कानपुर में हाल ही में जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) जितेंद्र प्रताप सिंह और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) डॉ. हरिदत्त नेमी के बीच का विवाद सुर्खियों में रहा है। यह मामला न केवल प्रशासनिक टकराव का उदाहरण है, बल्कि इसमें जातिगत आरोपों ने इसे और जटिल बना दिया है। इस लेख में हम इस प्रकरण की पृष्ठभूमि, दोनों पक्षों के दावों, और इसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभावों पर प्रकाश डालेंगे, साथ ही यह भी विश्लेषण करेंगे कि कैसे जातिगत पहचान और महत्वाकांक्षा इस तरह के विवादों को प्रभावित करती है।
कानपुर डीएम-सीएमओ विवाद: पृष्ठभूमि
कानपुर में डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह और सीएमओ डॉ. हरिदत्त नेमी के बीच पिछले पांच महीनों से तनाव चल रहा था। यह विवाद तब और गहरा गया जब 14 जून, 2025 को डीएम ने सीएमओ को एक बैठक से बाहर निकाल दिया। इसके बाद एक कथित ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें सीएमओ ने डीएम के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का उपयोग किया था। डीएम ने इसके जवाब में स्वास्थ्य सचिव को पत्र लिखकर सीएमओ के तबादले की सिफारिश की, जिसमें प्रशासनिक अनियमितताओं और अनुपस्थिति का हवाला दिया गया।
19 जून, 2025 को उत्तर प्रदेश सरकार ने डॉ. हरिदत्त नेमी को निलंबित कर दिया और उनकी जगह श्रावस्ती के डॉ. उदयनाथ को कानपुर का नया सीएमओ नियुक्त किया। स्वास्थ्य सचिव रितु माहेश्वरी ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया, और डॉ. नेमी के खिलाफ विभागीय जाँच के आदेश भी दिए गए।
सीएमओ के आरोप: जातिगत उत्पीड़न का दावा
निलंबन के बाद डॉ. हरिदत्त नेमी ने डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि वह अनुसूचित जाति (SC) से हैं और डीएम ने उनकी जाति के आधार पर उन्हें उत्पीड़ित किया। डॉ. नेमी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर कहा कि डीएम ने उनके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का उपयोग किया, उनसे रिश्वत मांगी, और एक सीबीआई द्वारा चार्जशीटेड कंपनी को काम देने का दबाव डाला। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि डीएम ने एक बैठक में उनके सिर पर पीछे से धक्का दिया और उन्हें अपमानित किया।
डॉ. नेमी का कहना है कि उनके साथ अन्याय हुआ है और उनकी जातिगत पृष्ठभूमि के कारण उनकी शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि डीएम ने उनसे “सिस्टम में शामिल होने” और पैसे देने की मांग की, अन्यथा परेशानी झेलने की धमकी दी।
डीएम का पक्ष: प्रशासनिक सुधार और जवाबदेही
दूसरी ओर, डीएम जितेंद्र प्रताप सिंह को उनके काम के लिए सराहना मिली है। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने कानपुर में स्वास्थ्य सेवाओं, विशेष रूप से कांशीराम अस्पताल, में सुधार के लिए कड़े कदम उठाए। डीएम ने सीएमओ पर अनियमितताओं और ड्यूटी में लापरवाही का आरोप लगाया था। उनकी सिफारिश पर ही सरकार ने सीएमओ को निलंबित किया।
सोशल मीडिया और स्थानीय नेताओं के बीच डीएम के प्रयासों को प्रशंसा मिली है, विशेष रूप से उनकी सक्रियता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए। उदाहरण के लिए, एक पोस्ट में यह उल्लेख किया गया कि डीएम ने सीएमओ कार्यालय का औचक निरीक्षण किया और वहाँ अनुपस्थिति पाई, जिसके बाद उन्होंने कार्रवाई की मांग की।
जातिगत कोण और सामाजिक ध्रुवीकरण
यह विवाद केवल प्रशासनिक टकराव तक सीमित नहीं रहा; इसमें जातिगत और राजनीतिक रंग भी शामिल हो गया। डॉ. नेमी के अनुसूचित जाति से होने के दावे और डीएम पर जातिसूचक टिप्पणियों के आरोप ने इसे सामाजिक रूप से संवेदनशील बना दिया। समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस मामले को “ठाकुर राज” से जोड़कर सरकार पर निशाना साधा, यह दावा करते हुए कि यह मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के बीच सत्ता संघर्ष का परिणाम है।
