भारत का संविधान दुनिया के सबसे विस्तृत और मजबूत लोकतांत्रिक दस्तावेजों में से एक है। इसके निर्माण में अनेक विद्वानों, राजनेताओं और अधिकारियों का योगदान रहा है। लेकिन इतिहास ने केवल कुछ नामों को ऊँचाई दी, और कुछ नामों को या तो दबा दिया गया या पूरी तरह भुला दिया गया।
आज हम बात कर रहे हैं एक ऐसे व्यक्ति की जिसे संविधान का असली निर्माता कहा जाना चाहिए था — लेकिन उसे “क्लर्क” या “सलाहकार” जैसी भूमिकाओं तक सीमित कर दिया गया। ये थे: श्री बी. एन. राव (Benegal Narsing Rau)।
जरा सोचिए…
🔹 एक व्यक्ति जिसने भारत और म्यांमार (बर्मा) — दोनों देशों के संविधान का प्रारूप तैयार किया।
🔹 जो आज से 115 साल पहले ICS (Indian Civil Services) में चयनित हुआ।
🔹 जो अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) का न्यायाधीश रहा।
🔹 जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का अध्यक्ष रहा।
🔹 जिसने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षा ली, और गणित, भौतिकी, संस्कृत व अंग्रेज़ी में डिग्रियाँ प्राप्त कीं।
क्या ऐसा महान व्यक्तित्व सिर्फ “संवैधानिक सलाहकार” या “क्लर्क” कहलाने लायक है?
बी. एन. राव कौन थे?
बी. एन. राव का जन्म 26 फरवरी 1887 को एक विद्वान ब्राह्मण परिवार में हुआ। उन्होंने अपनी पढ़ाई मद्रास और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से की।
राव ने गणित, भौतिकी, संस्कृत और अंग्रेज़ी जैसे विषयों में दक्षता प्राप्त की। वे वर्ष 1910 में Indian Civil Services (ICS) में चयनित हुए — उस ज़माने में जब भारतीयों का ICS में आना लगभग असंभव माना जाता था।
उनका जीवन ज्ञान, सेवा और न्याय का आदर्श बन गया। वे इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (International Court of Justice) में न्यायाधीश रहे, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के अध्यक्ष पद तक पहुँचे — जो किसी भी भारतीय के लिए गर्व का विषय होना चाहिए।
संविधान निर्माण में बी. एन. राव की भूमिका
जब भारत स्वतंत्र होने की ओर बढ़ रहा था, तब 1946 में संविधान सभा का गठन हुआ। उस समय संविधान बनाने के लिए एक मसौदे की आवश्यकता थी, जो भारत जैसे विशाल, विविधता-पूर्ण देश के लिए उपयुक्त हो।
इस ज़िम्मेदारी के लिए चुना गया — बी. एन. राव को।
उनकी ज़िम्मेदारी थी:
- विभिन्न देशों के संविधान का गहन अध्ययन करना,
- भारतीय समाज, परंपराओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक प्रारूप (Draft Constitution) बनाना,
- संविधान सभा को वैधानिक, विधिक और तकनीकी सलाह देना।
बी. एन. राव ने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, आयरलैंड आदि देशों के संविधानों का विश्लेषण किया और भारतीय संदर्भ में एक व्यवहारिक और मजबूत मसौदा तैयार किया।
👉 यही मसौदा बाद में भारतीय संविधान का मूल आधार बना।
डॉ. अंबेडकर की भूमिका क्या थी?
बी. एन. राव द्वारा तैयार किए गए प्रारूप के आधार पर ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन हुआ, जिसकी अध्यक्षता डॉ. भीमराव अंबेडकर को सौंपी गई।
डॉ. अंबेडकर ने उस मसौदे को आगे संविधान सभा में प्रस्तुत किया, उस पर बहस की, और कई स्थानों पर संशोधन भी किए। उनका योगदान महत्वपूर्ण था, लेकिन वे मसौदे के निर्माता नहीं थे — बल्कि उसके प्रस्तुतकर्ता और संवाहक थे।
👉 खुद डॉ. अंबेडकर ने स्वीकार किया था:
“इस संविधान का वास्तविक श्रेय मुझे नहीं, श्री बी. एन. राव को जाता है।”
यह बयान ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है — लेकिन इसे कभी न इतिहास की किताबों में पढ़ाया गया, न सार्वजनिक रूप से बताया गया।
फिर बी. एन. राव को भुला क्यों दिया गया?
