कुछ समय पहले राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित उच्च न्यायालय परिसर में लगी मनु की प्रतिमा हटाने को लेकर कुछ संगठनों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखा है। इसके बाद हाईकोर्ट परिसर में लगी मनु की प्रतिमा पर तीखी बहस शुरू हो गई है।
इस बहस का मूल कारण मनु महाराज के द्वारा लिखी ‘मनुस्मृति’ को स्वीकारने या नकारने पर छिड़ी है। सनातन सवाल है कि सृष्टि कैसी होनी चाहिए? यह कैसे चलनी चाहिए? इस सवाल के जवाब में मनु ने विधान के रूप में एक ग्रंथ का निर्माण किया जिसे ‘मनुस्मृति’ के नाम से जानते है । कुछ विद्वानों का मानना है कि मनुस्मृति का इतिहास रामायण और महाभारत से पुराना है। दूसरे विद्वानों का मानना है कि मनुस्मृति ईसा पूर्व चौथी शताब्दी से अधिक पुरानी नहीं है। उनका यह भी दावा है कि मनुस्मृति बदलती और बिगड़ती रही है। अभी जो मनुस्मृति है, उससे छेड़छाड़ हुई है।
मनुस्मृति के समय को लेकर भले उठापटक हो पर इसके लेखक को लेकर कोई झगड़ा नहीं है। ऐसा माना जाता है की समाज, राष्ट्र और संपूर्ण विश्व को संचालित करने के लिए मनु ने इसकी रचना की।
मनुस्मृति क्या है और क्या कहती है
वास्तिवक विवाद इस बात पर है कि मनुस्मृति ऊंच-नीच, वर्णभेद-लिंगभेद को बढ़ाने वाला एक आधार भूत ग्रंथ है। जिस बात पर कोई विवाद नहीं है, वह यह है कि मनुस्मृति विश्व का पुरातन संवैधानिक दस्तावेज है।
यह मानव संविधान के साथ साथ धर्मसंहिता भी है। जीवन कैसे जीना है, इसकी नियंत्रक पुस्तक है। आचार-विचार का प्राचीन धर्मशास्त्र है। कानूनी व्यवस्था की शुरूआती किताब है। शास्त्र परंपरा में स्मृतियों की मान्यता है। इनका स्थान वेद और उपनिषदों के बाद है। वेद मंत्रों में निहित अभिप्राय का स्मरण स्मृतियां करवाती हैं। ये आम आदमी तक वेदों के जटिल ज्ञान को पहुंचाने का आसान तरीका है। इसलिए एक नियम बना कि जो वेद नहीं पढ़ते, वे स्मृतियां पढ़ें, पुराण पढ़ें एवं रामायण-महाभारत पढ़ें। मानव के भीतर संस्कार, उद्देश्य और क्षमता को बढ़ाने के लिए स्मृतियों का लिखा जाना शुरू हुआ।
मनु महाराज का विदेशो में महत्त्व
आज भी यूरोप में मनु के प्रभाव का अनुभव किया जाता है। भारतरत्न डॉ. पांडुरंग वामन काणे ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ में मनु के प्रभाव का विवेचन किया है। फिलीपींस की राजधानी मनीला के नेशनल असेंबली हॉल में मनु की तस्वीर लगी है, जिस पर लिखा है, ‘मानव जाति के प्रथम महान और बुद्धिमान कानूनविद्।’ थाईलैंड में अनेक लीगल टैक्स्ट के नाम मनुस्मृति से उठाकर ज्यों के त्यों रखे गए हैं।
सनातन धर्म की उदारता
यह हिंदू यानि सनातन धर्म की ही खासियत है कि यहां व्यक्ति अपने चिंतन से धार्मिक व्यवहारों और मान्यताओं को नकार कर उनकी अकल्पनीय भर्त्सना कर सकता है। अंबेडकर द्वारा मनुस्मृति का किया विरोध इसका एक बड़ा उदाहरण हो सकता है अगर लोग विचार करके समझे तो।
