आम जनता को यह सिखाना होगा कि प्रचार और तथ्य में फर्क कैसे पहचाना जाए।
निष्कर्ष
आज भारत का विपक्ष जिस गोबेल्सीय रणनीति का इस्तेमाल कर रहा है, वह लोकतंत्र को कमजोर करने का काम कर रही है। झूठ के प्रचार से सत्ता नहीं बदलती, बल्कि जनता का विश्वास टूटता है। असली विपक्ष वही होगा जो सरकार की गलतियों को तथ्य के साथ उजागर करे और देशहित में रचनात्मक सुझाव दे। लेकिन फिलहाल विपक्ष केवल नकारात्मकता, झूठ और मिथ्या-प्रचार के सहारे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहा है।
भारत की जनता इतनी परिपक्व है कि वह बार-बार दोहराए गए झूठ को सच नहीं मानती। आने वाले समय में यही जागरूकता हमारे लोकतंत्र को और मजबूत करेगी।
































