प्रतापगढ़, (Where is Pratapgarh) उत्तर प्रदेश में एक कक्षा 9 की छात्रा की आत्महत्या की घटना, जो 800 रुपये की बकाया फीस के कारण कथित तौर पर अपमानित होने के बाद हुई, समाजिक ढांचे और कानूनी प्रणाली पर गंभीर सवाल उठाती है। एक व्यक्ति (जिसे यादव कहा गया) का दावा कि “पहले ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया और आज जब शिक्षा यादवो के हाथ में आई तो हालत ऐसी कर दी कि छात्र आत्महत्या करने लगे,” इस में वर्तमान की जाति-आधारित भेदभाव की ऐतिहासिक कहानी झलकती है और इसके लिए न ब्राह्मण और न ही मनुस्मृति दोषी है ।
मनुस्मृति, एक पारंपरिक विधि ग्रंथ है जिसे वास्तव में वर्तमान के संविधान की तरह किसी भी राजा ने लागु नहीं किया, वल्कि एक दार्शनिक का विचार है जो कर्म आधारित सामाजिक पदानुक्रम को निर्धारित किया, जिसमें निचली जातियों, खासकर उन लोगों के लिए शिक्षा पर प्रतिबंध था, जिन्हें निम्न माना जाता था उसके तात्कालिक कुछ पूर्ण वैज्ञानिक कारन जरूर रहे होंगे । आज शिक्षा यादव के हाथ में है और वो वर्तमान शैक्षिक दुरुपयोग और अपमान सत्ता के उलट गतिशीलता का परिणाम है, जहां पहले शिक्षा से वंचित लोग अब इसी तरह के अन्याय कर रहे हैं की उसी वर्ग के आने वाले लोग आत्महत्या कर रहे है ।
हालांकि, इस घटना को किसी भी तरह से मनुस्मृति के प्रभाव से जोड़ना उचित नहीं है जो स्कूल प्रशासन के कार्यों को जाति-आधारित प्रेरणा या प्राचीन सिद्धांतों से जोड़ते हों। मनुस्मृति आज के आधुनिक भारत में कोई कानूनी ढांचा नहीं है; इसे 1950 में अपनाए गए भारतीय संविधान ने प्रतिस्थापित कर दिया है, जो समानता, शिक्षा को मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) और भेदभाव पर रोक (अनुच्छेद 15) की गारंटी देता है। संविधान यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षा सभी के लिए सुलभ हो, चाहे उनकी जाति या आर्थिक स्थिति कुछ भी हो, और संस्थानों पर इन सिद्धांतों का पालन करने की जिम्मेदारी डालता है।
यह घटना मनुस्मृति के दोष से ज्यादा संवैधानिक मूल्यों के कार्यान्वयन में विफलता को दर्शाती है। स्कूल द्वारा एक मामूली 800 रुपये की बकाया फीस के कारण छात्रा को अपमानित करना, जिसके परिणामस्वरूप उसकी आत्महत्या हुई, प्रशासनिक संवेदनशीलता और संभवतः शोषण की ओर इशारा करता है, न कि संविधान में किसी प्रणालीगत खामी की। संविधान में सुधार के लिए तंत्र उपलब्ध हैं—जैसे शिक्षा का अधिकार अधिनियम (2009) और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए निःशुल्क शिक्षा के प्रावधान—लेकिन इनका पालन या उचित रूप से लागू नहीं किया गया प्रतीत होता है। पुलिस द्वारा स्कूल प्रशासन के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित धाराओं में कार्रवाई और जांच शुरू करना संवैधानिक संरक्षणों के अनुरूप है।
