बहुत पहले अगर पत्नी व्यभिचार के मामले में पकड़ी जाती थी तो ये कानूनन तलाक लिए एक वैध कारन हो सकता था, फिर महिलावदीओ ने इसको सवतंत्रता और समानता के अधिकार के विरुद्ध बताया की इस हिसाब से तो स्त्री पति की संपत्ति मानी जा रही है, लेकिन तलाक के बाद जो भरण पोषण की जिम्मेदारी पति के ऊपर डाल दी गयी है उस जिम्मेदारी का क्या आधार है? क्या वो जिम्मेदारी कही न कही स्त्री को विवाह के बाद भी पति की ही संपत्ति है ऐसा सन्देश नहीं दे रही है, और क्या इससे हम समाज में पितृसत्तामत्क समाज को और ज्यादा मजबूत बना रहे है क्युकी वो पुरुष ही है जो अपनी शादीशुदा पत्नी के साथ साथ तलाकशुदा पत्नी का भी भरण पोषण करने की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार है।
लेकिन हाल ही में कर्णाटक के बेंगलुरु के सॉफ़्टवेयर इंजीनियर अतुल सुभाष के आत्महत्या केस ने देश में तलाक और दहेज कानूनों के दुरुपयोग संबंधी बहस को फिर से जीवंत कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में, दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को दी जाने वाली स्थायी अलिमनी (मदद) की राशि तय करने के लिए आठ प्रमुख मानदंड (factors) निर्धारित किए, जिन्हें अब सभी उच्च न्यायालयों द्वारा पालन करने की सलाह दी गई है(The Federal)।
कोर्ट की बेंच—न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और प्रसन्ना वी. वराले—ने कहा कि ये मानदंड एक “straight‑jacket formula” नहीं, बल्कि निर्णय के लिए रिमोट गाइडलाइन हैं(Hindustan Times)।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 8 प्रमुख मानदंड
- पति और पत्नी की सामाजिक व आर्थिक स्थिति
- भविष्य में पत्नी और dependent बच्चों की आवश्यक आवश्यकताएँ
- दोनों पक्षों की शैक्षणिक योग्यता और रोजगार स्थिति
- स्वतंत्र आय या संपत्ति—यदि पत्नी या पति स्वयं कमाती हो
- पत्नी की जीवनशैली, विशेषकर उसकी श्वसुराल में दर्ज जीवन स्तर
- क्या पत्नी ने परिवार की देखभाल के लिए रोज़गार छोड़ा?
- गैर-रोज़गार पत्नी के लिए कानूनी लड़ाई के खर्च का उचित आँकना
- पति की कुल आर्थिक क्षमता, आय, दायित्व, maintenance obligations —साथ ही बच्चे की देखभाल सहित खर्चवग़ैरह की स्थिति(The Federal, Jagranjosh.com, delhidivorcelawyers.com, Moneycontrol)।
क्या ये नियम सख्त हैं?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- इन मानदंडों का उद्देश्य है कि पति को दंडित ना किया जाए, लेकिन पत्नी को सम्मानजनक जीवन स्तर सुनिश्चित किया जाए।
- ये निर्देश मात्र हैं, जिन्हें हर केस की परिस्थितियों के अनुसार लचीले तौर पर लागू किया जाना चाहिए(The Federal, www.ndtv.com)।
प्रसंग में लागू उदाहरण
- इसी निर्णय में, कोर्ट ने प्रवीन कुमार जैन बनाम अंजू जैन नामक मामले में पति को ₹5 करोड़ की एकमुश्त अलिमनी देने का आदेश दिया, और उनके बेटे के लिए ₹1 करोड़ की रख-रखाव राशि भी तय की गई, क्योंकि उनका विवाह टूट चुका था और मामला केवल अलिमनी पर केंद्रित था(NewsBytes)।
कानूनी ठोस बिंदु – विशेषज्ञ व्याख्या
- न्यायशास्त्रियों ने कहा कि यह आदेश Rajnesh vs Neha (2021) जैसे मामलों का पीछा करता है, जहाँ अलिमनी राशि तय करते समय जीवनशैली, वित्तीय जरूरतों और बच्चों का भरण‑पोषण प्रमुख रूप से ध्यान में लिया गया था(Business Standard)।
- बीबीसीडी मामले में एक हाई-स्तरीय टिप्पणी में यह कहा गया कि यदि पत्नी योग्य है और आर्थिक रूप से समर्थ, तो अलिमनी पर पूरी निर्भरता अनुचिțieत हो सकती है—जैसा हालिया मामले में कोर्ट ने टिप्पणी की कि “qualified women should earn for themselves”(Business Standard)।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि पत्नी को दी जाने वाली स्थायी अलिमनी की राशि सिर्फ पति की वित्तीय स्थिति पर निर्भर नहीं होती, बल्कि कई मानदंडों के संयोजन से तय होती है। यह निर्णय यह भी स्मरण कराता है कि कानूनी प्रक्रिया एक संतुलित दृष्टिकोण पर आधारित होनी चाहिए—जहाँ पति को अनुचित बोझ से बचाया जाए, और पत्नी को उसका हक़ मिले।



