विवाद का मुद्दा
भारतीय समाज में दो धड़े है, एक उदारवादी और एक संकुचित, जहाँ उदारवादी धड़ा “सार सार तो गहि रहे थोता देई उड़ाय” वही कटटरपंथी जो पसंद नहीं है उसे खत्म कर दो, या जला दो में विस्वास करता है, और दोनों धड़ों के बीच मनुस्मृति पर लंबे समय से चल रही बहस के बीच कई सवाल हैं।
समझना और उत्तर भी जरूरी है।
पहला प्रश्न वर्गीकरण से जुड़ा है कट्टपंथीओ का कहना है की मनुस्मृति जातिओ के आधार पर भेदभाव करती है तो उदरवादीओ का दावा है मनुस्मृति में जाति नहीं वर्ण है और वो भी कर्मानुशार, अब प्रश्न उदरवादीओ का है कि क्या कोई बता सकता है कि आज संसार वर्गीकरण के बिना चल रहा है? यदि हां तो हर जगह श्रेणियां क्यों हैं? इस श्रेणी के हिसाब से व्यक्ति का सम्मान है। वेतन हैं, भत्ते हैं, बंगले हैं और दूसरी सुविधाएं हैं। किसी चपरासी को अगर आईएएस के समान सुविधाएं मिले तो क्या कोई आईएएस बनने के लिए मेहनत करेगा? साफ है कि आज जाति से भले कोई ब्राह्मण हो या दलित, जिसके पास पद, प्रतिष्ठा और पैसे हैं, वही सम्मान प्राप्त कर रहा है।
आजादी के 75 साल बाद भी सम्मान का दायरा क्या वही नहीं है, जो सदा से चला आ रहा है? अंबेडकर इस दायरे को तोड़ना चाहते थे लेकिन वो खुद इसके पोषक बन गए, उनके अनुयाई अपनी जातिगत सोच और वर्चस्व के प्रति ज्यादा कट्टर हो गए , भारत में धार्मिक और सामाजिक विचार कहने और लिखने की छूट है। वेदों को नहीं मानने वाले चार्वाक, जैन और बौद्ध भी भारतीय दर्शन के अविभाज्य हिस्से हैं। अनेक परस्पर विरोधी ग्रंथ हैं। मत और चिंतन की परस्पर लहराती हुई विरोधी धाराएं हैं। इस नाते उन्होंने मनुस्मृति के निहितार्थ के परिष्कार को जरूरी मानकर उसका विरोध किया, जिससे समानतामूलक देश का निर्माण हो सके।
मनुस्मृति के निहितार्थ को लेकर बड़ी समस्या है, जिसे हल करने का काम अग्रणी विद्वानों का है। स्पष्ट है कि संस्कृत विद्वान जिस अंश को ‘अनपेक्षित’ मान रहे हैं, वही अंश भारतीय राजनीति के लिए अपेक्षित होकर ‘वरदान’ बन गया है। इस वरदान में वोट हैं, कुर्सी है और सरकारें हैं। आज के भारत में मिला आरक्षण का विशेषाधिकार मनुष्य के कर्म और गुण पर आधारित न होकर उसकी जन्म सत्ता पर आधारित है। इस नाते लोकतंत्र में ‘व्यक्ति सत्ता’ को नकारकर ‘जन्म सत्ता’ (जैसा की एक वर्ग विशेष मानता है, लेकिन हमारे अनुसार तो मनुस्मृति वर्ण में विस्वास करती है और वो भी कर्मानुसार न की जन्मनुसार ) से आरक्षण का अधिकार पाने के नियम मनुस्मृति और भारतीय संविधान में लगभग एक जैसे ही हैं। हालांकि इस विशेषाधिकार के बाद भी वर्गीकरण व्यवस्था बदस्तूर जारी है। सुंदर-कुरूप, अमीर-गरीब, विद्वान-मूर्ख का वर्गीकरण सर्वत्र है। इसी वर्गीकरण के आधार पर मनु ने कभी प्राचीन जीवन व्यवस्था बनाई थी।

































