मानव सभ्यता ने चाँद पर कदम रख लिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता से दुनिया बदल रही है, लेकिन क्या हम आज भी उतने ही संवेदनशील हैं जितने हमें होना चाहिए? क्या हमारी सामाजिक संरचना में कहीं संवेदनाओं की जगह कठोरता, असंवेदनशीलता और त्वरित न्याय ने ले ली है? पश्चिम बंगाल के नदिया जिले की घटना ने एक बार फिर इस सवाल को हमारे सामने ला खड़ा किया है।
13 वर्षीय कृष्णेंदु दास, जो सातवीं कक्षा का छात्र था, उस पर एक दुकान से चिप्स का पैकेट चुराने का झूठा आरोप लगाया गया। इस कलंक और अपमान ने उसे इस कदर झकझोर दिया कि उसने आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लिया। अपनी नोटबुक में आख़िरी शब्द थे — “माँ, मैंने कुरकुरे नहीं चुराए…”
समाज की असंवेदनशीलता की एक भयावह मिसाल
यह कोई पहली घटना नहीं है। भारत के कोने-कोने में ऐसी अनगिनत घटनाएं होती हैं, जो सामने नहीं आ पातीं। जिनमें बच्चों को, गरीबों को, या हाशिए पर खड़े लोगों को अपराधी घोषित कर दिया जाता है — बिना किसी प्रमाण, बिना सुनवाई, और बिना सोच-विचार।
अन्य घटनाएं जो चौंकाती हैं:
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उत्तर प्रदेश, 2021 – एक 10 वर्षीय बच्चे पर बिस्किट की चोरी का आरोप लगा और स्थानीय दुकानदार ने उसे बुरी तरह पीटा। बच्चे की मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उसे मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराना पड़ा।
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बिहार, 2022 – एक 12 साल की बच्ची पर चॉकलेट चोरी का आरोप लगा। CCTV में बाद में स्पष्ट हुआ कि चोरी किसी और ने की थी, लेकिन तब तक बच्ची स्कूल जाना छोड़ चुकी थी।
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महाराष्ट्र, 2020 – एक आदिवासी किशोर पर साइकिल की घंटी चुराने का आरोप लगा, ग्रामीणों ने उसे पेड़ से बांध कर पीटा। वीडियो वायरल हुआ लेकिन न्याय नहीं हुआ।
कारण: दोषी कौन?
1. तत्काल न्याय की प्रवृत्ति:
हमारा समाज अब तथ्यों और प्रक्रिया से ज़्यादा ‘भीड़ के न्याय’ में विश्वास करने लगा है। किसी पर शक हुआ नहीं कि हम उसे अपराधी मान बैठते हैं।
2. संवेदनशीलता की कमी:
स्कूल, परिवार और समाज — सभी जगह भावनात्मक शिक्षा का अभाव है। बच्चे यह नहीं सीख पा रहे कि असफलता या अपमान से कैसे निपटा जाए।
3. गरीबी और वर्गभेद:
अक्सर जो बच्चे ऐसे आरोपों का शिकार बनते हैं, वे निम्न आयवर्ग से होते हैं। समाज पहले से ही उन्हें शक की निगाह से देखता है।
4. मीडिया और सोशल मीडिया का प्रभाव:
सोशल मीडिया पर किसी की तस्वीर वायरल हो जाती है, तो बिना पुष्टि के व्यक्ति की छवि धूमिल हो जाती है।
समाधान: हमें क्या करना चाहिए?
1. मानवता आधारित शिक्षा:
स्कूलों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता (emotional intelligence) और संवेदनशीलता की शिक्षा होनी चाहिए। बच्चों को सिखाया जाए कि उनकी ज़िंदगी की कीमत किसी आरोप से ज़्यादा है।
2. कानूनी जागरूकता:
लोगों को यह जानना ज़रूरी है कि कोई भी तब तक दोषी नहीं होता जब तक न्यायालय उसे दोषी न ठहराए। हमें कानून का सम्मान करना सीखना होगा।
3. सामाजिक उत्तरदायित्व:
यदि हम किसी बच्चे या व्यक्ति पर शक करते हैं, तो हमारे कर्तव्य हैं कि हम उस पर सीधे आरोप लगाने की बजाय सही प्रक्रिया अपनाएं। किसी मासूम को शर्मिंदा कर देना, उसे मानसिक यातना देना अपराध है।
4. मीडिया की भूमिका:
मीडिया को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और संयम बरतना चाहिए। हर खबर को सनसनी बनाना ज़रूरी नहीं होता, खासकर तब जब उसमें किसी की ज़िंदगी दांव पर हो।
निष्कर्ष:
कृष्णेंदु का आखिरी वाक्य – “माँ, मैंने कुरकुरे नहीं चुराए…” – सिर्फ एक वाक्य नहीं, यह हमारे समाज के संवेदनहीन होते चेहरे पर करारा तमाचा है। हम किस दिशा में जा रहे हैं? क्या एक चिप्स का पैकेट किसी बच्चे की ज़िंदगी से ज़्यादा कीमती हो गया है?
समय आ गया है कि हम सिर्फ तरक्की की बातें न करें, बल्कि अंदर से भी इंसान बनें। हर बच्चा, हर व्यक्ति न्याय और सम्मान का हकदार है। आइए, संवेदना की मशाल जलाएं, इससे पहले कि और कोई कृष्णेंदु इस अंधेरे में बुझ जाए।
“संवेदनाएं सिर्फ शब्दों में नहीं, कर्मों में झलकनी चाहिए। आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा समाज बनाएं, जहां हर बच्चा निडर होकर कह सके — मैं निर्दोष हूं… और उसकी बात सुनी जाए।”

































