भारत में आरक्षण की बहस अक्सर भावनाओं और आरोपों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन यदि हम तथ्यों और वर्तमान व्यवस्था को देखें तो साफ़ हो जाता है कि सरकार ने “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के सिद्धांत की ओर ही कदम बढ़ाया है।
भारत की सामाजिक संरचना: एक संक्षिप्त चित्र
वर्तमान अनुमानों और जनगणना आँकड़ों के अनुसार भारत की सामाजिक संरचना कुछ इस प्रकार है:
- अनुसूचित जाति (SC): लगभग 16.6%
- अनुसूचित जनजाति (ST): लगभग 8.6%
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): लगभग 41%
- सवर्ण/सामान्य वर्ग (General): लगभग 30–35%
अब यदि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था को देखें तो:
वर्तमान आरक्षण व्यवस्था
| वर्ग | आरक्षण प्रतिशत |
|---|---|
| SC | 15% |
| ST | 7.5% |
| OBC | 27% |
| EWS (सवर्णों के लिए) | 10% |
| कुल आरक्षण | 59.5% |
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि:
- SC, ST और OBC को मिलाकर लगभग 49.5% आरक्षण
- सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को 10% आरक्षण
- यानी अब सवर्ण समाज के गरीब वर्ग को भी पहली बार संवैधानिक आरक्षण मिला है।
सुप्रीम कोर्ट और शेष सीटें
सुप्रीम कोर्ट कई बार यह स्पष्ट कर चुका है कि:
आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होनी चाहिए,
हालांकि EWS के लिए दी गई 10% छूट को विशेष परिस्थिति में वैध माना गया।
इसका अर्थ यह है कि:
जो शेष 40–50% सीटें बचती हैं,
वे सभी वर्गों के लिए खुली प्रतियोगिता में उपलब्ध रहती हैं —
चाहे वह SC हो, ST हो, OBC हो या General।
यानी यह कहना कि “एक वर्ग सब कुछ ले जा रहा है”,
तथ्यों के स्तर पर टिकता नहीं है।
“ओवर रिप्रेज़ेंटेशन” का भ्रम
अब यदि कोई कहता है कि
“फलाँ वर्ग का ओवर रिप्रेज़ेंटेशन है”,
तो उसे यह भी बताना होगा कि:
- SC-ST-OBC की कुल आबादी लगभग 66% से अधिक है
- जबकि उन्हें आरक्षण मिलता है केवल 49.5%
- यानी वे आज भी अपनी जनसंख्या के अनुपात से कम प्रतिनिधित्व में हैं।
वहीं General वर्ग की आबादी लगभग 30–35% है और:
- उन्हें खुली सीटों में बराबरी का अवसर
- साथ ही EWS के अंतर्गत 10% आरक्षण
मिल रहा है।
ऐसे में “ओवर रिप्रेज़ेंटेशन” का आरोप तथ्यों से नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह से प्रेरित लगता है।
निष्कर्ष
आज की आरक्षण व्यवस्था को यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि:
- सरकार ने सामाजिक न्याय और जनसंख्या अनुपात के बीच संतुलन साधने की कोशिश की है
- SC-ST-OBC और सवर्ण — सभी को व्यवस्था में स्थान मिला है
- और शेष सीटें सभी के लिए समान अवसर के रूप में खुली हैं
इसलिए अब यह कहना कि
“आरक्षण से किसी एक वर्ग को अनुचित लाभ मिल रहा है”
एक भ्रमित और तथ्यहीन तर्क बनकर रह जाता है।
अब समय आ गया है कि हम आरक्षण को राजनीति नहीं, सामाजिक संतुलन के रूप में समझें।


































