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सवर्णों का दर्द : आरक्षण, जातिवाद और दोहरे मापदण्डों की सच्चाई

आज़ादी के 75 साल बाद भी भारतीय समाज में “समानता” और “जातिवाद” की बहस खत्म नहीं हुई है। लेकिन एक अजीब विडम्बना यह है...

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मनुस्मृति बनाम संविधान: जन्म-आधारित पहचान का असली सच

भारत की सामाजिक-राजनीतिक बहस में दो शब्द बार-बार उभरते हैं — मनुस्मृति और संविधान। एक को “ब्राह्मणवादी शोषण का प्रतीक” कहकर गाली दी...

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आज का लोकतंत्र कुत्तों पर मेहरबान और हिंदुओं पर तंज कसता हुआ

भारत का लोकतंत्र और न्यायपालिका अक्सर अपनी संवेदनशीलता और करुणा पर गर्व करती है। लेकिन क्या यही संवेदनशीलता और करुणा...

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