खासकर भारतीय समाज में पिता को अपने ही बच्चो से दूर कर दिया है, करने वाले कोई और नहीं महापुरष लोग है, जो खुद पुरुष होकर भी पुरुष की व्यथा नहीं समझते है
“पिता वह है, जो प्रचंड लहरों से लड़ते हुए भी संतान को बचाए रखे!
जो स्वयं भीगता रहे, पर अपने पुत्र पर एक बूँद न गिरने दे!”
ये शब्द केवल कविता नहीं, बल्कि हर उस पिता की अनकही जीवनी हैं, जो जीवनभर अपने परिवार और बच्चों के लिए त्याग और संघर्ष का दूसरा नाम बनकर जीता है। माँ को समाज ने भावनाओं और ममता का प्रतीक माना, जो बिल्कुल उचित है, क्योंकि माँ का स्नेह सबसे प्रकट और सहज रूप से दिखाई देता है। लेकिन पिता का त्याग प्रायः अदृश्य होता है — जैसे कोई छाया, जो दिनभर आपके साथ रहती है लेकिन उस पर ध्यान तभी जाता है जब धूप बहुत तेज़ हो।
पिता का अदृश्य संघर्ष
पिता को अक्सर बच्चे ‘कम बोलने वाला’, ‘सख़्त’ या ‘भावहीन’ मानते हैं। लेकिन वह कम बोलता है, इसलिए नहीं कि उसमें भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि इसलिए कि उसकी भावनाएँ शब्दों में नहीं, कर्तव्यों में ढली होती हैं।
- वह सुबह सबसे पहले उठता है और सबसे बाद में सोता है।
- उसका अपना आराम, उसकी थकान, उसकी इच्छाएँ — सब पीछे रह जाती हैं, सिर्फ इसलिए कि संतान को कभी कमी न हो।
- जब बच्चा माँ की गोद में हँसता है, तब कहीं पिता की कमाई हुई मेहनत से उस गोद में खिलौना, दूध और आराम पहुँचता है।
माँ सबके सामने खड़ी होती है, पिता अक्सर पृष्ठभूमि में छिपा हुआ होता है। यही कारण है कि लोग कहते हैं –
“पिता डूबा हुआ होता है, इसलिए बच्चों को दिखाई नहीं देता;
और माँ पिता के कंधों पर खड़ी होती है, इसलिए बच्चों को वही सबसे ज़्यादा दिखती है।”
वसुदेव का उदाहरण : पिता की मौन तपस्या
भागवत पुराण का वह प्रसंग याद कीजिए जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। उस समय मथुरा में चारों ओर भय का वातावरण था। वसुदेव जी ने नवजात नन्दलाल को सिर पर उठाया और यमुना के प्रचंड जल में उतर पड़े।
- वसुदेव जी की कमर तक जल भर चुका था।
- लहरें गर्ज रही थीं।
- रात अंधकारमयी थी।
परंतु पिता ने न तो भय दिखाया, न शिकायत। उन्होंने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया, पर बालक श्रीकृष्ण को सुरक्षित गोकुल पहुँचा दिया।
यह प्रसंग पिता की उसी अदृश्य छतरी को दर्शाता है।
यदि वसुदेव स्वयं डूब जाते, तो नन्दलाल गोकुल तक कभी न पहुँचते।
पिता डूबा इसलिए कि बच्चा तैरता रहे।
समाज में पिता की छवि : कठोर या रक्षक?
