यह विचार मूल रूप से पश्चिमी समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में परिवर्तन को दर्शाता है। पश्चिम में स्त्री और पुरुष के बीच का प्रेम धीरे-धीरे फीका पड़ता जा रहा है, और इसका प्रमुख कारण यह है कि दोनों के बीच जो विशिष्ट अंतर थे, वे क्रमशः मिटते जा रहे हैं। स्त्री और पुरुष अब एक-दूसरे के समान होते जा रहे हैं—उनकी अलग-अलग विशेषताएँ, जो कभी आकर्षण का मूल कारण थीं, समाप्त हो रही हैं।
जब विविधता और विशिष्टता समाप्त होती है, तो सहज रूप से आकर्षण भी क्षीण हो जाता है। पुरुष और स्त्री समान वेशभूषा धारण कर रहे हैं, समान व्यवहार अपना रहे हैं—दोनों ही दफ्तर में कार्यरत हैं, दोनों ही धूम्रपान कर रहे हैं, दोनों ही स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर रहे हैं। स्त्रियों की चेष्टा अब पुरुषों के समान बनने में केंद्रित हो गई है, जिससे उनका स्वाभाविक स्त्रैण तत्व धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। यही कारण है कि पश्चिमी समाज में स्त्री का आकर्षण घटता जा रहा है और पुरुषों में उनके प्रति वह सहज अनुराग कम होता जा रहा है।
इसके विपरीत, पूर्व की स्त्रियाँ अभी भी अपने स्वाभाविक स्त्रैण गुणों को बनाए हुए हैं। उनमें स्त्रैणता अधिक प्रबल है, जिससे वे अधिक आकर्षक प्रतीत होती हैं। प्रेम की गहराई विपरीत गुणों के बीच की दूरी से ही उत्पन्न होती है—जितनी अधिक भिन्नता होगी, उतना ही प्रेम का आकर्षण गहन होगा। प्रेम का मूल तत्व यही है कि यह विपरीत को जोड़ने का कार्य करता है। सृष्टि के मूल में भी यह तत्व निहित है—दिन और रात का सामंजस्य, अंधकार और प्रकाश का मेल, जीवन और मृत्यु का अटूट संबंध—इन सभी विरोधाभासों को जोड़े रखने वाली शक्ति प्रेम ही है। भक्तों के अनुसार, संपूर्ण अस्तित्व प्रेम के सूत्र में ही आबद्ध है।
रवींद्रनाथ टैगोर के एक उपन्यास का संदर्भ लेते हुए, यह विचार अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। एक युवती अपने प्रेमी से विवाह के लिए राज़ी होती है, किंतु उसकी एक शर्त होती है—विवाह के पश्चात वे एक ही छत के नीचे नहीं रहेंगे। प्रेमी के लिए यह विचार अचंभित करने वाला था। उसने पूछा, “यह कैसा प्रेम है?” युवती उत्तर देती है कि प्रेम से पहले साथ रहना उचित है, किंतु प्रेम के बाद एक साथ रहना खतरनाक हो सकता है। नज़दीकी बढ़ने से स्वतंत्रता बाधित होने लगती है, और प्रेम की आत्मा स्वतंत्रता में ही बसती है।
उसका प्रस्ताव था—तुम झील के उस पार रहोगे, मैं इस पार। जब चाहो, निमंत्रण देकर बुला सकते हो। कभी संयोग से भेंट हो जाए, तो वह क्षण और भी मधुर हो जाएगा। लेकिन प्रेम को अधिकार और बंधन में बदलना उचित नहीं। प्रेम तभी पुष्पित होता है जब उसमें स्वतंत्रता का आकाश हो। यदि प्रेमी-प्रेमिका एक-दूसरे पर अधिकार जमाने लगें, तो प्रेम की मधुरता समाप्त हो जाती है और वह केवल एक सामाजिक बंधन बनकर रह जाता है।
खलील जिब्रान ने प्रेम को मंदिर के स्तंभों की तरह बताया है—वे बहुत अधिक पास नहीं होते, क्योंकि अधिक निकटता से मंदिर गिर सकता है; वे बहुत दूर भी नहीं होते, क्योंकि अत्यधिक दूरी से भी मंदिर का संतुलन बिगड़ सकता है। प्रेमी-प्रेमिका को भी इसी संतुलन का पालन करना चाहिए—इतना पास कि प्रेम जीवंत बना रहे, किंतु इतना दूर कि उनकी स्वतंत्रता बाधित न हो।
सच्चा प्रेम अधिकार की भावना से मुक्त होता है। यह एक-दूसरे को आत्मसात करने का नहीं, बल्कि एक-दूसरे के अस्तित्व को सम्मान देने का नाम है। प्रेम वही होता है, जिसमें व्यक्ति का अस्तित्व स्वतंत्र रहता है, जहाँ प्रेम निमंत्रण पर आधारित होता है, अधिकार पर नहीं।




