इसलिए, हालांकि यादव जो कभी कहते थे वंचित किया गया था आज एक मामूली सी फीस के लिए किसी को ऐसे और इतना अपमानित कर दे की आत्महत्या कर ले, लेकिन चुकी इसमें ब्राह्मण इन्वॉल्व नहीं है तो मीडिया इस घटना का मूल कारण संस्थागत शासन और संवेदना की कमी बताएगी, अगर ब्राह्मण किसी भी तरह लपेटे तो आ जाता तो फटाक से मनुस्मृति के दोष देते मनुवादी मानसिकता को दोष देते लेकिन अब संविधान को दोष देने की हिम्मत तो है नहीं, पर वासतव में यह मौजूदा कानूनों के बेहतर प्रवर्तन और छात्रों के अधिकारों के प्रति जागरूकता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
समाचार रिपोर्ट: प्रतापगढ़ में कक्षा 9 की छात्रा की फीस विवाद में आत्महत्या से आक्रोश
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश का जिला | 07 अप्रैल 2025, रात 10:58 बजे IST
प्रतापगढ़ जिले में एक हृदयविदारक घटना में, 17 वर्षीय कक्षा 9 की छात्रा रिया प्रजापति ने कथित तौर पर 800 रुपये की बकाया फीस के कारण परीक्षा में बैठने से वंचित होने के बाद अपने घर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने समुदाय में हलचल मचा दी है और स्कूल प्रशासन पर अपमान के आरोप लगे हैं, जिसके बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।
रिया की मां पूनम देवी की शिकायत के अनुसार, यह त्रासदी शनिवार को तब शुरू हुई जब रिया, जो कमला शरण यादव इंटर कॉलेज की छात्रा थी, को वार्षिक परीक्षा में प्रवेश से रोक दिया गया। पूनम ने आरोप लगाया कि स्कूल प्रबंधक संतोष कुमार यादव, प्रिंसिपल राजकुमार यादव, स्टाफ सदस्य दीपक सरोज, चपरासी धनिराम और एक अज्ञात शिक्षक ने सार्वजनिक रूप से उनकी बेटी का अपमान किया क्योंकि उसने बकाया 800 रुपये की फीस जमा नहीं की थी। परिवार ने पहले ही 1,500 रुपये जमा किए थे, लेकिन शेष राशि ने रिया को निराशा की ओर धकेल दिया। मां खेत में काम करने गई थीं, उसी दौरान रिया ने अपने जीवन का अंत कर लिया।
इस घटना से आक्रोश फैल गया है, जिसमें एक स्थानीय व्यक्ति यादव ने वर्तमान शैक्षिक प्रणाली को दोषी ठहराया। यादव कभी कहा करते थे की, “पहले ब्राह्मणों ने हमें पढ़ने नहीं दिया” और आज जब शिक्षा यादवो के हाथ में आई तो शिक्षा की हालत ऐसी कर दी कि छात्र आत्महत्या करने लगे। किसी ब्राह्मण ने किसी को इतना प्रताड़ित नहीं किया कि वह आत्महत्या कर ले, लेकिन आज की स्थिति देखो। आज यह बयान इसिलए याद आया की ऐतिहासिक शिकायत को दर्शाता है, जो वर्तमान शिक्षा संस्थानों पर सत्ता के दुरुपयोग से दृस्टि को हटाने के लिए सदीओ से की जाती है ।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित धाराओं के तहत स्कूल प्राधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है और जांच शुरू कर दी है। अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (पूर्व) दुर्गेश कुमार सिंह ने पुष्टि की कि लड़की को अपने प्रवेश पत्र से वंचित करने के बाद घर भेज दिया गया था, जो संस्थागत संवेदनशीलता में संभावित चूक को दर्शाता है।
समुदाय और कार्यकर्ता स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, जिसमें फीस संग्रह प्रथाओं और वंचित छात्रों के लिए समर्थन प्रणालियों की समीक्षा की अपील शामिल है। यह दुखद घटना शिक्षा के अधिकार और भारत के शैक्षिक संस्थानों में छात्रों के भावनात्मक कल्याण के बारे में गंभीर सवाल उठाती है।


