यह सवाल जितना सीधा है, जवाब उतना ही कड़वा।
1. वोटबैंक राजनीति का दौर शुरू हो चुका था
स्वतंत्र भारत की राजनीति में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के नाम पर प्रतीक गढ़े गए।
डॉ. अंबेडकर एक दलित नेता के रूप में उभरे, और उन्हें एक राजनीतिक-आइकन बना दिया गया — जो दलित समाज की आकांक्षाओं का प्रतीक थे।
वहीं बी. एन. राव न राजनीति में थे, न जनसंपर्क में। वे एक विद्वान थे, एक कर्मयोगी।
2. ब्राह्मण होने का ‘अपराध’
स्वतंत्र भारत में ब्राह्मणों को “विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग” कह कर हाशिये पर डालना शुरू हुआ।
बी. एन. राव ब्राह्मण थे — और इसलिए न उन्हें नायक बनने दिया गया, न उनके योगदान को प्रमुखता दी गई।
3. शांत स्वभाव, कोई प्रचार नहीं
बी. एन. राव न किसी पार्टी से जुड़े थे, न उन्होंने अपने नाम का प्रचार किया।
उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि “मैं संविधान का निर्माता हूँ।”
उन्होंने जो किया, उसे अपने राष्ट्रधर्म के रूप में किया।
उनका परिवार: एक उदाहरण
बी. एन. राव का परिवार भी सेवा और विद्वता की मिसाल था।
- उनके भाई बी.एस. राव, भारत के सांसद रहे।
- एक और भाई बी.आर. राव, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के गवर्नर बने।
लेकिन न इस परिवार ने नारे लगाए, न अपने नाम से राजनीति की, न ही पुरस्कारों की दौड़ में शामिल हुए।
असली नींव के पत्थरों को कब सम्मान मिलेगा?
हमने वर्षों तक प्रतीकों की पूजा की है।
अब समय है कि जिन्होंने वास्तव में राष्ट्र की नींव रखी, उन्हें सम्मान दिया जाए।
बी. एन. राव भारत के संविधान के मूल वास्तुकार (Principal Architect) थे।
- उन्होंने मसौदा तैयार किया,
- वैधानिक सलाह दी,
- संविधान की बुनियाद रखी —
फिर क्यों उन्हें “भुला दिया गया”?
अब समय है इतिहास को सही करने का
इतिहास को पुनर्लिखने की ज़रूरत नहीं होती —
बस सच को धूल से निकालना पड़ता है।
✅ अब ज़रूरत है:
- बी. एन. राव जी को इतिहास की किताबों में उनका स्थान देने की।
- उनके नाम पर शोध संस्थान, संग्रहालय, या संविधान भवन का नाम रखने की।
- बच्चों को यह सिखाने की कि संविधान सिर्फ भाषणों से नहीं, विचारों से बना था।
भारत जैसे प्राचीन और बुद्धिमान देश के लिए संविधान का मसौदा तैयार करना सिर्फ एक प्रशासनिक कार्य नहीं था, वह एक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक प्रक्रिया थी — और बी. एन. राव उसके यथार्थ और असली शिल्पी थे।
अब समय है कि हम सिर्फ नारे नहीं, ज्ञान और कर्म के प्रतीकों को पूजें।
अब समय है कि हम श्री बी. एन. राव जी को वह सम्मान दें, जो उन्हें दशकों पहले मिलना चाहिए था।
बी. एन. राव — भारत के संविधान के असली निर्माता।



















