“न उम्र की सीमा हो, न जन्म का हो बंधन…”
शायद जगजीत सिंह की इस मशहूर ग़ज़ल को आज का समाज कुछ ज्यादा ही व्यक्तिवादी अर्थों में लेने लगा है। मन की स्वतंत्रता का यह गीत, जो कभी प्रेम की पवित्रता का प्रतीक था, आज संबंधों की सारी मर्यादाओं को तोड़ने का औचित्य बनता जा रहा है।
आज के समाचार पत्र उठाइए, हर दिन ऐसे शीर्षक सामने आते हैं जो न केवल चौंकाते हैं, बल्कि समाज के गिरते मानसिक और नैतिक स्तर को उजागर करते हैं—
- सास दामाद के साथ भाग गई
- मामी-भांजा फरार
- तीन बच्चों की माँ प्रेमी संग फरार
- पत्नी ने प्रेमी संग हनीमून के लिए पति की हत्या की
- प्रेम में बाधा बने माँ-बाप और भाई-बहन की सामूहिक हत्या
यह सब क्या है? ये घटनाएँ अब अपवाद नहीं रहीं। वे रोजमर्रा की खबरें बन गई हैं। ऐसा क्यों हो रहा है? क्या प्रेम सच में इतना “मुक्त” हो गया है कि सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों की कोई कीमत नहीं रही? या फिर यह प्रेम की आड़ में स्वार्थ और अराजकता का फैलता हुआ विष है?
संस्कार और संबंधों की परिभाषा बदलती जा रही है
आज की पीढ़ी ‘इंस्टेंट लाइफ’ की आदी हो चुकी है —
- इंस्टेंट फूड
- इंस्टेंट फेम
- इंस्टेंट रिलेशनशिप
- और अब ‘इंस्टेंट डिस्कनेक्ट’ भी।
कोई रिश्ता निभाना, समझना, सहना या बदलने की कोशिश करना अब ‘बोझ’ लगता है। परिणामस्वरूप, प्रेम अब आकर्षण और सुविधा का सौदा बन गया है। जब तक दिल लगे, तब तक साथ — वरना ‘डिलीट’।
स्त्री-पुरुष को क्या चाहिए जीवन साथी में?
यह एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक अध्ययन का विषय है। परंतु सरलता से कहें तो—
- स्त्रियों को चाहिए सम्मान, सुरक्षा, भावनात्मक सहयोग और संवाद।
- पुरुषों को चाहिए अपनापन, प्रशंसा, और मानसिक स्थिरता।
पर अब सोशल मीडिया, ओटीटी और विकृत ‘रोमांटिसिज्म’ ने ये अपेक्षाएं भी भ्रमित कर दी हैं। लोग फिल्मों से रिश्तों की कल्पना करने लगे हैं, जिसमें प्रेम हर परिस्थिति में “जबरन अमर” दिखाया जाता है।
अगर इन अपेक्षाओं की पूर्ति नहीं होती, तो लोग रिश्ते तोड़ने को ‘आत्म-सम्मान’ का नाम देने लगे हैं — चाहे वह कितनी भी अमर्यादित हो।
परिवार को मारने की प्रवृत्ति क्यों?
एक चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि प्रेम में बाधा बनने वाले लोगों की हत्या तक की जा रही है — माँ, बाप, भाई, बहन, बच्चे तक सुरक्षित नहीं।
ऐसा क्यों?
इसके कई कारण हैं:
- सिनेमा और सीरियल्स में नायक भी हत्या कर प्रेम करता दिखाया जाता है।
- सोशल मीडिया पर ‘प्यार में कुछ भी कर सकते हैं’ जैसे संदेशों का महिमामंडन।
- नैतिक शिक्षा का ह्रास और आत्म-नियंत्रण की कमी।
- साइकोलॉजिकल इमोशनल ड्राइव — ‘अगर वो मेरा नहीं हुआ, तो किसी का नहीं होगा’।
बिहार, यूपी, हरियाणा, महाराष्ट्र से लेकर तमिलनाडु तक, NCRB के आंकड़े बताते हैं कि प्रेम प्रसंगों से जुड़ी हत्याएं 2018 में जहाँ लगभग 3,400 थीं, वहीं 2023 में ये बढ़कर 5,800 के आसपास पहुँच गईं।
क्या महिलाओं के पास अब भी कारण हैं अलग होने के?
पहले महिलाएं गरीबी, शोषण या घरेलू हिंसा से परेशान होकर रिश्ता तोड़ती थीं, जो कई बार न्यायसंगत भी था। लेकिन आज उच्च मध्यम वर्ग की महिलाएं भी अच्छे घरों से निकलकर “स्वतंत्रता की खोज” में ऐसे कदम उठा रही हैं जो केवल उनकी ही नहीं, पूरे परिवार की बर्बादी का कारण बन रहे हैं।
आज प्रेम या संबंधों की टूटन का कारण क्या है?
- उबाऊ रिश्ता
- नई मोहकता
- सोशल मीडिया के “like” से मिलती आत्ममुग्धता
- किसी नए साथी से मिल रही “फिल गुड” फीलिंग
तो क्या अब जीवनसाथी बदलना भी ड्रेस बदलने जितना आसान हो गया है?
मूल समस्या क्या है?
- संस्कारहीन स्वतंत्रता:
स्वतंत्रता और स्वेच्छाचार में अंतर मिट गया है। हर व्यक्ति सोचता है कि “मुझे जो अच्छा लगे वही सही है” — यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है। - नैतिक शिक्षा की कमी:
स्कूलों, परिवारों, और समाज ने नैतिकता और कर्तव्य को ‘पुराना’ घोषित कर दिया है। लेकिन मूल्यहीन समाज कभी स्थायित्व नहीं पा सकता। - फेक ‘इमोशनल इंटेलिजेंस’:
आज लोग मन का भाव पहचानने की बात तो करते हैं, लेकिन उसका संयमपूर्वक संतुलन नहीं बना पाते। आत्मनियंत्रण और ‘मन की स्वच्छता’ ग़ायब हो चुकी है।
समाधान क्या है?
👉 मानसिक और नैतिक शिक्षा जरूरी है।
स्कूलों में पर्सनल रिलेशनशिप एथिक्स, काउंसलिंग, और धार्मिक मूल्य आधारित विमर्श शुरू होना चाहिए।
👉 मीडिया को जिम्मेदार बनना होगा।
प्रेम को ‘मुक्त उन्माद’ नहीं, एक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
👉 परिवारों को संवाद बढ़ाना होगा।
माँ-बाप को अपने बच्चों से बात करनी होगी। केवल आदेश देने से नहीं, बल्कि समझने से बदलाव आएगा।
👉 कानूनी सख्ती जरूरी है।
प्रेम प्रसंगों से जुड़ी हत्याओं में तेज़ न्यायिक कार्यवाही और कड़ी सज़ा एक जरूरी संदेश दे सकती है।
निष्कर्ष:
समाज उस चौराहे पर खड़ा है जहाँ प्रेम, स्वतंत्रता और स्वार्थ की रेखाएँ धुंधली हो चुकी हैं।
आज ज़रूरत है कि हम अपने मौलिक विचारों और सांस्कृतिक चेतना को पुनः जाग्रत करें —
जहाँ प्रेम त्याग, समझौते और ज़िम्मेदारी का नाम हो,
ना कि हत्या, छल और मनमानी का रास्ता।
🙏 यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी प्रेम को पूज्य समझे, तो हमें उसे प्रेम की मर्यादा और रिश्तों की गरिमा सिखानी ही होगी — नहीं तो समाज भावनात्मक जंगल बन जाएगा।



















