जब हल जोतने के लिए बैल नहीं मिले, तब खुद को ही बैल बना लिया…:
यह वाक्य न केवल भावुक करता है, बल्कि हमें झकझोर कर सोचने पर मजबूर कर देता है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं।
महाराष्ट्र के लातूर ज़िले के हाडोलती गांव से सामने आई ये तस्वीर, जहां एक बुज़ुर्ग किसान दंपती खुद को हल में जोतकर खेत जोत रहे हैं — इस देश की खेती-किसानी की जमीनी सच्चाई का वो आईना है जिसे देखकर आंखें नम हो जाती हैं लेकिन दिमाग कई जरूरी सवालों से भर जाता है।
यह कहानी सिर्फ संवेदना की नहीं, समझ की भी है
75 वर्षीय अंबादास पवार और उनकी पत्नी मुक्ताबाई पवार बीते दो सालों से बिना बैल, बिना मजदूर और बिना ट्रैक्टर के सिर्फ अपने दम पर खेत जोत रहे हैं। वजह?
- आर्थिक तंगी
- बारिश से फसल बर्बाद
- और फिर कर्ज का बोझ
इस दृश्य को देखकर देश भर में सहानुभूति की लहर दौड़ गई।
लेकिन यह सिर्फ भावनाओं की कहानी नहीं है।
इस तस्वीर के पीछे एक कठोर आर्थिक वास्तविकता है जिसे समझना भी उतना ही ज़रूरी है जितना भावुक होना।
सवाल: ऐसी कौन-सी खेती के लिए कर्ज लिया जाता है, जिसे किसान चुका नहीं पाते?
आज देश के करोड़ों किसान खेती के लिए कर्ज लेते हैं — बीज, खाद, ट्रैक्टर का किराया, सिंचाई, मजदूरी जैसे खर्चों के लिए।
सरकार की तरफ से उन्हें प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत हर साल ₹6,000 रुपये भी दिए जाते हैं, लेकिन सवाल यह है कि अगर आपके पास इतनी ज़मीन है कि उसमें खेती करने के लिए ट्रैक्टर और मजदूर चाहिए, तो आपके पास इस काम के लिए एक मूलभूत बजट भी होना चाहिए।
फिर आखिर ऐसा क्या होता है कि हर साल लाखों किसान कर्ज़ में डूबते जाते हैं?
कर्ज़: मदद या आदत?
भारत में खेती के नाम पर फसल ऋण लेने की एक आदत-सी बन गई है।
बहुत से किसान बिना यह सोचे कि वो इसे चुकाएंगे कैसे, बैंक या साहूकार से कर्ज लेते हैं।
कई बार ये कर्ज:
- खेती से ज्यादा, घरेलू खर्चों या सामाजिक कार्यक्रमों में चला जाता है,
- तो कभी खेती की असफलता के बाद ब्याज पर ब्याज चढ़ता चला जाता है।
और जब ये बोझ असहनीय हो जाता है, तो आखिरी विकल्प आत्महत्या या ऐसा आत्म-बलिदान बन जाता है जो परिवार के लिए और समाज के लिए और भी ज्यादा दुखदायी साबित होता है।
सरकार से कर्ज़ माफी की अपील — लेकिन कब तक?
अंबादास पवार का कहना है कि “हमारी बस इतनी विनती है कि किसानों का कर्ज माफ किया जाए, ताकि हम चैन से जी सकें।”
यह भावनात्मक अपील है — और वाजिब भी — लेकिन हमेशा कर्ज माफी ही समाधान नहीं हो सकती।
क्योंकि कर्ज माफी टैक्सपेयर के पैसे से होती है।
आपका और हमारा पैसा — जो स्कूल, अस्पताल, सड़क, सुरक्षा जैसे कामों में लगना चाहिए — वो किसी की अस्थायी राहत में चला जाता है।
कर्ज माफ करते रहना लंबी बीमारी का तात्कालिक इलाज है, स्थायी समाधान नहीं।
क्या अन्नदाता का सम्मान घट रहा है?
“जय जवान, जय किसान” — इस नारे में जितना गौरव है, आज की स्थिति में उतनी ही विडंबना है।
जब एक किसान खुद को बैल बना लेता है तो वह देश का ध्यान खींचता है, लेकिन क्या यह सम्मानजनक स्थिति है?
क्या यह वह अन्नदाता है जिसे हम “धरती का भगवान” कहते हैं?
जब कोई किसान बिना सोच-समझे कर्ज लेता है, चुका नहीं पाता और फिर समाज से कर्जमाफी की मांग करता है, तो यह पूरे किसानों के समुदाय की छवि को प्रभावित करता है।
किसानों को सिर्फ दया का पात्र नहीं बल्कि आत्मनिर्भर और सक्षम नागरिक बनना होगा — तभी उनका सम्मान स्थायी रहेगा।
रास्ता क्या है?
1. वित्तीय साक्षरता
किसानों को यह सिखाना होगा कि कर्ज कब लेना है, कितना लेना है और कैसे चुकाना है।
बैंकों को भी सिर्फ कर्ज बांटने के बजाय किसानों की पुनर्भुगतान योजना को मजबूत करना चाहिए।
2. फसल बीमा का दायरा और पारदर्शिता
कई बार बारिश या कीट के कारण फसल बर्बाद होती है। बीमा योजना तो है, लेकिन उसका फायदा बहुत कम किसानों को मिल पाता है।
3. तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण
सरकार और NGO के सहयोग से किसानों को कम लागत में बेहतर उत्पादन के उपाय सिखाए जा सकते हैं।
4. सहकारी खेती और यंत्रीकरण
छोटे किसानों को आपस में मिलकर संयुक्त खेती, किराये पर ट्रैक्टर सुविधा, और बीज-खाद बैंक जैसी प्रणाली अपनानी चाहिए।
निष्कर्ष: भावनाओं से परे, विवेक से निर्णय जरूरी
अंबादास पवार और उनकी पत्नी ने अपनी मेहनत से देश का ध्यान खींचा — लेकिन यह प्रेरणा बन जाए, न कि मजबूरी का प्रतिरूप।
किसानों को अब यह समझना होगा कि आत्मसम्मान, कर्जमाफी से नहीं, आत्मनिर्भरता से आता है।
हर कर्ज, हर माफी और हर अफसोस से पहले यह सवाल पूछिए:
“क्या मैं इस ऋण को चुका पाऊंगा?”
क्योंकि जब कोई किसान अपनी जान देता है या खुद को बैल बना लेता है — तब सिर्फ वो नहीं हारता, हम सब हारते हैं।




