भारतीय समाज में अक्सर पिता को अनुशासन और कठोरता का प्रतीक मान लिया जाता है। “पिता डाँटते हैं, माँ समझाती है” — यह धारणा घर-घर में पाई जाती है। पर गहराई से देखें तो पिता की डाँट भी प्रेम का ही दूसरा रूप है।
- पिता की कठोरता, बच्चे को दुनिया की कठिनाइयों के लिए तैयार करती है।
- वह स्वयं टूटकर भी, बच्चे को कभी टूटने नहीं देता।
- उसकी सख़्ती दरअसल संतान को मज़बूत बनाने का कवच होती है।
पिता का प्रेम नदियों की गहराई जैसा है — जो दिखता कम है, पर अस्तित्व के बिना जीवन असम्भव है।
माँ और पिता का पूरक स्वरूप
माँ का स्नेह और पिता का संघर्ष — दोनों मिलकर ही संतान के लिए जीवन का आधार बनते हैं।
- माँ सामने बैठाकर खाना खिलाती है, पर भोजन की थाली पिता की कमाई से सजती है।
- माँ बच्चे की छोटी-छोटी इच्छाओं को समझ लेती है, पर पिता उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए अपने सुख-दुख बेच देता है।
- माँ कहती है “बेटा रो मत”, पिता सोचता है “बेटा झुको मत, टूटी हिम्मत से मत जीना।”
माँ प्रकट प्रेम है, पिता छिपा हुआ बलिदान। दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं।
आधुनिक समय में पिता की भूमिका
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में पिता का संघर्ष और भी गहरा हो गया है।
- दिनभर ऑफिस में तनाव, महँगाई का दबाव, प्रतिस्पर्धा की दौड़ — सब सहते हुए भी पिता घर लौटकर बच्चों की मुस्कान देखना चाहता है।
- उसे भले ही कोई धन्यवाद न दे, लेकिन उसके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार वही मुस्कान है।
आज बच्चे माँ के दिन (Mother’s Day) पर भव्य समारोह करते हैं, माँ को उपहार देते हैं। पर पिता का दिन अक्सर चुपचाप निकल जाता है। शायद इसलिए कि पिता की आदत ही यही है — चुपचाप जीना और दूसरों के लिए जीना।
जीवन के सरल उदाहरण
- बाज़ार का दृश्य – जब बच्चा खिलौना लेने ज़िद करता है, माँ कहती है “ठीक है, ले लो”, पर पिता मन में सोचता है कि इस महीने खर्चा ज़्यादा हो गया है, फिर भी जेब खाली करके दिल भर देता है।
- शिक्षा का उदाहरण – जब संतान कॉलेज पहुँचती है, माँ आँखों से आँसू पोंछती है, पिता बैंक से कर्ज़ लेकर भी उसकी फीस भर देता है, बिना जताए।
- बीमारी का समय – माँ बिस्तर के पास बैठी रहती है, पर पिता रातभर बाहर अस्पताल के बिल और दवाइयों का इंतज़ाम करता है।
ये सभी दृश्य बताते हैं कि पिता वह वृक्ष है, जिसकी छाया में संतान खेलती है, पर उस छाया का मूल्य अक्सर तब समझ आता है जब वह वृक्ष बूढ़ा या कट चुका होता है।
पिता : भगवान के लिए भी आवश्यक
कहा जाता है —
“पिता का संरक्षण वह अदृश्य छतरी है, जो भगवान को भी चाहिए।”
भगवान श्रीराम को दशरथ जैसे पिता मिले, जिनकी मर्यादा ने उन्हें राजसी बल प्रदान किया।
भगवान श्रीकृष्ण को वसुदेव जैसे पिता मिले, जिनकी गोद और त्याग ने उन्हें सुरक्षित गोकुल पहुँचाया।
यदि ये पिता न होते, तो शायद आज राम और कृष्ण की लीलाएँ भी न होतीं।
पिता का जीवन एक तपस्या है।
वह खुद डूबता है, पर बच्चे को तैरता रखता है।
वह खुद भीगता है, पर बच्चे पर बूँद नहीं गिरने देता।
वह थककर टूटता है, पर बच्चे के लिए अजेय पर्वत बन खड़ा रहता है।
माँ दृश्य शक्ति है, पिता अदृश्य ऊर्जा। माँ दिखाई देती है क्योंकि वह पिता के कंधों पर खड़ी होकर बच्चों तक पहुँचती है। पिता दिखाई नहीं देता क्योंकि वह धरती पर झुका, डूबा और थका हुआ रहता है — पर इसी डूबने और झुकने में संतान की ऊँचाई छिपी होती है।
इसलिए कहा जाता है —
“पिता केवल परिवार का मुखिया नहीं, वह परिवार की आत्मा है।”
जो अपने जीवन का हर सुख त्यागकर, संतान की मुस्कान में परम सुख पाता है।


































