मनुस्मृति कभी भी किसी राजा ने उस तरह से अपनी राज्य व्यवस्था चलने देने के लिए लागु नहि की थी जैसे IPC लागु हुयी थे स्वतंत्र भारत में और इसके पहले भी, फिर भी आज कुछ वर्ग विशेष के लोग इसको जलाते है, जबकि अगर इनलोगो का उद्देस्य गलत कानून न नियमो के विरुद्ध होता तो.
| S. No | IPC धारा | अपराध | BNS में स्थिति |
|---|---|---|---|
| 1 | 124A | Sedition (देशद्रोह) | इस नाम से नहीं है, इसकी जगह State ke khilaf activities से संबंधित नई धारा बनाई गई |
| 2 | 153B | National integration के खिलाफ बयान | अलग संरचना में शामिल |
| 3 | 166A / 166B | Public servant द्वारा कानून का उल्लंघन | अलग sections में समाहित |
| 4 | 236 – 263A | Coinage offences (नकली सिक्के) | काफी धाराएँ हटाई/merge |
| 5 | 272 – 276 | Food adulteration | ये अपराध अब Food Safety Act में चले गए |
| 6 | 309 | Attempt to suicide | IPC में अपराध था, अब practically criminal offence नहीं माना जाता |
| 7 | 377 | Unnatural offences | Supreme Court judgement के बाद practically हटाया गया |
| 8 | 489A – 489E | Fake currency offences | BNS में restructure किया गया |
| 9 | 493 – 498 | Marriage related offences | कई धाराएँ merge/modify |
| 10 | 497 | Adultery | पहले ही Supreme Court ने unconstitutional घोषित कर दिया था |
JNU जिसमे देश द्रोह के ऐसे नारे लगे थे भारत तेरे टुकड़े होंगे को BNS लागु होने के बाद IPC की प्रतिया जलानी चाहिए थी क्युकी 124A और 153B दोनों ही BNS में हट गयी है जो सीधे तौर पर Sedition (देशद्रोह) और National integration के खिलाफ बयान के अंतरगत दंडनीय अपराध थे।
इसके बाद बात करते है उन लोगो की जिनको LGBTQ वालो को भी IPC की प्रतिया जलानी चाहिए थी क्युकी उनको भी धारा 377 के अंतर्गत दोषी माना जाता था और दण्डित किया जाता था, यानि इनको भी IPC के काले कानून से मुक्ति मिली तो मुक्ति दिवस के उपलक्ष्य में प्रतीकत्मक रूप से ही IPC की प्रतिया जलानी चाहिए थी लेकिन नहीं जलाते है, लेकिन यही लोग मनुस्मृति की प्रतिया जलाते है जो कभी IPC की तरह पुरे देश में लागु नहीं हुयी थी।
साथ ही IPC की धारा 497 को यानि व्यभिचार को भी BNS में कोई स्थान नहीं दिया, यानि कभी अपराध माना जाने वाला कृत्य अब अपराध नहीं माना जाता है तो यहाँ ऐसे जागरूक और तर्कशील लोगो को, स्वतंत्र कम स्वछंद ज्यादा, मेरा शरीर मेरी मर्जी की बात करने वालो को भी IPC की प्रतिया जलानी चाहिए थी लेकिन ये भी नहीं जलाते है।
ऐसा क्यों ? एक ऐसा कानून जो कभी किसी काम को स्पस्ट रूप से अपराध मानता था, और जिसमे दंड भी मिलता था, जो पुरे देश में लागु भी था, और कई लोगो को दंड भी मिला, फिर भी लोगो में वो जोश वो जज्बा नहीं है की पुराने कानून जो अत्याचार और दुर्भावना से भरे हुए थे उनके खत्म होने पर प्रतीकत्मक रूप से ही सही एकबार तो जलाते।
ये सारा गुस्सा और द्वेष सर मनुस्मृति पर ही क्यों उतरता है, क्यों इनका रक्त मनुस्मृति पर ही उबाल मारता है जबकि वो तो न जाने कितने समय से लोगो ने पढ़ी भी नहीं, और साथ ही उसको कभी IPC की तरह लागु भी नहीं किया गया।
कारन है मनुस्मृति को जलाने का, समाज में फुटन डालना, दैनिक दिनचर्या को मनुस्मृति और धर्म से जोड़कर बताया गया, एक वर्ग को बरगलाया गया की तुम्हारे साथ दूरिया इसीलिए है क्युकी एक वर्ग अपने धर्म और मनुस्मृति को मानता है, जबकि वास्तव में वो वर्ग अपने दैनिक जीवन में अपने मानवीय हिसाब है, और नकारत्मक बातो और लोगो को उपेक्षित करके आगे बढ़ रहा जो देश द्रोही लोग को बर्दास्त नहीं है, क्युकी इसी वर्ग ने हमेशा देश के लिए वलिदान दिया, राष्ट्र, सभ्यता, और संस्कृति की रक्षा की तो ये वर्ग देश द्रोहिओ को चुभता है।
इस वर्ग से आमने सामने का मुकाबला कर पाना संभव नहीं है तो जैसे मुघलो और अंग्रेजो ने समाज से कुछ कमजोर दिमाग, गिरे हुए आत्मविस्वास वाले लालची और कम देशप्रेमी लोगो को चुन कर उनको लालच देकर घुसपैठ की और देश रक्षक वर्ग को अंदर से कमजोर किया जिसका परिणाम दो बार गुलामी रहा है, नहीं तो जिस देश से विश्व विजेता सिकंदर जैसा योद्धा अपनी पूरी सेना के साथ हार कर गया हो वहा सिर्फ कुछ सेनिको के साथ आया बाबर कैसे राज करने लगा ?
कारन था ये भितरघाती लोग, जिनको कुछ लालची लोगो ने बरगला दिया और कमजोर दिमाग, गिरे हुए आत्मविस्वास वाले लालची और कम देशप्रेमी लोगो ने पैसे और अपनी काम वासना पूर्ति के चक्कर देशद्रोह और भितरघात किया और परिणाम सबके सामने है
विरोध का कारण
विरोध का कारण कानून नहीं वल्कि बीमार मानसिकता है, क्युकी अगर मै पुछू IPC की प्रतिया जलानी चाहिए तो कहेगे अब तो BNS अब IPC से क्या लेना देना, लेकिन ये उदारवाद और तर्कपूर्ण बात उस मनुस्मृति के लिए इनके दिमाग में नहीं आएगी जो न कभी IPC की तरह पुरे देश में लागु थी, न कभी इतिहास में ऐसे प्रमाण है की किसी ने मनुस्मृति को साक्षी मानकर किसी को दण्डित किया हो, और न ही ये जलाने लोग ये कहते है की जब IPC और संविधान आ गया था तो मनुस्मृति को क्यों जलाये ? ये बीमार मानसिकता की एक वर्ग भारतीय मूल्यों का सम्मान करता है तो उसको कैसे चोट पहुचाये, जैसा भी है ग्रन्थ तो भारतीय है, वो एक राजा की अपनी न्याय व्यवस्था थी उसके विचार, और ये भी नहीं है की मनुस्मृति में कुछ अच्चा नहीं है, उसमे मर्यादा और स्वतंत्र रहने की पद्द्ति है, बस स्वछंदता नहीं है और परिवार कैसे सुरक्षित रहे जो समाज की इकाई है




















