आज़ादी के 75 साल बाद भी भारतीय समाज में “समानता” और “जातिवाद” की बहस खत्म नहीं हुई है। लेकिन एक अजीब विडम्बना यह है कि जो वर्ग सबसे ज़्यादा “जाति खत्म करने” का नारा लगाता है, वही वर्ग हर समय अपनी जाति का झंडा उठाए रखता है। जो बार-बार आरक्षण की माँग करता है, वही दूसरी ओर कहता है कि जातियाँ समाप्त हो जानी चाहिए। यह गहरी विरोधाभासी स्थिति है।
दोहरे मापदण्ड की राजनीति
आज समाज में एक वर्ग है जो हर समय “बराबरी” की बात करता है। वह कहता है कि समाज में उसे न्याय नहीं मिलता, सम्मान नहीं मिलता। लेकिन यही वर्ग –
- अपने महापुरुष चुनते समय जाति देखता है,
- अपने नेता चुनते समय जाति देखता है,
- अपने समाज के उत्थान की बात भी जाति के आधार पर ही करता है।
फिर वही वर्ग दूसरों को “जातिवादी” कहने लगता है। सवाल यह है कि अगर जाति आपके लिए इतना बड़ा मुद्दा है तो आप दूसरों को जातिवादी क्यों ठहराते हैं?
धर्म और परम्पराओं का अपमान
यह भी एक सच्चाई है कि आज के “अधुनिक” जातिवादी आंदोलन अक्सर हिंदू धर्म, मंदिर, पूजा-पाठ और धर्मग्रंथों का अपमान करते हैं।
- भगवान को “कल्पनिक” कहते हैं,
- उनसे सबूत माँगते हैं,
- पुजारियों और संतों को “पाखण्डी” बताते हैं।
लेकिन दूसरी ओर जब कथा-भागवत या धार्मिक अनुष्ठान की बात आती है तो यही लोग कहते हैं – “हमें क्यों नहीं बुलाया जाता?”
यानी बात बराबरी की करेंगे, लेकिन अपनी विचारधारा और आचरण से कभी बराबरी का वातावरण बनाएँगे नहीं।
बराबरी किससे चाहिए?
यह सबसे बड़ा प्रश्न है। बराबरी किससे चाहिए?
- क्या उससे चाहिए जिसके भगवान को आप गाली देते हो?
- क्या उससे चाहिए जिसके धर्मग्रंथ को आप जलाते हो?
- क्या उससे चाहिए जिसके मंदिर पर आप कब्ज़ा करना चाहते हो?
बराबरी पाने के लिए पहले सामने वाले के अस्तित्व का सम्मान करना पड़ता है। लेकिन जब लगातार अपमान और गाली-गलौज ही भाषा हो, तो बराबरी की जमीन कैसे तैयार होगी?
भेदभाव की वास्तविकता
भेदभाव की बात बार-बार कही जाती है। लेकिन ठोस सवाल यह है कि भेदभाव कहाँ हो रहा है?
- स्कूल में?
- कॉलेज में?
- अस्पताल में?
आज स्थिति यह है कि इन सभी संस्थानों में किसी से यह नहीं पूछा जाता कि उसकी जाति क्या है। डॉक्टर इलाज जाति देखकर नहीं करता, शिक्षक जाति देखकर नहीं पढ़ाता।
लेकिन दूसरी ओर सामान्य वर्ग (सवर्ण) से हर कदम पर भेदभाव होता है।
सवर्णों पर अन्याय
- शिक्षा में भेदभाव – सामान्य वर्ग के छात्र को आरक्षित वर्ग की तुलना में कहीं अधिक अंक लाने पड़ते हैं।
- नौकरी में भेदभाव – सामान्य वर्ग के उम्मीदवार को अधिक मेहनत करनी पड़ती है और तब भी उसका चयन मुश्किल होता है।
- आयु सीमा – आरक्षित वर्ग को अतिरिक्त आयु सीमा मिलती है, जबकि सामान्य वर्ग को कम उम्र में ही सब पूरा करना होता है।
इस तरह सवर्ण छात्र और युवाओं के सामने “डबल दबाव” है – एक ओर अधिक मेहनत, दूसरी ओर प्रतियोगिता में लगातार पिछड़ना।
व्यक्तिगत जीवन पर असर
SC/ST एक्ट की तलवार ने सवर्ण समाज को एक अजीब मानसिकता में डाल दिया है।
- कोई मकान किराये पर देने में डरता है,
- दोस्ती करने से डरता है,
- बातचीत में मज़ाक करने से भी डरता है कि कहीं मुकदमा न लग जाए।
इस डर ने समाज को दो हिस्सों में बाँट दिया है – एक राष्ट्र में दो सामाजिक वर्ग।
संस्कृति पर हमला
आज जो वर्ग विज्ञान का नाम लेकर धर्म और संस्कृति का मज़ाक उड़ाता है, वही भूल जाता है कि असली वैज्ञानिक दृष्टि सनातन धर्म ने ही दी थी।
- पंचमहाभूतों का सिद्धान्त,
- आयुर्वेद,
- योग और ध्यान –
ये सब आधुनिक विज्ञान से कहीं आगे थे।
सच्चाई यह है कि वास्तविक वैज्ञानिक और सनातन धर्म में आस्था रखने वाले दोनों ही खुश और संतुलित जीवन जी रहे हैं।
सवर्ण समाज की स्थिति
सवर्ण समाज आज भी न किसी से घृणा रखता है, न द्वेष, न क्रोध।
उसके लिए विरोधियों का अस्तित्व ही अप्रासंगिक है।
- उसे गाय, गोबर, गोमूत्र से कोई दिक्कत नहीं,
- उसे परम्पराओं से कोई दिक्कत नहीं।
दिक्कत तब होती है जब दूसरे लोग उसकी आस्था का मज़ाक उड़ाते हैं और उसी से बराबरी की माँग भी करते हैं।
समाधान क्या है?
- दोहरेपन का अंत – अगर सचमुच बराबरी चाहिए तो पहले दोहरेपन से बाहर आना होगा।
- धर्म का सम्मान – बिना आस्था और परम्परा का सम्मान किए समाज में संतुलन सम्भव नहीं।
- आरक्षण की समीक्षा – जाति नहीं, आर्थिक स्थिति के आधार पर मदद मिलनी चाहिए।
- परस्पर विश्वास – डर और मुकदमे की राजनीति से दूर जाकर वास्तविक मित्रता और सामाजिक विश्वास बनाना होगा।
सवर्ण समाज का दर्द यही है कि उसे बार-बार दोषी ठहराया जाता है, लेकिन उसकी पीड़ा पर कोई चर्चा नहीं होती।
उसके बच्चों की मेहनत, उसकी परेशानियाँ, उसके सामाजिक भय – सबको नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
वह न किसी से घृणा करता है, न कोई संघर्ष चाहता है। लेकिन उसके आत्मसम्मान को बार-बार ठेस पहुँचाई जाती है।
इसलिए वह आज यह कहने पर मजबूर है कि –
👉 “हमें न तुमसे घृणा है, न द्वेष, न क्रोध।
हमारे लिए तुम और तुम्हारे जैसे विचार वालों का अस्तित्व ही नहीं है।”
































