जैसा की वर्तमान समय में योग्यता का हनन करके चयन प्रक्रिया को अपनाया जा रहा है उससे आरक्षण भारतीय लोकतंत्र का सबसे विवादित विषय है लेकिन इसके साथ ऐसे लोग जुड़े है जो बात बात पर भारत को जलाने लगते है देश की सम्पदा को नुकशान पहुंचाने लगते है इससे हम इसे ही सबसे संवेदनशील विषय मानते है। संविधान निर्माताओं ने इसे एक “अस्थायी सामाजिक न्याय का उपाय” माना था, लेकिन आज यह स्थायी राजनीतिक हथियार बन चुका है। आरक्षण को लेकर जो संकल्पना 1950 में थी, वह समय के साथ पूरी तरह बदल चुकी है। आज स्थिति यह है कि समाज के हर वर्ग में “पिछड़ा” कहलाने की दौड़ लगी हुई है। सवाल यह है कि आखिर यह यात्रा कहाँ से शुरू हुई और 2040 तक कहाँ पहुँच सकती है?
1. 1857 के बाद जातीय राजनीति की शुरुआत
1857 की क्रांति ने अंग्रेजों को झकझोर दिया। उन्हें समझ आया कि यदि भारतीय समाज जातीय और धार्मिक रूप से एकजुट रहा, तो उनका शासन टिकना असंभव होगा।
- इसी के बाद अंग्रेजों ने जातियों और समुदायों को अलग-अलग गिनने का काम शुरू किया।
- 1871 की पहली जनगणना से लेकर 1931 की जनगणना तक, हर बार जातियों की लिस्ट बनाई गई।
- “Depressed Classes” और “Backward Classes” जैसे शब्द गढ़े गए।
नतीजा: हिंदू समाज को आंतरिक रूप से विभाजित कर देना और उन्हें एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी बना देना, कारन ये है की एक परिवार में अगर दस सदस्या है तो जरुरी नहीं सभी की आर्थिक और सामाजिक स्थिति समान हो, और अगर कोई इस अंतर के कारण परिवार में मिलने वाले सम्मान से तुलना करवाने लगे तो हीनता ज्यादा गहरी हो जाती है, यही हुआ जो वर्ग एकजुट थे अपने अपने काम में लगे रहकर सुख दुःख में साथ खड़े थे वो आमने सामने आगये वो भी बाहरी लोगो के बहकावे में आकर ।
2. 1950: संविधान और आरक्षण की शुरुआती स्थिति
संविधान लागू होते ही राष्ट्रपति का आदेश आया जिसमें अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) की सूची तय की गई।
- SC (अनुसूचित जाति): लगभग 1,232 जातियाँ।
- ST (अनुसूचित जनजाति): लगभग 664 जनजातियाँ।
👉 यानी 1950 में कुल मिलाकर लगभग 1,900 समुदायों को आरक्षण दिया गया।
यह आरक्षण शिक्षा, सरकारी नौकरियों और विधानसभाओं/संसद में राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक सीमित था।
मुख्य उद्देश्य:
- सदियों से सामाजिक भेदभाव झेलने वाले वर्गों को अवसर देना।
- 10 वर्षों में सामाजिक समरसता स्थापित कर देना।
लेकिन 10 साल की यह “अस्थायी व्यवस्था” हर 10 साल में आगे बढ़ती रही और आज 75 साल बाद भी जस की तस है।
3. 1950–1970: OBC की मांग क्यों उठी?