सपा नेता अखिलेश यादव ने इस विवाद को प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बताया, जबकि सपा विधायक मोहम्मद हसन रूमी ने डीएम के स्वास्थ्य सुधार प्रयासों का समर्थन किया। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी दो धड़े दिखे। सात भाजपा विधायकों में से पांच ने डीएम का समर्थन किया, जबकि दो, विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना और विधायक सुरेंद्र मैथानी सहित, ने सीएमओ के पक्ष में पत्र लिखा।
सामाजिक और प्रशासनिक चुनौतियाँ
यह प्रकरण कई महत्वपूर्ण सवाल उठाता है, जो हमारे मूल लेख के विषय से भी जुड़ते हैं:
1. जातिगत पूर्वाग्रह और प्रशासनिक निष्पक्षता: अगर डॉ. नेमी का दावा सही है कि उनकी जाति के कारण उनके साथ भेदभाव हुआ, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। एक प्रशासनिक अधिकारी, चाहे वह किसी भी जाति का हो, को निष्पक्षता के साथ काम करना चाहिए। अगर डीएम ने जातिसूचक टिप्पणियाँ कीं, तो यह उनके पद की गरिमा के खिलाफ है। लेकिन अगर यह आरोप केवल “विक्टिम कार्ड” के रूप में इस्तेमाल किया गया, जैसा कि मूल लेख में उल्लेख किया गया, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही को कमजोर करता है।
2. महत्वाकांक्षा और शक्ति का खेल: यह विवाद महत्वाकांक्षा और प्रशासनिक शक्ति के दुरुपयोग का भी उदाहरण है। डीएम और सीएमओ, दोनों उच्च पदों पर हैं, और दोनों ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप लगाए। यह दिखाता है कि कैसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और शक्ति की दौड़ प्रशासनिक प्रक्रियाओं को प्रभावित कर सकती है।
3. न्याय की चुनौती: डॉ. नेमी ने दावा किया कि उनके आरोपों की जाँच नहीं हुई, जबकि डीएम के आरोपों पर तुरंत कार्रवाई की गई। यह सवाल उठता है कि क्या दोनों पक्षों के साथ समान व्यवहार किया गया? अगर एक पक्ष की शिकायतों को अनसुना किया गया, तो यह अन्याय का प्रतीक है, जैसा कि मूल लेख में चर्चा की गई थी।
समाज और प्रशासन के लिए सबक
कानपुर का यह प्रकरण दर्शाता है कि जातिगत पहचान और प्रशासनिक टकराव कैसे एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मूल लेख में उल्लिखित समस्या—जाति के आधार पर शोषित या अत्याचारी मानने की प्रवृत्ति—यहाँ भी स्पष्ट है। अगर डीएम ने वास्तव में जातिगत टिप्पणियाँ कीं, तो यह गंभीर अपराध है। लेकिन अगर सीएमओ ने अपनी जाति का उपयोग करके सहानुभूति बटोरने की कोशिश की, तो यह भी उतना ही गलत है।
इस मामले में निष्पक्ष जाँच की आवश्यकता है। दोनों पक्षों के आरोपों की गहन पड़ताल होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो कि न्याय केवल शक्तिशाली के पक्ष में न हो। साथ ही, यह प्रकरण इस बात की भी याद दिलाता है कि प्रशासनिक अधिकारियों को अपनी महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को जनहित से ऊपर नहीं रखना चाहिए।
निष्कर्ष
कानपुर डीएम-सीएमओ विवाद एक प्रशासनिक टकराव से शुरू होकर जातिगत और राजनीतिक रंग ले चुका है। यह भारतीय समाज की उन गहरी समस्याओं को उजागर करता है, जहाँ जाति, महत्वाकांक्षा और शक्ति का खेल एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। इस मामले का समाधान तभी संभव है, जब दोनों पक्षों की शिकायतों की निष्पक्ष जाँच हो और प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। जैसा कि मूल लेख में कहा गया, किसी भी नागरिक को उसकी जाति के आधार पर कमजोर या बलवान नहीं माना जाना चाहिए। केवल यही दृष्टिकोण समाज में समरसता और न्याय को बढ़ावा दे सकता है।

































