“3 इडियट्स” फिल्म का वह प्रसिद्ध दृश्य हमें आज भी याद है, जब रैंचो चतुर रामलिंगम के टीचर्स डे पर देने वाले भाषण में कुछ शब्द बदल देता है और पूरा सभागार ही नहीं फिल्म का हाल भी ठहाकों से गूंज उठता है। वह दृश्य केवल मनोरंजन मात्र नहीं था, बल्कि एक गहरी सीख भी देता था – कि रटने से ज्यादा जरूरी है समझना, सोचने की आज़ादी और रचनात्मकता।
पर यदि आज के समय में, विशेषकर यूजीसी की हालिया गाइडलाइन्स और कैंपस अनुशासन के सख्त नियमों के संदर्भ में देखें, तो सवाल उठता है – क्या रैंचो आज ऐसा कर पाता? या फिर उसे अनुशासनहीनता, मानसिक उत्पीड़न या किसी अन्य आरोप में जेल जाना पड़ता? सोच कर तो देखिये
यह प्रश्न केवल एक फिल्मी कल्पना नहीं है, बल्कि हमारे वर्तमान शैक्षिक और कानूनी ढांचे पर गंभीर टिप्पणी है।
शिक्षा का उद्देश्य: डर या विकास?
शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल डिग्री दिलाना नहीं था, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना होता है – सोचने की क्षमता, प्रश्न पूछने का साहस, तर्क, सहिष्णुता और रचनात्मकता का विकास।
यदि हम ऐसा वातावरण बना दें जहाँ छात्र हर शब्द बोलने से पहले डरें कि कहीं यह किसी कानून या शिकायत का विषय न बन जाए, तो क्या हम सही मायनों में शिक्षा दे रहे हैं या सिर्फ आज्ञाकारी नागरिक तैयार कर रहे हैं?
कानून का उद्देश्य समाज में न्याय और सुरक्षा स्थापित करना होता है, लेकिन जब वही कानून भय का कारण बन जाए, तो उसकी आत्मा पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
कानून: सुरक्षा के लिए या हथियार के रूप में?
भारत में कई ऐसे कानून हैं जो ऐतिहासिक अन्याय और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाए गए थे बिना किसी वैज्ञानिक सोच के बस वोट बैंक सांधने के लिए – जैसे एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम। इन कानूनों का उद्देश्य हमे बताया गया था की अत्यंत पवित्र और आवश्यक है, क्योंकि समाज के कुछ वर्गों ने लंबे समय तक भयंकर भेदभाव और हिंसा झेली है लेकिन ये नहीं बताया जिन्होंने झेली है वो 5000 से वही दिमाग और आत्मा लिए घुमरहे है बस शरीर बदल रहे है, क्युकी वो इतने बड़े वैज्ञानिक है जो सतत अपना शरीर बदलने की कला जानते है और अपनी आत्मा और दिमाग को वही बनाये रखते है और ये कानून ऐसे वैज्ञानिको को संरक्षण देने के लिए बनाया जा रहा है ।
लेकिन किसी भी कानून की तरह, यदि उसका दुरुपयोग होने लगे या उसकी व्याख्या इतनी व्यापक हो जाए कि सामान्य संवाद, बहस, मज़ाक या वैचारिक असहमति भी अपराध की श्रेणी में आ जाए, तो वह कानून न्याय का साधन न रहकर भय और उगाही का उपकरण बन सकता है।
समस्या कानून के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके प्रयोग के तरीके में है और प्रयोग करने वालो की द्वेष और घृणा युक्त नियत से है ।
क्या छात्र एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं?
आज कई परिसरों में यह देखा जा रहा है कि सवर्ण वर्ग का छात्र sc st obc के छात्रों से खुलकर बोलने से या पास बैठने से भी कतराते हैं।
कारण यह नहीं कि वे असंवेदनशील हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें डर है कि कहीं उनकी बात को तोड़-मरोड़कर किसी शिकायत या मुकदमे का आधार न बना लिया जाए, और उनको प्रतियोगिता से बहार करने का इससे अच्छा सुलभ और आसान तरीका कोई और है ही नहीं और ऊपर से उनका जीवन बर्बाद करने वाला निर्दोष और निरीह भी बन जाता है, मान लो 5 साल बाद निर्दोष साबित हो भी गया तो भी उसका स्वर्णिम समय तो नष्ट हो गया, उस सामान्य वर्ग के बच्चे के सपने, भविष्य, माता पिता की आकांछाये सब खत्म क्युकी एक द्वेष युक्त और घृणित सोच के व्यक्ति को ये बर्दास्त नहीं हुआ की ये हमसे बात नहीं करता है, और अभी तो इसमें सबसे ज्यादा टारगेट लड़किया बनेगी क्युकी ये हथियार उनको डराने के लिए बहुत बढ़िया काम करेगा ।
इससे धीरे-धीरे समाज में एक ऐसी खाई बनती है जहाँ लोग केवल अपने “समूह” तक सीमित रहना सुरक्षित समझते हैं।
यह स्थिति लोकतंत्र और सामाजिक एकता के लिए घातक है, क्योंकि लोकतंत्र संवाद से चलता है, डर से नहीं।
क्या जाति आधारित सोच को हम और मजबूत कर रहे हैं?