- SC और ST को संवैधानिक आरक्षण मिल चुका था।
- लेकिन बड़ी संख्या में वे जातियाँ, जो कृषि, पशुपालन, कारीगरी और पारंपरिक व्यवसाय करती थीं, उन्होंने भी अपने आपको “पिछड़ा” बताना शुरू किया।
- राज्यों में “Backward Class Commissions” बनने लगे।
कल्याणकारी राजनीति ने इन जातियों की मांग को और हवा दी। यही OBC राजनीति की नींव थी, अब सोचने वाली बात ये है की जो अब खुद को OBC बताने लगे में तो सवर्ण या सामान्य ही थे उनके अंदर क्यों हीनता आ गयी जो उनको आरक्षण चाहिए था ? वास्तव में आरक्षण धीरे धीरे सफलता और उन्नति का शॉर्टकट बन गया, कम मेहनत और बिना खर्चे के सरकारी नौकरिया, और अन्य सुविधाएं, अब आरक्षण जरूरत नहीं थी वल्कि लालच की पराकष्ठा थी और सीधे वोटबैंक से जुडी थी, एक बल्क वोटबैंक यानि आरक्षण की वकालत करो हमारा वोट लो, आरक्षण के खिलाफ योग्यता की बात करोगे तो राजनैतिक कैरिएर संकट में ।
4. 1979: मंडल आयोग और OBC राजनीति का उदय
जनता पार्टी सरकार (1977-79) ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में “मंडल आयोग” गठित किया।
इस आयोग ने 1931 की जनगणना के आंकड़ों और सर्वेक्षणों के आधार पर बताया:
- भारत की 52% आबादी “सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ी” है।
- आयोग ने लगभग 3,743 जातियों को OBC में गिना।
- इनके लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की।
1990: वी.पी. सिंह सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दीं।
- नतीजा: देशभर में विरोध प्रदर्शन, आत्मदाह और बड़े पैमाने पर आंदोलन।
- लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह कदम बेहद सफल रहा।
5. 1990 से 2025: आरक्षण का विस्तार
आज की स्थिति इस प्रकार है:
- SC – 15%
- ST – 7.5%
- OBC – 27%
- EWS (सवर्ण गरीब) – 10% (2019 में जोड़ा गया, लेकिन वास्तव में ये एक झुनझुना है क्युकी इसमें न तो आयु में छूट है और न ही नंबरों में, इसको अभी तक पुरे राज्यों ने अपनाया तक नहीं है, कुछ राज्यों ने हलाकि छूट दी है लेकिन ये २ या ४ ही है, बाकी केंद्र ने इसमें आयु और अंक की छूट नहीं दी है तो इसका होना न होने के बराबर ही है )
👉 कुल मिलाकर 59.5% आरक्षण (कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु में 69%)।
इसके साथ अतिरिक्त लाभ:
- आयु सीमा में छूट।
- आवेदन शुल्क माफ़।
- कट-ऑफ में छूट।
- फ्री कोचिंग, होस्टल, छात्रवृत्ति, लैपटॉप, यात्रा खर्च।
6. 1950 से अब तक जातियों की संख्या में बढ़ोतरी
- 1950: लगभग 1,900 समुदाय (SC+ST)।
- 2025:
- SC: 1,200+
- ST: 700+
- OBC: 5,013 (केंद्रीय सूची में)
- राज्यों की सूची जोड़ें तो कुल मिलाकर 7,000 से अधिक जातियाँ आरक्षण ले रही हैं।
👉 यानी 1950 से अब तक आरक्षण की पात्र जातियों की संख्या 3 गुना से भी ज़्यादा हो चुकी है।
7. बड़ा सवाल: “समाज का पिछड़ा वर्ग ऊपर क्यों नहीं उठ पाया?”
