आज भारत में आरक्षण और ऐतिहासिक अन्याय की बहस प्रायः इस तर्क पर टिकी रहती है कि एक वर्ग को आदिकाल से पढ़ने नहीं दिया गया। यह आरोप मुख्यतः धार्मिक ग्रंथों—वेद, पुराण, उपनिषद—से जोड़ा जाता है। परंतु यदि हम ईमानदारी से देखें, तो आज की पीढ़ी के लिए ये ग्रंथ न तो व्यवहारिक शिक्षा का साधन हैं और न ही रोज़गार का आधार। आज कोई भी व्यक्ति, किसी भी वर्ग से हो, चाहे तो इन्हें पढ़ सकता है। फिर भी प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में आज की व्यवस्था शिक्षा को लेकर उतनी ही स्वतंत्र है, जितनी दिखती है?
पढ़ाई से वंचित करना बनाम हुनर विकसित करना
इतिहास को केवल एक कोण से देखना हमेशा अधूरा सत्य देता है। यह सच है कि समाज के कुछ वर्गों को औपचारिक धार्मिक शिक्षा से दूर रखा गया, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि उन्हीं वर्गों में असाधारण कौशल (skills) विकसित हुए। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, बुनकर, किसान, शिल्पकार, वैद्य, संगीतकार—ये सभी समाज की रीढ़ थे। इनका हुनर पीढ़ी-दर-पीढ़ी विकसित हुआ, जिसने समाज को आत्मनिर्भर बनाया।
उस समय का समाज “डिग्री-आधारित” नहीं बल्कि “कौशल-आधारित” था। एक-दूसरे पर निर्भरता थी, जिससे सामाजिक आत्मीयता और संतुलन बना। कोई भी समाज केवल शास्त्र पढ़कर नहीं चलता; उसे चलाने के लिए हाथों का हुनर भी उतना ही आवश्यक होता है।
आज की विडंबना: वही बात, नया पैकेज
हजारों साल बाद आज हम क्या सुन रहे हैं?
RBI के पूर्व गवर्नर हों या बड़े उद्योगपति—लगभग सभी यही कह रहे हैं:
“डिग्री का बोझ मत उठाओ, स्किल सीखो।”
यह बात सुनने में आधुनिक, प्रगतिशील और व्यावहारिक लगती है। लेकिन यहीं से एक बड़ा प्रश्न जन्म लेता है—जब यही बात पहले समाज के ढांचे का हिस्सा थी, तब उसे अन्याय कहा गया, और आज वही बात नीति बनकर आए तो उसे यथार्थवाद क्यों कहा जा रहा है?
स्वतंत्रता या मजबूरी?
आज कहा जाता है कि “स्किल चुनना आपकी choice है।”
पर क्या यह सच में choice है?
जब पढ़ाई के बाद भी नौकरी नहीं मिलती,
जब डिग्री के बावजूद बेरोज़गारी बढ़ती है,
जब सिस्टम खुद आपको बताता है कि आपकी पढ़ाई “market-relevant” नहीं है—
तो फिर सवाल उठता है: क्या आपके पास वास्तव में कोई विकल्प बचता है?
यह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक मजबूरी (systemic compulsion) है।
सिस्टम किसके हाथ में है?
आज शिक्षा व्यवस्था, नौकरियां, उद्योग, कॉर्पोरेट सेक्टर—सब एक सीमित वर्ग के हाथों में केंद्रित हैं। उन्हें डिग्रीधारी “सोचने वाले” लोग नहीं चाहिए, बल्कि स्किल्ड वर्कफोर्स चाहिए—जो सवाल कम करे, काम ज्यादा करे।
यही कारण है कि आज वही बात दोहराई जा रही है—
“हुनर सीखो, नौकरी मिलेगी।”
फर्क बस इतना है कि अब इसे आर्थिक तर्क और market logic के नाम पर पेश किया जा रहा है।
फिर विरोध किससे और क्यों?
यहां सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
जिन वर्गों ने वर्षों तक यह कहा कि “हमें पढ़ने नहीं दिया गया”,
आज जब वही सिस्टम कहता है कि “पढ़ाई जरूरी नहीं, स्किल सीखो”,
तो उस पर वैसा विरोध क्यों नहीं होता?
उत्तर सरल है, लेकिन असहज भी—
क्योंकि आज यह बात उन लोगों द्वारा कही जा रही है
जो रोजगार देते हैं,
जो पैसा नियंत्रित करते हैं,
जो अवसर बांटते हैं।
और जिस हाथ से रोटी मिलती हो,
उस हाथ को गाली देना आसान नहीं होता।
स्वार्थ की पराकाष्ठा
जब दोष ब्राह्मणों पर मढ़ना हो, तो भाषा तीखी हो जाती है,
इतिहास को हथियार बना लिया जाता है।
लेकिन जब वही अवधारणा आधुनिक सत्ता और पूंजी के हाथ में हो,
तो वही लोग चुप हो जाते हैं—
क्योंकि अब सवाल उठाने से रोज़गार छिन सकता है।
यही स्वार्थ की पराकाष्ठा है।
निष्कर्ष: सवाल व्यवस्था का है, जाति का नहीं
यह लेख किसी एक जाति, वर्ग या विचारधारा के पक्ष या विरोध में नहीं है।
यह सवाल व्यवस्था (system) का है।
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क्या शिक्षा केवल नौकरी के लिए है?
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क्या हुनर केवल सस्ते श्रम के लिए?
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और क्या स्वतंत्रता वही है जो सिस्टम परोसे?
जब तक इन प्रश्नों पर ईमानदार चर्चा नहीं होगी,
तब तक इतिहास को कोसना आसान रहेगा
और वर्तमान की सच्चाई से आंख चुराना भी।
समाज आगे तभी बढ़ेगा,
जब शिक्षा और हुनर—दोनों को सम्मान और स्वतंत्रता के साथ अपनाया जाएगा,
न कि मजबूरी और डर के साथ।
