यह भी सच नहीं है कि समाज में जाति आधारित असमानता और भेदभाव ऐतिहासिक सच्चाई रही है, जिसे नकारा जा सकता क्युकी भारत में जातीय नहीं थे वर्ण थे, और जातिया कर्म के आधार पर नामकृत कर दी गयी जो आज भी है और उसी तरह की दूरिया भी है, जैसे जज वकीलों के साथ लंच डिनर नहीं करता वो जजों के साथ ही करता है, उसके शादी संबंध जजों में ही होंगे या बहुत बड़े वकील के साथ होंगे, तो ये असमानता और भेदभाव नहीं, अपना वर्ग है, फौजी और पोलिस तो एक जैसे यूनिफार्म में है फिर भी दोनों को मिलने वाला सम्मान अलग अलग क्यों है ? क्या ये असमानता नहीं है ? हम इसको देखना नहीं चाहते लेकिन असमानता भेदभाव वर्तमान में बहुत गहराई तक है ।
लेकिन यदि हर समस्या, हर असफलता और हर संघर्ष का कारण केवल “दूसरी जाति” को बताया जाने लगे, तो इससे समाधान नहीं, बल्कि नफरत का स्थायी ढांचा खड़ा होता है।
बच्चों को बचपन से यह सिखाया जाना चाहिए कि
“तुम्हारे अधिकार तुम्हारी योग्यता और मानवता से आते हैं, न कि केवल पहचान से।”
और उनको सिखाया गया की तुम्हारे अधिकार सवर्णो ने छीन लिए है और यही तुम्हारे सबसे बड़े दुश्मन है, यही एक कारन है की उनके मन में सवर्णो के प्रति घृणा और द्वेष का एक पहाड़ बन जाता है और वो अपने ऐतिहासिक अन्याय का बदला लेने का समय और कारन खोजते रहते है और जैसे ही कही कुछ मौका मिलता है चूकते नहीं है, ये तथ्य है मजाक नहीं कर रहा हूँ
इसीलिए जब जाति पहचान को ही सब कुछ बना दिया जाता है, तो व्यक्ति की प्रतिभा, परिश्रम और सोच पीछे छूट जाती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
यह भी उतना ही जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई अपमान, घृणा या भेदभाव न फैलाए।
लेकिन सम्मान और भय में फर्क है।
सम्मान संवाद से आता है,
डर कानून से आता है।
एक स्वस्थ समाज वह होता है जहाँ लोग कानून के डर से नहीं, बल्कि समझ और संवेदनशीलता से एक-दूसरे का सम्मान करें।
समाधान क्या है?
समस्या का समाधान न तो कानून हटाने में है, न ही उन्हें और कठोर बनाने में।
समाधान है:
- कानून के संतुलित प्रयोग में – ताकि असली पीड़ित को न्याय मिले और झूठे मामलों पर रोक लगे
- शिक्षा में नैतिकता और संवेदनशीलता को शामिल करने में
- छात्रों को संवाद और बहस की संस्कृति सिखाने में
- शिकायत से पहले समाधान की प्रक्रिया (mediation) को प्राथमिकता देने में
- कैंपस में विश्वास का वातावरण बनाने में, भय का नहीं
लोकतंत्र और संविधान का वास्तविक सम्मान
लोकतंत्र का अर्थ केवल वोट देना नहीं होता, बल्कि यह भी होता है कि
हर नागरिक बिना डर के अपनी बात कह सके,
दूसरे की बात सुन सके,
और असहमति को दुश्मनी न बनाए।
संविधान हमें अधिकार देता है,
लेकिन विवेक हमें बताता है कि उनका उपयोग कैसे करना है।
यदि हम विवेक छोड़ केवल अधिकार और पहचान पर टिक जाएँ, तो लोकतंत्र केवल कागजों में रह जाएगा।
निष्कर्ष
“3 इडियट्स” का रैंचो हमें यह सिखाता है कि शिक्षा का उद्देश्य नौकरी नहीं, बल्कि जीवन जीने की समझ देना है।
यदि हम ऐसे कानून और व्यवस्थाएँ बना दें जो छात्रों को सोचने से पहले डरने पर मजबूर कर दें, तो हम राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित नहीं, बल्कि सीमित कर रहे हैं।
हमें ऐसे भारत की जरूरत है जहाँ
न्याय हो,
संवेदनशीलता हो,
लेकिन डर नहीं।
क्योंकि
डर से बना समाज चुप रहता है,
और चुप समाज कभी प्रगति नहीं करता।
वास्तव में जबतक जातिप्रमाण पत्र संविधान से ऊपर है, मन मानने को तैयार नहीं होता है की हम एक स्वतंत्र लोकतान्त्रिक देश के नागरिक है जिसको आर्टिकल 14 15 16 19 और 21 के सभी मौलिक अधिकार मिले हुए है

