- कारण 1: आरक्षण “अस्थायी सहायता” होना था, लेकिन स्थायी अधिकार बन गया।
- कारण 2: जिन जातियों को आरक्षण से फायदा मिल गया, वे क्रीमी लेयर बनकर उसी का लाभ उठाती रहीं।
- कारण 3: राजनीति ने “आरक्षण बढ़ाओ, वोट पाओ” को हथियार बना लिया।
- कारण 4: शिक्षा और कौशल पर ध्यान देने के बजाय केवल आरक्षण को साधन मान लिया गया।
यानी समाज को ऊपर उठाने का उद्देश्य अधूरा रह गया और नतीजे में नए-नए वर्ग खुद को पिछड़ा घोषित करवाने की दौड़ में शामिल हो गए।
8. OBC राजनीति का विरोधाभास
- शुरुआत में “Backward” वर्ग सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा था।
- लेकिन धीरे-धीरे OBC की बड़ी जातियाँ (जैसे यादव, जाट, मराठा, कुर्मी, पटेल आदि) राजनीति में हावी हो गईं।
- अब हालात ऐसे हैं कि ये प्रदेश स्तर पर सबसे प्रभावशाली जातियाँ हैं, लेकिन आरक्षण का लाभ भी ले रही हैं।
👉 यानी जो वर्ग कभी “पिछड़ा” कहलाता था, आज कई जगह सत्ता और ताक़त के केंद्र में है। फिर भी आरक्षण की राजनीति के कारण वे “पिछड़ा” कहलाना छोड़ना नहीं चाहते।
9. 2040 की संभावित तस्वीर
अगर यही क्रम चलता रहा, तो 2040 तक स्थिति कुछ इस तरह हो सकती है:
- परीक्षा औपचारिकता रह जाएगी – General category को पूरी मेहनत करनी होगी, लेकिन SC-ST-OBC के लिए न्यूनतम औपचारिकताएँ ही काफी होंगी।
- सीधी भर्ती – राजनीतिक दबाव से SC-ST वर्गों के लिए बिना परीक्षा सीधी नौकरी का प्रावधान हो सकता है।
- सुविधाओं का अति-विस्तार – मुफ्त शिक्षा, होस्टल, किताबें, भत्ता, यात्रा, यहां तक कि जीवन-यापन भी टैक्सपेयर्स से।
- सामान्य वर्ग का हाशियाकरण – वह न केवल प्रतिस्पर्धा से बाहर होगा, बल्कि पूरे सिस्टम का खर्च भी वही उठाएगा।
- गुणवत्ता का संकट – देश की प्रशासनिक और तकनीकी क्षमता गिरेगी।
10. समाधान और सुधार की दिशा
- आरक्षण की समय-सीमा तय हो।
- आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू हो।
- गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर निवेश – ताकि आरक्षण की ज़रूरत ही धीरे-धीरे खत्म हो।
- क्रीमी लेयर की सख्त सीमा – ताकि लाभ बार-बार वही परिवार न ले।
- राष्ट्रीय बहस – राजनीति से परे जाकर इस विषय पर चर्चा हो।
निष्कर्ष
1950 में लगभग 1,900 जातियों को आरक्षण दिया गया था। आज यह संख्या 7,000 से अधिक हो चुकी है।
आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक न्याय था, लेकिन अब यह वोट बैंक और राजनीतिक अस्त्र बन गया है।
SC/ST को ऊपर उठाने की जगह OBC वर्ग गढ़ दिया गया, और अब हर वर्ग “पिछड़ा” कहलाने में लाभ देखने लगा है।
👉 यदि यही क्रम चलता रहा, तो 2040 तक आरक्षण की व्यवस्था इस हद तक विकृत हो जाएगी कि प्रतिस्पर्धा, योग्यता और गुणवत्ता शब्द केवल किताबों में रह जाएँगे।
समाज का असली उत्थान तब होगा जब आरक्षण समान अवसर का साधन बनेगा, न कि स्थायी राजनीतिक हथियार।
✍️ लेखक का दृष्टिकोण:
“आरक्षण समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ रहा है साथ ही योग्यता के जगह अयोग्य लोग देश के कर्णधार बन रहे है जिससे देश की नीव कमजोर हो रही है, योग्य लोग देश छोड़ने को मजबूर है जिसे ब्रेन ड्रेन कहा जाता है, समाज के लोगो में आगे बढ़ने के बजाये खुद को पिछड़ा बनाने की होड़ लगी है तो देश कैसे आगे बढ़ेगा, दूसरा टेक्स का बहुत बड़ा भाग इन वर्गों को अनुदान और अन्य सुविधाएं देने में खर्च होता है, अगर वो न हो तो देश के विकास में लगेगा । इसे सीमित और न्यायसंगत करना ही भारत के भविष्य के लिए आवश्यक है, वरना 2040 तक यह व्यवस्था हमें उसी व्यंग्य जैसी हकीकत में पहुँचा देगी जिसे आज हम मज़ाक समझते हैं।”


































