आज देश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सुधार के नाम पर ऐसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जो विद्यार्थियों को जोड़ने के बजाय उन्हें आपस में बाँटने का काम कर रहे हैं। आरक्षण की व्यवस्था पहले से ही समाज में गहरी बहस और असंतोष का विषय रही है। इसके बावजूद अब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के माध्यम से छात्रों के भविष्य पर एक और प्रयोग थोप दिया गया है। सवाल यह नहीं है कि समानता होनी चाहिए या नहीं, सवाल यह है कि क्या इस तरह के नियम वास्तव में समानता लाएँगे या फिर समाज में पहले से मौजूद जातीय खाइयों को और चौड़ा करेंगे।
देश को आज ऐसे फैसलों की आवश्यकता थी, जो शिक्षा को गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धा और अवसरों की समान उपलब्धता की ओर ले जाएँ। लेकिन जो नियम सामने आए हैं, वे शिक्षा सुधार से अधिक सामाजिक इंजीनियरिंग का प्रयास प्रतीत होते हैं। “प्रमोशन ऑफ इक्वेलिटी इन हायर एजुकेशन रेगुलेशन 2026” के नाम से लागू किया गया यह प्रावधान, पहली नज़र में भले ही समानता और सुरक्षा की बात करता हो, लेकिन इसके भीतर छिपे प्रावधान कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
NEET PG जैसी परीक्षाओं में अत्यंत कम अंकों, यहाँ तक कि माइनस मार्क्स पर प्रवेश के उदाहरण पहले ही सामान्य वर्ग के छात्रों में निराशा और असुरक्षा की भावना पैदा कर चुके हैं। अब नए UGC नियमों के माध्यम से यह संदेश और स्पष्ट हो रहा है कि योग्यता और परिश्रम का महत्व धीरे-धीरे गौण किया जा रहा है। इससे यह आशंका जन्म लेती है कि कहीं शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान और कौशल विकसित करना नहीं, बल्कि जातिगत पहचान के आधार पर वर्गीकरण करना तो नहीं बनता जा रहा।
इस नए कानून के अंतर्गत SC, ST और OBC वर्गों को “पीड़ित” और “संरक्षित” श्रेणी में रखा गया है, जबकि सामान्य वर्ग को एक तरह से “उत्पीड़क” की परिभाषा में समाहित कर दिया गया है। यह वर्गीकरण अपने आप में खतरनाक है, क्योंकि यह व्यक्ति के आचरण को नहीं, बल्कि उसकी जन्मजात पहचान को आधार बनाता है। किसी छात्र का व्यवहार कैसा है, वह कैसा इंसान है, यह सब गौण हो जाता है और केवल उसकी जाति ही उसके अपराध या निर्दोष होने का मापदंड बन जाती है, जबकि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा, जिससे सभी नागरिकों को समान अधिकार और सम्मान मिले।
कानून का एक प्रावधान यह कहता है कि यदि किसी विश्वविद्यालय में किसी SC, ST या OBC छात्र के साथ जाति-सूचक गाली, प्रतिकूल व्यवहार या मानवीय गरिमा के खिलाफ कोई भी आचरण होता है, तो सामान्य वर्ग के छात्र या शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। समस्या यहाँ यह है कि “प्रतिकूल व्यवहार” और “मानवीय गरिमा” जैसे शब्द बेहद व्यापक और अस्पष्ट हैं। इनकी कोई स्पष्ट सीमा तय नहीं की गई है, जिससे इनके दुरुपयोग की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
SC-ST एक्ट से इस नए कानून के तीन बड़े अंतर सामने आते हैं। पहला, जहाँ SC-ST एक्ट में OBC वर्ग को शामिल नहीं किया गया था, वहीं इस नए नियम में OBC को भी जोड़ दिया गया है। दूसरा, इसमें एक विशेष “इक्विटी स्क्वाड” के गठन का प्रावधान है, जो विश्वविद्यालय परिसरों में निगरानी करेगा कि कहीं कथित उत्पीड़न तो नहीं हो रहा। यह व्यवस्था शिक्षा संस्थानों को अध्ययन और शोध का केंद्र बनाने के बजाय एक निगरानी क्षेत्र में बदल सकती है। तीसरा और सबसे गंभीर अंतर यह है कि जहाँ SC-ST एक्ट में अपराध की परिभाषा अपेक्षाकृत सीमित थी, वहीं नए कानून में इसे इतना व्यापक बना दिया गया है कि लगभग हर असहमति या विवाद को अपराध का रूप दिया जा सकता है।
2012 में यूपीए सरकार द्वारा लाए गए एक समान कानून में, गलत शिकायत करने वाले के खिलाफ दंड का प्रावधान था। यह एक संतुलन बनाए रखने का प्रयास था, जिससे कानून का दुरुपयोग रोका जा सके। लेकिन वर्तमान नियमों में न केवल OBC को जोड़ दिया गया है, बल्कि शिकायतकर्ता के खिलाफ दंड का प्रावधान भी हटा दिया गया है। इससे यह कानून एकतरफा बन जाता है और सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए एक स्थायी भय का कारण बन सकता है।
इसका संभावित दुरुपयोग समझना कठिन नहीं है। कल्पना कीजिए कि कोई सामान्य वर्ग का मेधावी छात्र है, जो पढ़ाई में अच्छा है। उसके खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज कर दी जाए, ताकि उसे मानसिक रूप से परेशान किया जा सके या उसकी पढ़ाई बाधित हो जाए। मान लीजिए उसने किसी कारणवश अपने नोट्स साझा करने से मना कर दिया—इस साधारण बात को भी “प्रतिकूल व्यवहार” का रूप दिया जा सकता है। किसी फिल्म, विचारधारा या सामाजिक मुद्दे पर बहस हो गई और किसी को बुरा लग गया, तो विवाद को जातीय रंग देकर शिकायत दर्ज की जा सकती है।
यह खतरा केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। यदि कोई प्रोफेसर किसी छात्र को उसके प्रदर्शन के आधार पर कम अंक देता है, तो उस पर भी इस कानून के तहत आरोप लगने की संभावना बन जाती है। इससे शिक्षक निष्पक्ष मूल्यांकन करने से डरेंगे और शिक्षा की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ेगा।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि भय का यह वातावरण सामान्य वर्ग के छात्रों को अपनी बात रखने, असहमति जताने या अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने से रोक सकता है। अगर कोई उनके साथ दुर्व्यवहार करे, अपमानजनक नारे लगाए या सार्वजनिक रूप से अपमानित करे, तब भी वे चुप रहने को मजबूर हो सकते हैं, क्योंकि उन्हें कानून के दुरुपयोग का डर रहेगा।
यह पूरा विषय केवल एक कानून या नियम तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आने वाली पीढ़ियों के मानसिक और सामाजिक विकास से जुड़ा हुआ है। शिक्षा का उद्देश्य समाज को जोड़ना, समान अवसर देना और सोचने-समझने की क्षमता विकसित करना होना चाहिए। लेकिन यदि नियम ही छात्रों को जन्म से वर्गीकृत कर देंगे, तो यह समाज को और अधिक विभाजित करेगा।
इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसे कानूनों पर गंभीर, निष्पक्ष और व्यापक चर्चा हो। संतुलन, पारदर्शिता और दुरुपयोग रोकने के प्रावधानों के बिना कोई भी कानून न्याय नहीं, बल्कि भय और विभाजन पैदा करता है। यदि समय रहते इस पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो इसके परिणाम न केवल शिक्षा व्यवस्था के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए विनाशकारी हो सकते हैं।
































