भारतीय संविधान को दुनिया के सबसे विस्तृत और प्रगतिशील संविधानों में गिना जाता है। इसकी प्रस्तावना (Preamble) भारत को एक सम्प्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करती है और अपने सभी नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व देने का वचन देती है।
भाग–III में दिए गए मौलिक अधिकार इसी वचन की कानूनी अभिव्यक्ति हैं।
लेकिन आज एक बड़ा सवाल खड़ा होता है —
अगर भारत में सच में संविधान का शासन होता, तो क्या मौलिक अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त नहीं होते?
1️⃣ कानून के समक्ष समानता: कागज़ पर या ज़मीन पर?
संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है:
“राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या विधि के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।”
इसका सीधा अर्थ है कि कानून सभी के लिए एक-सा होना चाहिए —
चाहे व्यक्ति ब्राह्मण हो, कायस्थ हो, ठाकुर हो, दलित हो या आदिवासी।
लेकिन आज की हकीकत यह है कि:
- अगर कोई व्यक्ति SC/ST समुदाय के व्यक्ति के साथ अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करे,
तो उस पर SC/ST Act लग जाता है। - लेकिन वही अपमानजनक शब्द कोई sc st का व्यक्ति अगर किसी ब्राह्मण, कायस्थ या ठाकुर के लिए प्रयोग हों, तो वैसा कठोर कानून लागू नहीं होता।
सवाल यह है:
क्या अपमान अपमान नहीं रहता, सिर्फ इसलिए कि पीड़ित की जाति बदल गई?
अगर कानून के समक्ष समानता सच में लागू होती,
तो जातिसूचक गाली देने वाले हर नागरिक पर
एक-सा कानून लागू होता — बिना जाति देखे।
2️⃣ भेदभाव का निषेध: फिर ये भेदभाव किस आधार पर?
अनुच्छेद 15 कहता है:
राज्य धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव नहीं करेगा।
और अनुच्छेद 15 (1) में और ज्यादा गहराई से लिखा है की राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश (race), जाति, लिंग, जन्म-स्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा, मूल वंश शायद इसीलिए लिखा था की कल को कोई कहेगा की ये तो जमींदारों के खानदान से है जो बहुत अत्याचारी था तो इसको सरकारी सहायता नहीं मिलनी चाहिए, क्युकी इसका मूल वंश अत्यचारिओ का था.
लेकिन व्यवहार में क्या होता है?
- छात्रवृत्ति (Scholarship)
- फीस माफी (Fee Waiver)
- हॉस्टल सीट
- सरकारी योजनाएँ
इन सबमें जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग नियम हैं।
आज की स्थिति यह है कि:
- SC, ST, OBC और मुस्लिम वर्ग को विशेष लाभ मिलते हैं
- लेकिन ब्राह्मण, कायस्थ, ठाकुर या सामान्य वर्ग का गरीब छात्र उन्हीं आर्थिक परिस्थितियों में होने के बावजूद
उन लाभों से वंचित रह जाता है।
यह प्रश्न उठता है:
अगर भेदभाव का निषेध है, तो सरकार जाति और धर्म देखकर योजनाएँ क्यों बना रही है?
अगर संविधान का अनुच्छेद 15 पूरी तरह लागू होता, तो हर गरीब छात्र — चाहे किसी भी जाति या धर्म का हो —
बराबर का हकदार होता।
3️⃣ सरकारी नौकरियों में समान अवसर: या जाति-आधारित अवसर?
अनुच्छेद 16 कहता है:
सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर मिलेगा।
लेकिन आज:
- सामान्य वर्ग के लिए आयु सीमा कम
- कट-ऑफ अंक ज़्यादा
- प्रयासों की संख्या सीमित
जबकि:
- आरक्षित वर्ग के लिए आयु सीमा अधिक
- कट-ऑफ अंक कम
- प्रयासों की संख्या ज़्यादा
यहाँ सवाल योग्यता का नहीं, सिद्धांत का है।
अगर अवसर समान हैं,
तो आयु और अंक अलग-अलग क्यों?
अगर संविधान का शासन होता, तो सभी उम्मीदवारों के लिए:
- एक-सी आयु सीमा
- एक-सा कट-ऑफ
- एक-से प्रयास होते।
4️⃣ छुआछूत का अंत: कानून बनाम व्यक्तिगत स्वतंत्रता
अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है। यह सामाजिक दृष्टि से एक ऐतिहासिक कदम था।
लेकिन आज यह विषय एक नए प्रश्न को जन्म देता है:
क्या किसी व्यक्ति को यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं होनी चाहिए कि वह किसे छुए और किसे नहीं?
अगर कोई कहे:
“मैं नहीं चाहता कि तुम मुझे छुओ।”
तो क्या यह छुआछूत है?
यह एक व्यक्तिगत सीमा (personal boundary) है।
मैं कोई पारस नहीं हूँ
और तुम लोहा नहीं हो
कि छूने से सोना बन जाओगे।
छुआछूत का अर्थ सामाजिक बहिष्कार और अमानवीय व्यवहार था। लेकिन आज इस कानून का प्रयोग
कई बार व्यक्तिगत झगड़ों और बदले के लिए भी होने लगा है।
5️⃣ प्रस्तावना का वादा: समानता और बंधुत्व
प्रस्तावना कहती है कि भारत सभी नागरिकों को देगा:
- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय
- स्थिति और अवसर की समानता
- बंधुत्व — जिससे व्यक्ति की गरिमा बनी रहे
लेकिन आज समाज में:
- जाति पहले आती है
- व्यक्ति बाद में
- अधिकार जाति देखकर मिलते हैं
- न्याय वर्ग देखकर तय होता है
तो फिर बंधुत्व कहाँ है?
6️⃣ असली सवाल: संविधान है या पहचान-पत्र?
आज भारत में कई बार ऐसा लगता है कि:
संविधान से ज़्यादा ताकत जाति प्रमाण-पत्र में है।
कानून आपके लिए कैसे काम करेगा, यह इस पर निर्भर करता है कि आप किस वर्ग में पैदा हुए।
यह स्थिति संविधान की आत्मा के खिलाफ है।
✍️ निष्कर्ष
भारतीय संविधान का ढांचा महान है। मौलिक अधिकारों की भावना अत्यंत उदार और न्यायपूर्ण है।
लेकिन समस्या संविधान में नहीं, उसके चयनात्मक (selective) प्रयोग में है।
अगर भारत में सच में संविधान का शासन होता,
तो:
- कानून सभी के लिए एक-सा होता
- योजनाएँ गरीबी के आधार पर मिलतीं, जाति के आधार पर नहीं
- नौकरियों में अवसर सच में समान होते
- अपमान हर नागरिक के लिए समान अपराध होता
तभी कहा जा सकता था कि:
भारत में सच में “Rule of Constitution” है,
ना कि “Rule of Caste.” आज तोसंविधान से ज़्यादा ताकत जाति प्रमाण-पत्र में है।































