आज भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन क्या सभी नागरिक इस यात्रा में समान रूप से भागीदार हैं?
एक ओर तकनीकी क्रांति, स्टार्टअप, नौकरियाँ और आत्मनिर्भर भारत का नारा है, तो दूसरी ओर ऐसा वर्ग भी है जो केवल मुफ्त राशन, सब्सिडी, आवास और आरक्षण की बुनियाद पर केवल अधिकार चाहता है, कर्तव्य नहीं निभाना चाहता।
आज के आंकड़े बताते हैं कि भारत की लगभग 68–70% आबादी मुफ्त राशन ले रही है। सवाल उठता है — क्या ये सभी मेहनत नहीं कर सकते? क्या इनमें पढ़ाई करने की, नौकरी करने की, या उद्यम शुरू करने की क्षमता नहीं?
आंकड़ों की सच्चाई:
- 81.35 करोड़ लोग यानी भारत की लगभग 57% आबादी आज भी मुफ्त राशन योजना (PMGKAY) के तहत जी रही है।
- NFSA की दृष्टि से 66% जनता इस योजना की पात्र मानी गई है।
- इसके अलावा करोड़ों लोग मुफ्त आवास, मुफ्त बिजली, मुफ्त गैस कनेक्शन, मुफ्त चिकित्सा सुविधा, सब्सिडी और छात्रवृत्ति ले रहे हैं — लेकिन इनमें से बड़ी संख्या आज भी बेरोजगार, अकुशल और परजीवी मानसिकता से ग्रसित है।
मेहनती वर्ग vs मुफ्तखोर वर्ग: एक तुलना
एक वर्ग है जो सुबह उठकर काम पर जाता है, पढ़ाई करता है, टैक्स भरता है, और सरकार को इतना राजस्व देता है कि देश का विकास हो और साथ ही दूसरे वर्ग की थाली में भी खाना पहुँच जाए।
दूसरी ओर एक ऐसा वर्ग है जिसे पढ़ाई की सुविधा भी मुफ्त मिली, राशन भी मुफ्त मिला, इलाज भी मुफ्त, आवास भी, लेकिन मेहनत के नाम पर शून्य।
“शादी करना, बच्चे पैदा करना, फिर उनके लिए मुफ्त स्कूल, राशन, फिर वंशानुगत आरक्षण – यही जीवन का प्रारूप बन गया है।”
सवाल उठता है:
क्या ये वर्ग सच में असहाय है?
या फिर उसने मुफ्त में जीने का, दूसरों की कमाई पर पलने का “systematic ढांचा” बना लिया है?
- क्या सरकार कभी सर्वे करती है कि ये लोग पढ़ाई क्यों नहीं कर रहे?
- क्यों कोई RTI यह नहीं पूछती कि मुफ्त राशन लेने वालों में कितने लोग 10वीं पास भी नहीं हैं?
- क्यों इनसे कभी यह नहीं पूछा जाता कि कितने घंटे ये लोग देश को देने का काम करते हैं?
आदिकाल से चला आ रहा श्रम और परजीविता का संघर्ष
आइए चलते हैं आदिकाल की ओर, जहाँ समाज में हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ करने को था:
- कोई खेती करता था,
- कोई पशुपालन,
- कोई युद्धाभ्यास,
- कोई ज्ञान-विज्ञान व नीति में लगा रहता था।
लेकिन हर युग में एक वर्ग ऐसा रहा होगा —
जो न खेती करता, न युद्ध, न शिल्प, न सेवा… बस
“शादी, बच्चे, और खाना मिल जाए तो मस्त जीवन”।
जब मुफ्त मिलना बंद हुआ, तो मज़बूरी में उसे भी काम करना पड़ा —
लेकिन ज्ञान न होने के कारण, केवल बोझ ढोना और सेवा ही बचा।
ये सोच एक पीढ़ी की नहीं, पीढ़ियों की देन है
आज भी वही स्थिति है —
जब एक वर्ग तकनीकी ज्ञान, AI, डिजिटल मार्केटिंग, इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ रहा है,
वहीं दूसरा वर्ग आज भी “सरकारी नौकरी में आरक्षण चाहिए”, “मुफ्त राशन दो”, “हमें भी बराबरी का हिस्सा दो” जैसे नारे ही बुलंद कर रहा है।
लेकिन बराबरी सिर्फ हक़ से नहीं, मेहनत से मिलती है।
और जब मेहनत नहीं, तब केवल अनुदान, सब्सिडी और दया ही शेष बचती है।
विचार करने योग्य प्रश्न:
- क्या सरकार टैक्स देने वालों से ज़्यादा टैक्स लेने वालों को खुश रखने में जुटी है?
- क्या मुफ्त योजनाओं की आदत ने लोगों को आत्मनिर्भर बनने से रोक दिया है?
- क्या “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” का सिद्धांत योग्यता को मारता है?
एक वर्ग टैक्स देता है, कर्तव्य निभाता है, और दूसरा वर्ग उस टैक्स पर जीकर खुद को पीड़ित बताता है।
इस नीतिगत सोच का प्रभाव:
- मेहनत करने वाले रोज़ हतोत्साहित होते हैं,
क्योंकि आरक्षण और मुफ्त योजनाओं की मार उनपर ही पड़ती है। - शिक्षा की गुणवत्ता गिरी है,
क्योंकि कोई यह पूछने को तैयार नहीं कि छात्र पढ़ाई क्यों नहीं कर रहा — उसे तो अगली क्लास में प्रमोट किया जाएगा।
भारत के विकास का मार्ग तब ही प्रशस्त होगा जब:
- मुफ्त योजनाओं की पात्रता पर पुनः समीक्षा हो।
- काम न करने वालों को सिर्फ सुविधा नहीं, उत्तरदायित्व भी मिले।
- शिक्षा और श्रम को प्राथमिकता मिले, आरक्षण और सब्सिडी को नहीं।
“अधिकार मांगने से पहले कर्तव्य निभाओ — यही सही ‘समानता’ है।”
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